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Tuesday, 14 April 2020

बाबा साहब के नाम ख़त

मान्यवर बाबा साहब 

सादर प्रणाम!

आपने कहा था: शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो ! मैंने इस सूत्र को जीवन में क्रियान्वित करने का प्रयास निरंतर किया। इसीलिए मैंने आपके इस सूत्र के पहले हिस्से को अपना कैरियर बना लिया। यानि मैं एक शिक्षक हूँ । शिक्षा तो निरंतर चलने वाला कार्य और व्यवहार है। शिक्षा को सही-सही समझने के प्रयास होते रहे हैं। आपने शिक्षा को शेरनी का दूध कह कर शिक्षा के समाज को सशक्त करने में महत्व को रेखांकित किया था। शिक्षा को महत्व देने वाले आपके विचार को ख़ुद UNESCO ने अपनाया और  Knowledge  is power कहा।


ब्रिटिश काल में शिक्षा के दायरे को बढ़ाने के प्रयास निरंतर हुए और उस समय सबके लिए समान शिक्षा के सिद्धांत की ओर बढ़ा गया। किंतु, सामाजिक ढाँचे में अंतर्निहित ग़ैरबराबरी के व्यवहार ने इसे लागू होने में क़दम-क़दम पर बाधा उत्पन्न की। आपसे ज़्यादा शिक्षा के इदारों में होने वाले भेदभाव को भला कौन जान सकता है! उसको याद करके मैं आपको और स्वयं को कष्ट नहीं देना चाहता। इस दृष्टि से हमने प्रगति तो की है किंतु अब भी जाति आधारित भेदभाव से सामाजिक वातावरण पर्याप्त रूप से स्वच्छ नहीं हुआ है। यह प्रदूषण स्कूल और कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालयों तक व्याप्त है। इसके विरुद्ध आपकी प्रतिबद्धता और संघर्ष निरंतर प्रेरणा बन रहा है। इसीलिए विद्यार्थियों के आंदोलनों में आपके विचार पथप्रदर्शक का कार्य कर रहे हैं। आपके विचारों की आज सर्वाधिक प्रासंगिकता है।

उत्पीडितों को शिक्षित करने की आवश्यकता को आपने नए सिरे से परिभाषित किया था। इस संदर्भ में पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान का पक्ष लिया। अपने यहाँ वाला वर्ण श्रेष्ठता आधारित ज्ञान तो सदा से उत्पीडितों के विरुद्ध ही था। वर्ण और उससे विकसित जाति व्यवस्था तो एक मनुष्य को दूसरेसे हीन बताने  के सिद्धांत पर टिकी थी। उसका सारा ज्ञान ब्राह्मण श्रेष्ठता को साबित करने में ख़र्च होता था। अतः आपका संघर्ष इसी  विरुद्ध शुरू हुआ।

परंपरा का अवलोकन करने के क्रम में आप बुद्ध के दर्शन की ओर गए। बुद्ध की शिक्षाओं को आधुनिक समता के सिद्धांत के अनुकूल पाया इसीलिए उसे अपनाया। आपने करुणा, समता, अहिंसा और न्याय की अवधारणाओं को नए समाज के निर्माण के लिए उपयुक्त पाया अत: उसे अपने विचारों में शामिल किया। मध्ययुग के प्रसिद्ध संत कवि कबीर की शिक्षाओं से जड़ शास्त्र से बहस करके उसे निरुत्तर  करने की नायाब तरकीब पाई। इसके उपरांत  आधुनिक युग के नवजागरण में महामानव ज्योतिबा फुले के विचारों ने आपको अत्यंत प्रभावित किया। स्वयं उनके द्वारा स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों का आप पर विशेष प्रभाव पड़ा। इसीलिए आपने बुद्ध, कबीर और फुले की त्रयी को अपने महान शिक्षक माना है।

आपने यूरोप के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में उच्चतम शिक्षा और अनुसंधान किए। इस दृष्टि से दलित-बहुजन के साथ समस्त उत्पीड़ित बहुसंख्यक तबके का पथ प्रदर्शित किया। ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में आपका कार्य उल्लेखनीय रहा। विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान उल्लेखनीय है। इन क्षेत्रों में आपकी समझ के आधार पर सत्ता को आम जन के प्रति जवाबदेह बनाया जा सका है। अर्थशास्त्र में आपके दृष्टिकोण को अमृत्य सेन सरीखे अर्थशास्त्री ने अपना पथ प्रदर्शक माना है। 

आपने संविधान में ऐसे तमाम उपबन्ध किए जिससे वर्ण, वर्ग, लिंग क्षेत्र और अन्य विविध आधारों पर भेदभाव को निर्मूल किया जा सके। इसीलिए आपने शिक्षा के संस्थानों में दुर्बल अस्मिताओं के लिए पहुँच सुनिश्चित करवाने के लिए आवश्यक नियम-उपनियम निर्धारित किए। आपके द्वारा किए गए इन कार्यों से काफ़ी हद तक
लाभ पहुँचा है परंतु हज़ारों वर्ष की जड़ता, प्राचीन संस्कार और मूल्य टूटना अभी प्रतीक्षित है। स्त्री शोषण मुक्ति के लिए आपने शिक्षा को अहम औज़ार के रूप में रखा। इसके लिए वयस्क मताधिकार को अनिवार्य बनाया जबकि यूरोप के आधुनिक कहे जाने वाले अनेक देश इस दृष्टि से पिछड़ी समझ के थे। भारत में भी अनेक राष्ट्रीय नेता इसके विरुद्ध थे। आप शिक्षा सहित सभी संस्थानो में स्त्री भागीदारी को स्वस्थ लोकतंत्र का आधार समझते थे।

शिक्षा ऐसा औज़ार है जिससे तर्क और वैज्ञानिक बोध के आधार पर चिंतन करने पर बल दिया जाना आवश्यक है। इस बात पर आपने मुसलसल ज़ोर दिया कि शिक्षा का वातावरण ऐसा हो जिसमें धार्मिक आडंबर, उससे जुड़े rituals के लिए कोई स्थान न हो क्योंकि ये तर्क आधारित आधुनिक शिक्षा के विरुद्ध है। आपने इस बात की पुरज़ोर वकालत की। संविधान में भी ऐसे अनेक उपबन्ध किए जो इस बोध को प्रोत्साहित करते हैं किंतु एक अध्यापक होने के नाते मैं संवैधानिक प्रावधानों की अवेहलना होते देखता हूँ तो अफ़सोस होता है। मुझे लगता है कि संविधान में वर्णित मूल्यों को अपनाने में और दकियानूसी समाज के प्रतिनिधियों द्वारा इन्हें स्वीकार करने में ख़ासा परेशानी हो रही है। इन मूल्यों को लागू करवाने में आपके द्वारा बताए गए निर्देशों की निरंतर आवश्यकता है।

आपके मिशन का सहयोगी
डॉ. गुलाब सिंह
Mobile: 9968399711

Sunday, 19 April 2015

कटने, छिलने, जलने, चोट लगने पर प्राथमिक उपचार का अच्छा विकल्प है होम्योपैथी


अक्सर घर परिवार, रास्ते-बीच में चिकित्सक के उपलब्ध न रहने तक प्राथमिक उपचार की जरूर हो जाती है. लेकिन प्राथमिक उपचार में होम्योपैथी से बढि़या कोई विकल्प नहीं है, इस बात का कोई प्रचार नहीं किया जाता. हालांकि काफी मामलों में होम्योपैथी बिना किसी जोखिम के बहुत कारगर हो जाती है. क्योंकि होम्योपैथी यदि फायदा नहीं पहुंचाती तो नुकसान भी कोई नहीं करती. प्राथमिक उपचार के कुछ उदाहरण देखिएः

चोट लगने पर होम्योपैथी :

घर में कोई न कोई दुर्घटना हो ही जाती है. सब्जी काटते समय यदि हाथ में चाकू लग गया तो खून बहने लगता है. कई बार रोके नहीं रुकता. यदि डाक्टर तक भागा जाए तो डाक्टर तक पहुंचने में काफी देर जाएगी, ऊपर से वहां लाईन लगी मिली तो और भी दिक्कत. जब तक शरीर के लिए अमृत खून काफी मात्रा में बह जाएगा. बहुतों को तो खून देखते ही घबराहट होने लगती है. कई बार परिवारों में चोट लगने या कटने पर घरेलू कपड़ा या पट्टी बांध ली जाती है, जो कि कई बार जोखिम बन जाती है, क्योंकि वहां सेप्टिक बनने का खतरा बन जाता है या हो जाता है- जिसके बाद घाव ठीक होना मुश्किल हो जाता है या ठीक होता ही नहीं, फिर वह अंग काटना पड़ सकता है. लेकिन होम्योपैथी से ऐसा कोई जोखिम नहीं रहता. घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है.
इसके लिए आप होम्योपैथी की हैमामेलिस वरजिनिका क्यू, हैमामेलिस वरजिनिका -30, आर्निका मोण्टेना-30, फेरम फास-30, एकोनाईट-30, हाइपेरिकम-30, लिडम पैलस्टर आदि रखिए. जैसे चोट आदि के कारण कहीं से खून बहने लगे तो तुरंत उस स्थान पर हैमामेलिस वरजिनिका की क्यू पावर वहां छिड़क दीजिए या रूई से लगा लें. और हैमामेलिस वरजिनिका की क्यू पावर की 10-12 बूंद आधा कप पानी में डालकर पी लीजिए, देखिए कितनी जल्दी खून बन्द होता. फिर चाहे आप डाक्टर से पट्टी कराएं या कोई क्रीम लगाकर पट्टी बांध लें. आप हेमामेलिश की भी नियमित पट्टी कर सकते है. घाव भी जल्दी ठीक होगा. इसके साथ आर्निका मोण्टेना-30, फेरफ फास-30, केल्केरिया सल्फ-30 भी कुछ दिन खा सकते हैं. आर्निका मोण्टेना-30 एंटीसेप्टीक का बहुत बढि़या काम करती है. यह सेप्टीक नहीं बनने देती. इसे लेने पर आपको कोई इंजेक्शन लगवाने की जरूरत नहीं है.

यदि घाव हड्डी तक हो गया है तो हाईपैरिकम-30, केल्केरिया फास-30 लें, रूटा-30 ले सकते हैं.
यदि दर्द में आर्निका लेने से आराम न आ रहा हो तो लिडम पैलस्टर-30 लेंकर देखें.
हड्डी टूटने के बाद जुड़ने में समय लग रहा हो या जुड़ने में परेशानी हो रही हो तो केल्केरिय फास-30 तथा ले लें-  सिम्फाइटस आफिसिनेल, लें. ले लें-  सिम्फाइटस आफिसिनेल हड्डी जोड़ने की बहुत बढ़िया दवाई है. यह दवा पीने व लगाने दोनों में अच्छा काम करती है.

चोट, कटने से हुआ घाव ठीक न हो रहा हो, उसमें पीब पड़ गई हो तो
आर्निका मोण्टेना-30
साईलेशिया-30
केल्केरिया सल्फ-30 लें.
किसी दुर्घटना के कारण बेहोशी आदि हो रही हो तो रेस्क्यू-30 दें.
यदि आंख की पुतली में चोट लग गई है तो आर्निका-30, फेरमफास-30 लें. साथ ही इनमें से एक दवाई साथ में आर्टिमिसिया वल्गैरिस लें.आर्टिमिसिया वल्गैरिस आंख की चोट की बहुत बढ़िया दवाई है. यह दवाई आंख में चोट लगने पर दूसरी परेशानियों को भी दूर करती है.
चोट, खरोंच पर लगाने के लिए कैलेण्डुला, आर्निका की क्रीम भी आती है. जले हुए स्थान पर लगाने के लिए केन्थरिश की भी क्रीम आती है. यह क्रीमें हमेशा घर में रखनी चाहिए.

जलने पर होम्योपैथी :

इसी तरह यदि किसी कारण शरीर का कोई भाग जल जाए तो आप कैन्थरिश की क्यू व 30 पावर जरूर रखें. कैन्थरिश की क्यू पावर की कुछ बूंदे पानी में डालकर जले भाग लगाएं, तुरंत आराम आएगा, फफोले भी नहीं पड़ेंगे. जलन भी खत्म होगी व घाव जल्दी ठीक होगा. कैन्थरिश क्यू की क्रीम भी होम्योपैथी की दुकान पर मिलती है.  इसे घर में रखें. कुछ दिन कैन्थरिश -30 व फेरम फास-30 को गोली में बनाकर 4-4 गोली दिन में चार बार लें. देखिए, घाव कितनी जल्दी ठीक होता है, आप भी अचंभा करेंगे. दो दवाओं के बीच में 10 मिनट का अंतर रखें.

सेप्टिक(टिटनेस) को भी ठीक करती है होम्योपैथी

आर्निका माण्टेना-30 एंटीसेप्टिक का बहुत बढि़या काम करती है. किसी भी तरह से चोट लगने पर, यानी लोहे से भी चोट लगने पर आर्निका माण्टेना-30 ले लेनी चाहिए. इसके साथ लिडम पैलस्टर-30 भी ले  सकते हैं.  यह सेप्टिक नहीं बनने देती. इसे लेने पर आपको कोई इंजेक्शन लगवाने की जरूरत नहीं. यदि चोट लगने के बाद सेप्टिक बन गया है, इलाज कराते-कराते भी ठीक नहीं हो रहा है तो एक बार होम्योपैथी का जरूर इस्तेमाल करके देखें. सेप्टिक होने की वजह से गल रहा अंग कटने से बच सकता है. घाव सुखाने, पीप रोकने-सोखने, ठीक करने में केल्केरिया सल्फ जैसी अनेक दवाईंया हैं, जो घाव को ठीक कर देती हैं. आर्निका माण्टेना, लीडम जैसी दवाईंयां सेप्टिक को ठीक करने में बहुत कारगर है. आर्निका माण्टेना, कैलेण्डूला के मरहम भी मिलते हैं. मरहम चोट पर लगाएं. कैलेण्डुला भी कटे-छिले घाव के लिए अच्छी दवा है. यह दर्द को कम करती है.


कीट पतंगे काटने पर :

कई बार घर में या दूसरी जगह ततैया, मधु मक्खी, आदि शरीर में कहीं न कहीं डंक मार देते हैं. डंक इतना भयंकर होता है कि डंक वाले स्थान पर बहुत दर्द होता है. शरीर का वह हिस्सा सूज भी जाता है. आप इस तरह के समय के लिए घर में लिडम पैलस्टर व एपिस मेल रखें. डंक वाले स्थान पर लिडम पैलस्टर  क्यू की कुछ बूंद छिड़के या रूई से लगाएं. साथ ही लिडम पैलस्टर-30 तथा एपिस मे.30 की  4-4 बूंदे 10-10 मिनट के अंतर से जीभ पर डालकर लें. यह दवाईंया सूजन नहीं होने देगी, यदि सूजन हो गई तो उसे जल्द ठीक करेगी. दर्द को भी कम करेगी. चूहे के काटने पर भी यह दवा प्रयोग कर सकते हैं, उसी तरह.

 नक्सीर छूटने होने पर : 

कई बार तेज धूप, गर्मी की वजह से नक्सीर छूट जाती है और तेज खून नाक से बहने लगता है, डाक्टर के पास ले जाने तक काफी देर हो सकती है. इसके प्राथमिक उपचार के लिए प्रथम तो सिर पर गीला तौलिया रख दें. उसके बाद यदि लाल सुर्ख खून हो तो तुरंत पहले हेमामेलिश क्यू में 12 बूंद आधा कप पानी में पिला दें. यही दवा नाक में किसी प्रकार डालें, इसके लिए चम्मच, रूई आदि का प्रयोग कर सकते हैं. फिर एकोनाईट नेपलेस-30 की 4 बूंदे मुंह में डालें. इसके बाद ब्रायोनिया-30 की 4 बंदें दें. दवाईंया देने में 10-10 मिनट का अंतर रखें
नियमित तौर पर दवाई खाने के लिए लक्षण देखकर दवाई दें. जैसे :
एकोनाईट नेपलेस-30
ब्रायोनिया ऎल्ब-30
मेरे अनुभव में एक व्यक्ति की 6-7 साल पुरानी नक्सीर ब्रायोनिया-30 से ठीक हो गई थी, 5 साल हो गये ठीक हुए, उसे आज तक दोबारा नहीं छूटी.

ध्यान रखें : उपरोक्त जानकारी होम्योपैथी के प्रचार व जानकारी बढ़ाने के लिए है. इसलिए कोई दवा डाक्टर की सलाह से या अच्छी तरह सोच-समझकर व अध्ययन के बाद ही लें.

Thursday, 5 June 2014

पुलिस का हो ऐसा नज़रिया, तो कैसे रुकेंगे बलात्कार?

सन् 2012 में तहलका के स्टिंग आप्रेशन द्वारा बलात्कार और उससे पीडि़त महिलाओं को लेकर पुलिस के रवैये का खुलासा किया. स्टिंग आप्रेशन दै0 भास्कार में प्रकाशित हुआ. स्टिंग आप्रेशन में पुलिस वालों ने महिलाओं के साथ रेप के लिए जिम्मेदार 6 अजीबोगरीब कारण गिनाए हैं. पुलिस के मानकों के मुताबिक इन सभी महिलाओं के साथ रेप होने की आशंका है. आप भी इन्हें पढ़कर देखें:


पहला कारण: महिलाएं हमेशा सलवार कमीज या साड़ी नहीं पहनती हैं. फरीदाबाद, थाना एसएचओ सतबीर सिंह ने स्टिंग आप्रेशन में कहा, "लड़कियों को यहां से यहां तक (पूरे शरीर को) ढंकना चाहिए....वे स्कर्ट पहनती हैं, ब्लाऊज पहनती हैं, लेकिन पूरे शरीर को ढंकने वाले कपड़े नहीं पहनती. दुपट्टा नहीं डालती. दिखावा करती हैं तो बच्चा उसकी तरफ आकर्षित होता है." स्टिंग के मुताबिक सूरजपुर थाने के इंचार्ज अर्जुन सिंह ने कहा, ”वह इस तरह से कपड़े पहनती हैं कि लोग उसकी तरफ आकर्षित हो जाते हैं. मेरा तो यहां तक मानना है कि महिलाएं इसीलिए ऐसा करती हैं कि लोग उनके साथ कुछ करें.“ इन दलीलों के जरिए यही बात साबित करने की कोशिश की गई है कि अगर महिला ने सिर से लेकर पांव तक अपने आपको कपड़ों से नहीं ढंका हुआ है तो उसके साथ बलात्कार होना पक्का है.
"पुलिस मानती है कि अगर किसी महिला ने पुलिस में शिकायत की है तो उसके साथ रेप होना बड़ी बात नहीं है. पुलिस का कहना है कि जो महिला रेप की शिकायत लेकर थाने आती है, वह ‘धंधे’ में लिप्त होती है. नोएडा थाने के दरोगा योगेंद्र सिंह  ने इस बारे में स्टिंग आपरेशन में बोले, "उसके लिए (रेप से पीडि़त के लिए) आसान नहीं होता. बेइज्जती से सभी डरती हैं. अखबार बाजी से भी डरती हैं. असलियत में वही आती (रेप की शिकायत लेकर थाने) हैं जो धंधे में लिप्त होती हैं." दूसरे शब्दों में अगर आपके साथ वाकई रेप हुआ है तो आप कभी शिकायत नहीं करेंगी. लेकिन अगर आपने शिकायत कर दी तो पुलिस यह मानेगी ही नहीं कि आपके साथ रेप हुआ है."
दूसरा कारण: अगर कोई लड़की किसी एक लड़के के साथ शारीरिक संबंध बनाती है तो उसके साथ लड़के के अलावा उसके दोस्त भी रेप कर सकते हैं. गाजियाबाद जिले के  थाना के इंचार्ज धरमवीर सिंह ने कहा, "ऐसा बहुत ही कम होता है कि किसी एक लड़की को 10 लड़के उठा लें. अगर कोई लड़की लड़कों से भरी कार में बैठती है तो वह निर्दोष नहीं हो सकती है. अगर वह ऐसा करती है तो उसका किसी न किसी लड़के के साथ रिश्ता है."
तीसरा कारण: वह शराब पिए हुए लोगों के साथ रहती है, तो उसके साथ रेप हो सकता है. क्या किसी अजनबी के साथ शराब पीना भारत में गलत फैसला है? पुलिस का मानना है कि शराब और मौका रेप के लिए जरूरी माहौल तैयार करते हैं और यही रेप की वजह होते हैं. गुड़गांव थाने के रूपलाल ने इस मामले में अपना तर्क रखा, "जैसे हम लोग बैठे हैं, ज्यादा दारू पी ली....फिर तो ऐसा ही होगा. रात भर रख ली. वह इस बात का अपने घरवालों को क्या जवाब देगी. वह एक घंटे के लिए कहकर गई और पूरी रात ही बाहर रह गई. तो मां-बाप तो पूछेंगे. भाई भी पूछेगा. जिनका समाज है, वे तो पूछते हैं."
चौथा कारण: अगर किसी लड़की की मां का चरित्रा ठीक नहीं है तो उसकी बेटी के साथ रेप होने की काफी आशंका रहती है. 10वीं में पढ़ने वाली लड़की के साथ कुछ दिनों पहले नोएडा में हुए गैंग रेप मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी राम मलिक के मुताबिक, "लड़की की मां तलाकशुदा है. वह यादव समुदाय के एक पुरुष के साथ रह रही है. महिला की उम्र 48 जबकि पुरुष की उम्र 28 साल है. ऐसे में इस बात की पूरी आशंका है कि लड़कियां भटक सकती हैं."
पांचवां कारण: अगर महिला समाज के ऊंचे तबके से आती है तो वह रेप का शिकार बनेगी. समाज के उच्च वर्ग की महिलाओं को सलीके से कपड़े पहनना नहीं आता है. इस वजह से वे मुसीबत को न्योता देती हैं. ‘तहलका’ ने अपने स्टिंग आप्रेशन में 30 पुलिस वालों से बात की. इनमें से 17 पुलिस वालों ने माना कि बलात्कार की वास्तविक घटनाएं बहुत कम होती हैं. 70 फीसदी मामलों में सैक्स रजामंदी से होता है. लेकिन जब कोई ऐसा देख लेता है या पैसे की मांग पूरी नहीं होती है तो इसे रेप में तब्दील कर दिया जाता है. सेक्टर-24 थाने के सब इंस्पेक्टर मनोज रावत ने इस बारे में कहा, "एनसीआर में ज्यादातर मामले (रेप के) आपसी रजामंदी से होते हैं. मेरी निजी राय में पूरे एनसीआर में एक या दो फीसदी ही वास्तविक रेप के केस होते हैं."
छठा कारण: अगर किसी महिला ने पुलिस में शिकायत की है तो उसके साथ रेप होना बड़ी बात नहीं है. पुलिस का कहना है कि जो महिला रेप की शिकायत लेकर थाने आती है, वह ‘धंधे’ में लिप्त होती है. नोएडा, थाने के दरोगा योगेंद्र सिंह  ने इस बारे में स्टिंग आपरेशन में बोले, "उसके लिए (रेप से पीडि़त के लिए) आसान नहीं होता. बेइज्जती से सभी डरती हैं. अखबार बाजी से भी डरती हैं. असलियत में वही आती (रेप की शिकायत लेकर थाने) हैं जो धंधे में लिप्त होती हैं." दूसरे शब्दों में अगर आपके साथ वाकई रेप हुआ है तो आप कभी शिकायत नहीं करेंगी. लेकिन अगर आपने शिकायत कर दी तो पुलिस यह मानेगी ही नहीं कि आपके साथ रेप हुआ है.

Monday, 2 June 2014

लोक गीतों में झलकता दलित समाज


- डा.कौशल पंवार
साहित्य समाज का प्रतिबिंब होता है. समाज के रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान सब का प्रभाव साहित्य पर पड़ता है. किसी भी देश-विशेष, काल-विशेष का अध्ययन करना हो तो उस तात्कालीन परिवेश को जानना अति आवश्यक होता है जिसमें वह समाज अपने तमाम सांस्कृतिक परिवेश के साथ रह रहा होता है, तभी हम उस समय की सामाजिक स्थिति का पता लगा सकते हैं. साहित्य में परिलक्षित समाज उसका बहुत बड़ा मापदण्ड हो सकता है पर उस समाज में गाए जाने वाले लोक गीत भी समाज का आईना बनते हैं. अगर हम एक विशेष तबके की बात करें तो दलित समाज में गाए जाने वाले लोक गीतों को लिया जा सकता है. गांव की बहुल दलित आबादी अपना मनोरंजन इन लोक गीतों के माध्यम से ही करती आयी है. भले ही आज रेडियो, डीजे और टेलीविजन का प्रभाव मानस पटल पर छाया हुआ है पर इन सब के बावजूद भी कई अवसरों पर महिलाएं इन्हीं लोक गीतों को गा-गाकर अपनी पूंजी को सम्भालकर रखती हैं. ये लोक गीत केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं गाए जाते, बल्कि उनमंे उनका जीवन छिपा होता है. जब भी महिलाएं खेत-खलियानों में काम करती हैं, तो अक्सर महिलाएं इन गीतों से ऊर्जा का संचार करती हैं. अपनी सुख-दुख को सांझा करती हैं. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम ये गीत ही बनते हैं. जब इन्हें खेतों में पहंुचना होता है तो रास्ते भर गीत गाती हैं. गीत गाते हुए कठिनाइयों से भरा रास्ता अपने आप तय हो जाता है. पता ही नहीं चलता कि कब अपनी मंजिल को पा लिया.
सभी अवसरों पर ये गीत गाये जाते हैं. चाहे वह शादी-ब्याह का अवसर हो या सावन का मौसम. या फिर खाली समय काटने के लिए ही हो.
लोक गीतों में जिन्दगी का वो रहस्य छिपा होता है जो या तो वे स्वयं जी रहीं होती हैं या फिर उनकी मांओं या दादियों ने उसे जीया होता है. ये हमें लेखन में प्राप्त नहीं होता, बल्कि मौखिक रूप से ही ये गीत हमें मिलते हैं. जो पीढ़ी दर पीढ़ी गाए जाते हैं. उस वक्त भले ही उन गीतों के अर्थ वे महिलाएं न जान पाती हों, लेकिन समाज में क्या हो रहा है, वे क्या-क्या सहन करती हैं, उसे अपने इन्हीं गीतों के माध्यम से ये वक्त करती हैं. अपनी बीती किस तरह से ये गीत में लेकर आती हैं, वह जाति-वादी, वर्णवादी-व्यवस्था का क्रूरतम चेहरा दिखा जाती है. उस व्यवस्था के खिलाफ भले ही लड़ने में ये नाकाम रही होती हैं, पर इन लोक गीतों में उसे पिरो देती हैं. अपनी अभिव्यक्ति की आजादी उन्हें मिलती है, जबकी गैरदलित समाज में महिलाओं में विरोध के स्वर हमें कम ही प्राप्त होते हैं. यहां पर व्यवस्था के प्रति विद्रोह मुखर होकर हमारे सामने आता है, चाहे वह महिलाओं से जुड़े शारीरिक अधिकार की बात हो, सुचिता की बात हो या फिर समानत या अपने अस्तित्त्व को बचाये रखने का प्रश्न हो.
अक्सर मैं भी, जब भी मुझे अवसर मिला, परिवार और आस-पड़ोस की महिलाओं, बहनों, चाची-ताईयों के साथ मिलकर ये गीत गा-गाकर खूब नाचा करती थी. मुझे उस वक्त इन गीतों के बोल के अर्थ समझ नहीं आते थे. खूब आनंद आया करता था, जब सभी झुंड में ताली बजा-बजाकर ये गीत गाती थीं. उन सब के पास ढोलक नहीं हुआ करती थी, और न ही संगीत से सम्बन्धित कोई साज-सामान हुआ करता था. बस गले की मधुर आवाज और हाथ से बजती ताली जो एक लय में उठती थी और बजती थी. साथ में हुआ करता था तो एक खाली पीपा जिसे कनस्तर कहा जाता था या फिर तेल की खाली पीपी जो दुकान से मांगकर ली जाती थी, उसी पीपे को मैं बजा रही होती थी. सभी गीत गाती और एक जनी नाचती थी. बजाने में भी बड़ा मजा आता था. पर जैसे जैसे मैं बड़ी हुई और आगे की क्लास में बढ़ती गयी, तो मुझे इन गीतों के बोल समझ आने लगे. अक्सर मैं अब उन गीतों को ध्यान से सुनती थी जो पहले सिर्फ धुन बनकर रह रहे थे जिसको मैं नही समझती थी और उन सब के साथ गाती भर थी. लेकिन अब मैं स्कूल की कक्षा में भी आगे निकल रही थी, जाति-वादी दंश जब-तब चुबने लगा था जो सब के लिए सामान्य था पर मेरे लिए तीर की तरह से चुबता और मन के आर-पार निकल जाता था. मैंने इसी गाने को बार-बार सुनाने के लिए कहा. मैं उस गीत का और उसके गहरे अर्थ का रहस्य जानने की कोशिश कर रही थी जिसके बोल थे-
ना मानै री बामण का छोरा,
आवे सीखर दोपहरी मैं-2
सासु बी सो ग्यी, सुसरा बी सो ग्या,
मेरी सेज चैबारे मंै,
इसी के निदरा छायी मेरे राजा,
जोबन लुटा दोपरी मैं
जोबन का तो जोबन लूट ग्या,
राम प्यारी लुटी दोपरी मैं-2
जेठ बी सो ग्या, जेठानी बी सो ग्यी,
मेरी सेज चैबारे मै-2
इसी के निदरा छायी मेरे राजा,
जोबन लुटया दोपरी मैं
जोबन का तो जोबन लूट ग्या,
राम प्यारी लुटी दोपरी मैं-2
इस गीत से समाज की कई तरह की परतें खुलती दिखायी देती हंै. इसमें महिलाओं के साथ किस तरह के जबरदस्ती के सम्बंध बनाये जाते थे, और महिलाएं किस तरह से अपनी इस तकलीफ को ब्यां करती होंगी, ये हमें साफ-साफ नजर आता है. लोक गीतों में तो उन्हंे अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता मिलती ही थी, जिसमें वे अपने साथ होने वाली ज्यादतियों का बखान कर सकती थी और वे करती भी हैं. पर पुरुष समाज इन सब परिस्थियों को किस नजर से देखता होगा, ये एक बड़ा प्रश्न हमारे बीच से छूट जाता है. अगर इसी गीत का विश्लेषण कर लिया जाये तो यहां पर पुरुष आराम से सोया हुआ है. क्या ये उसकी अनुमति सहमती का प्रतीक तो नहीं था, या फिर वह इस व्यवस्था के आगे इतना समर्पण कर चुका था, कि उसे खामोश रहना ही उचित लगा. स्त्राी ने तो उसे जगाकर अपनी व्यथा को स्पष्ट रूप से कहा, पर क्या वह उस व्यवस्था के खिलाफ उठ पाया था? या हम इसे इस नजरिये से देखें कि गांव में जो ये परम्परा के नाम पर महिला का पहला नथ उतारना जमींदार या सो काल्ड सवर्ण समाज का दबदबा था जिसे वह सर झुका कर स्वीकार करता आ रहा था. शायद क्या यही वजह रही होगी कि जब बेटी घर में जन्म लेती है, तो उसका सिर झुक जाता है और जब बेटा जन्म लेता है तो उसका सिर ऊंचा उठ जाता है. महिलाएं कैसे इस विडम्बना को अपने लोक गीत में मोतियों की माला की तरह पिरोती हैं, जैसे- दृ
एक रंग महल की कूण कन्या नैं
जन्म लिया-2
जब कन्या नै जन्म लिया
उसके दादा जी नै फिकर हुआ-2

दादा तुम क्यू हारे ओ
दादसा म्यारा जीत चैल्या
पोती तेरे कारण हारे ऐ,
पोत्यां के कारण जीत चलै
एक रंग..................
जब कन्या नै जन्म लिया
उसके बाबल जी नै फिकर हुआ,
बाबल तुम क्यू हारे ओ
सुसरा तो म्यारा जीत चैल्या
बेटी तेरे कारण हारे ऐ
बेटयां के कारण जीत चलै
एक रंग..................
इस लोक गीत में भी साफ-साफ बेटे और बेटी में भेद-भाव नजर आता है, जो लड़कियों को कभी भी एक बच्चे की तरह परवरिश नही करने देता. बल्कि उनकी परवरिश लड़की ही मानकर होती है. इसलिए उनके मन-मस्तिष्क का विकास भी इसी तरह से होता है जिसे हम भी प्राकृतिक मानते हैं. जबकि ये प्रकृति ने नहीं बनाया, हम लोगों ने बनाया है. समानता, समता, स्वतंत्राता जैसे शब्द झूठे पड़ने लगते हैं. इसलिए मां-बाप भी उसे एक बेगाना धन और बोझ समझकर ही पालते पोषते हैं और इस बोझ से जितनी जल्दी हो उतनी जल्दी छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं. ये तो बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर की बदौलत है कि लड़कियों की शादी एक उम्र के बाद होनी संविधान में प्रावधान रखकर हमें दे दी गयी है. परन्तु व्यवहारिकता तो आज भी मां-बाप के हाथ में ही होती है. वह चाहे तो बेटी की ठीक उम्र में शादी करें, चाहे पहले करें पर बाद में वही मां अपनी बेटी की चिंता में दिन रात घुटते दिखाई भी देते हैं. पर तब पछताने के लिए अलावा कुछ नहीं मिलता.
शादी के बाद की जिन्दगी पति के रहमोकर्म पर आधारित होती है. उसे कब बच्चे पैदा करने हैं, कितने करने हैं, कैसे रहना है सब कुछ वहीं से तय होता हैं. उसका अपना क्या ? कुछ भी नहीं. मां-बाप ने अपनी जिम्मेदारी की पोटली दूसरे के पाले में फेंक दी और अब उस पोटली को वह जहां जैसे चाहे किसी भी पाले में रखे. ऊपर से उसे महिला होने की भी कीमत चुकानी पड़ती है. कसूर पुरुष करे, पर भुगतान महिलाओं को ही करना है- बिना उसका पक्ष जाने. कैसे इस लोक गीत में वे ब्यां करती है-
ठाकै टोकणी पाणी ने चाली,
ननंदी री रस्ते मैं गोबी का फूल-2
हाथ लम्बैकै तोड़न लागी
ननंदी री माली के पकड़ने दोये हाथ.
चाहे तो री ननंदी कंठी री ले ले-2
ननंदी री घरां ना बताइयै दोये बात
ना तो री भाभी तेरी कंठी की चाना-2
भाभी री घरां बताऊं सारी बात
धार काढदा बीरा बैठा-2
बीरा रे तेरी बहु माली के के साथ-2
चालो रै गोरी खेत मै चलांगे-2
गोरी रै ओड़ै करांगे दोये बात-2
पहली कटारी मेरे पैरां मैं मारी-2
बेबे ऐ लयी दामण की ओट-2
दूजी कटारी मेरी छाती मैं मारी-2
बेबे ऐ लयी घूंघट की ओट-2
तीजी कटारी मेरी पैडू मैं मारी-2
बेबे ऐ लगते के गये  प्राण-2
इसमें किस तरह से महिलाएं अपने अनुभवों को एक दूसरे से सांझा करती हैं. शक की बिनाह पर ही कोई किस तरह से किसी की जान भी ले सकता है. कोई इन्क्वारी नहीं. सब का सब सामाजिक मान्यता प्राप्त.
असल में पुरुष वर्जस्वता का वर्णन हर समय में हर समाज में व्याप्त रहा है. चाहे वह मनु का धर्मशास्त्रा रहा हो, चाहे रामायण काल या महाभारत काल. हर युग में महिलाओं को ही सजा मिली. हमारे सारे शास्त्रों में उनकी अभिव्यक्ति को दबा दिया गया. कहां महाभारत में द्रोपदी की व्यथा हमें सुनायी देती है, हमंे गांधारी और गांधार नरेश का दुख भी कहां नजर आता है? कहां हमें रामायण में लक्ष्मण की पत्नी की पीड़ा नजर आती है, और सरुपणखां का पक्ष हम नहीं जान पाते. रावण की पत्नी मंदोदरी भी रामायण में कहां परिलक्षित की गयी है तो फिर इन लोक गीतों में उनका विद्रोह कहां से नजर आयेगा. अगर आयेगा भी तो साहित्य की श्रेणी में उसे क्यों शामिल किया जायेगा. कवि की लेखनी भी तो इन लोक गीतों पर नहीं चलती जिसमे समाज के कड़वे सच भर हुए हंै. जब विवाह करते ही पुरुष अपनी पत्नी को छोड़ कर दूर चला जाता है तो उसके परिवार वाले ही उसका भोग किया करते हैं. जिसमें उसकी मर्जी नहीं पूछी जाती, बस उसे किसी का पल्ला दे दिया जाता है. और उसके नाम पर ही उसका वंश चलने लगता है. किस तरह से वह अपनी इस पीड़ा को लोक गीतों में गाती है-
दु-पहरे मैं रोटी पोंउं,
धुम्मे के मीस रोऊं ऐ
पति गये परदेस भाण मे
कड़ै जिन्दगी खोऊं ऐ-2
वो बोल्या, तेरे मैलै कपड़े
वो बोली म्यारै दाम नहीं,
वो बोल्या मनिआडर भेजूं
वो बोल्ली भर काम नहीं-2
वो बोल्या मेरे छोरा-छोरी
वो बोली मेरे मर्द नहीं
वो बोल्या में के लागू सू
वो बोली बर जैण नहीं-2
इस गीत में किस तरह से महिलाओं की हालत थी, उसका प्रतिबिंब हमें स्पष्ट दिखायी देता है. समान नागरिक होने का अधिकार कितना मुश्किल होता है, वह न सिर्फ हमें दिखायी देता है बल्कि उसके गहरे निहितार्थ भी महसूस होते हैं. यह आज भी उतना ही मुश्किल है जितना उस समय था, जब हमंे समान नागरिकता के अधिकार प्राप्त नहीं थे. बस उसके मायने बदल गये हैं. आज वह अपने अधिकारों को पाने की जद्दोजहद में जुट गयी है. अब वह अपने अधिकारों को समझती है. इसलिए अब वह अपने पत्नी होने के अधिकार पर भी सवालियां निशान लगाती है. इस गीत में वह अपनी शिकायत यूं दर्ज करती है कि
चंदा जैसी चांदनी, तेरा देवी जैसा
रूप रै गोरी क्यूं रोई थी रात नै,
छुट्टी आये भरतार,
मेरी लयी ना नमस्ते चार,
ऐ मैं न्यूं रोई थी रात नै-2
पैर ओड़ पाणी ने निकरी,
ऐ मैं मैल लिकड़ी ऐ मेरे के मन आयी घात,
कुआं दौगढ़ तार कै ऐ मनै करड़ा घूंघट मार कै मैने जान कुएं मै झोकती-2
काढ़ै देवर-जेठ, मेरा खड़ा लखाव्यै भरतार
गौरी आज कसूत्ती सोच ली
पालने मे रोवै रणधीर रै, तेरे धोरै खड़ा रघबीर रै
गौरी किस के भरोसै छौड़गी-2
इसमें उस समाज की दशा को दिखाया है जो अपनी पत्नी को घर में सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए ही रखा जाता है. वह बाहर जाकर क्या करता है, इससे उसका कोई संबंध नहीं होता. पर यहां पर वह सवाल उठाती है, अपने पत्नी के अधिकार को प्राप्त करना चाहती है. अब उसे ये मंजूर नहीं कि ‘उसका पति बाहर कहीं भी किसी के साथ रहे पर आयेगा तो उसी के पास’ उसे पूर्णता चाहिए जो वह उसको देती है. वह इसके लिए अब अपनी जान पर खेलकर भी सभी महिलाओं के लिए एक सबल बनती है. जो गैर दलित की महिलाओं में नहीं देखा जा सकता.
आज महिलाएं आत्मनिर्भर हैं, समान जगह पर समान प्रतिभा को दिखाती है. इन सब के बावजूद भी महिलाओं को और संघर्ष करके एक जुट होकर आगे आना होगा. मिलकर इस वर्णवादी-जातिवादी, सामंतवादी-पितृसत्तावादी व्यवस्था से लड़ना होगा. वो दिन दूर नहीं जब वे अपनी एकजुटता और संघर्ष से अपनी अस्मिता की स्वयं ही रक्षा करेंगी. ये सभी अधिकार कोई उन्हे थाली में परोसकर नहीं देगा बल्कि उन्हें खुद हासिल करने होंगे.

परिचय:
डा. कौशल पंवार,
जेएनयू से सस्कृत  में पीएच.डी., एम.ए., एम. फिल,
मोतीलाल नेहरू काॅलेज में सहायक प्रोफेसर,  स्टार प्लस पर प्रसारित कार्यक्रम सत्यमेव जयते में 10 जून 2012 को आमिर खान द्वारा लिया इंटरव्यू प्रसारित. डीडी न्यूज , दिनांक 8 मार्च 2013  ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर इंटरव्यू तथाऽ ‘राज्यसभा’, मैला ढोने पर विशेष रिपोर्ट-2013 25 वीं एरियल प्रसारित.
विभिन्न देशों व काॅलेजों, विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने जाती रहती हैं. इनकी कहानियां व अन्य रचनाएं हंस, दलित अस्मिता आदि पत्रा पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं. सम्पर्क: 09999439709
E-mail : koshalpanwar@ymail.com, Panwar.kaushal@gmail.com


Wednesday, 28 May 2014

बलात्कार की शिकार चार दलित लड़कियां और इंसाफ के लिए संघर्ष

-राजेश कश्यप

उत्पीड़न के सन्दर्भ में दलितों का मानना है कि दबंग जातियां अपनी पुरानी जमीन को खिसकते हुए नहीं देखना चाहती. उनको लगता है कि ये जातियां हमारी गुलामी करती थीं. आज इनका जीवन क्यों बदल रहा है? यही कुढ़न इनको दलितों पर अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित करती है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दलितों की इस सोच में कितना दम है? यदि दम है तो फिर यह संकीर्ण मानसिकता कब और कैसे बदलेगी? यदि नहीं तो दलित इस तरह का निष्कर्ष निकालने के लिए विवश क्यों हुए हैं?

रियाणा में दलित उत्पीड़न की स्थिति बेहद गंभीर हो चली है. स्थिति की गंभीरता का अन्दाजा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा हाल ही में हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव को भेजे गए उस पत्रा से बड़ी सहजता से लगाया जा सकता है, जिसमें पिछले तीन वर्षों के दौरान दर्ज हुए दलित उत्पीड़न मामलों का पूरा ब्यौरा 10 दिन के अन्दर देने के निर्देश जारी किए गए हैं. आयोग ने पत्रा के जरिये हरियाणा सरकार से वर्ष 2011-12, वर्ष 2012-13 और वर्ष 2013-14 के दौरान हत्या, बलात्कार, आगजनी, गंभीर चोट व भारतीय दण्ड संहिता के तहत अन्य सभी मामलों का ब्यौरा स्पष्ट तौर पर मांगा है. मुख्य सचिव आयोग को क्या ब्यौरा भेजेंगे, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा, लेकिन हाल-फिलहाल हरियाणा प्रदेश में दलितों की स्थिति अत्यन्त दयनीय एवं चिंतनीय दिखाई दे रही है. जिस तरह से एक के बाद एक मामले संज्ञान में आ रहे हैं, उनसे दलितों में कथित तौर पर दबंगों का खौफ स्पष्ट नजर आ रहा है. इस समय हिसार जिले के गांव भगाणा की चार दलित लड़कियों के साथ हुए गैंगरेप का मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में छाया हुआ है.
गत 23 मार्च, 2014 को रात आठ बजे दबंग जाति के लोगों ने चार दलित परिवार की लड़कियों को घसीटकर कार में डाल लिया और दो दिन तक दर्जन भर युवक गैंगरेप करते रहे. प्राप्त जानकारी के अनुसार ये पीडि़ताएं उन दलित परिवारों की हैं, जिनका गांव के दबंग लोगों ने वर्ष 2011 से जमीन विवाद के चलते सामाजिक बहिष्कार कर रखा है और न्यायालय, मानवाधिकार आयोग एवं अनसूचित जाति आयोग के निर्देशों के बावजूद इस बहिष्कार को समाप्त नहीं किया गया है. पीडि़त परिवार ने बहिष्कार के बावजूद गांव नहीं छोड़ा तो गुस्से से भन्नाये दबंगों ने दलित परिवारों को सबक सिखाने के लिए उनकी चार बेटियों के साथ गैंगरेप के कुकृत्र्य को अंजाम दे डाला. मामले के संज्ञान में आने के बावजूद पुलिस ने दो दिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं की. विरोध के बढ़ते व मामले को गंभीर होता देख 25 मार्च को पुलिस ने एफआईआर दर्ज की.
वर्ष 2011 से जमीन विवाद के चलते सामाजिक बहिष्कार के शिकार पीडि़त दलित परिवार 21 मई, 2012 से न्याय पाने के लिए हिसार के लघु सचिवालय में धरने पर बैठे हैं. कुछ परिवार इस समय दिल्ली के जंतर-मंतर पर न्याय के लिए बैठे हैं. उनकी मांग है कि गैंगरेप मामले के बचे हुए दोषियों को गिरफ्तार किया जाए. यह लोग पीडि़त परिवार व लड़कियों को किसी दूसरी जगह पुनर्वास सुविधा के साथ-साथ आर्थिक सहायता देने की भी मांग कर रहे हैं. मामले में मात्रा 5 दोषियों की गिरफ्तारी के अलावा अन्य कोई प्रगति अभी तक नहीं हुई है. इसी तथ्य से सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है कि सरकार इस मामले के प्रति कितनी सजग और संवेदनशील है.
वर्ष 2010 में घटित हिसार जिले के मिर्चपुर गांव का मामला भी आज तक नहीं सुलझ पाया है. इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय भी हरियाणा सरकार को खरी-खोटी सुना चुका है. लेकिन, हरियाणा सरकार की संवेदनहीनता टूटने का नाम ही नहीं ले रही है. दरअसल, 21 अपै्रल, 2010 को मिर्चपुर में दलित परिवार के एक कुत्ते के भोंकने की सजा दबंग लोगों ने दलित बस्ती को आग में झोंककर दे डाली. इस आगजनी में 70 साल का दलित बुजुर्ग और एक 18 वर्षीय अपंग लड़की जिन्दा जल गए और मौत के इस नंगे नाच से सदमें में आए सौ से अधिक दलित परिवारों को गांव छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा. बेघर हुए इन लोगों को एक समाजसेवी वेदपाल तंवर ने हिसार स्थित अपने फार्म हाऊस में शरण दी और उनकी लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठाया. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी हिसार में पीडि़तों से मिलने के लिए पहुंचे थे. इसके बावजूद पीडि़तों की न्याय के लिए आज भी जंग जारी है. गत 4 अपै्रल को हरियाणा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपना जवाबदावा पेश करते हुए बताया कि मिर्चपुर पर 19 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं, जिसमें सुरक्षा व्यवस्था के लिए सीआरपीएफ पर 11 करोड़, पुलिस पर 4 करोड़ और शेष राशि अन्य कार्यों पर खर्च की गई है. इसके साथ ही दावा किया गया कि पीडि़त परिवारों के 49 लोगों को सरकारी नौकरियां भी दी जा चुकी हैं. हरियाणा सरकार के इस जवाबदावे पर सर्वोच्च न्यायालय ने पीडि़त पक्ष से चार सप्ताह में अपना जवाब पेश करने के आदेश दिए हैं. इस बीच ह्यूमन राइट लाॅ नेटवर्क के स्टेट काॅर्डिनेटर एडवोकेट कल्सन ने बताया है कि सरकारी नौकरी 49 को नहीं, बल्कि चन्द लोगों को ही मिली है. बाकी लोगों को कान्ट्रेक्ट पर लगाया था, जोकि अब हट चुके हैं.

"गत 23 मार्च, 2014 को रात आठ बजे दबंग जाति के लोगों ने चार दलित परिवार की लड़कियों को घसीटकर कार में डाल लिया और दो दिन तक दर्जन भर युवक गैंगरेप करते रहे. प्राप्त जानकारी के अनुसार ये पीडि़ताएं उन दलित परिवारों की हैं, जिनका गाँव के दबंग लोगों ने वर्ष 2011 से जमीन विवाद के चलते सामाजिक बहिष्कार कर रखा है और न्यायालय, मानवाधिकार आयोग एवं अनसूचित जाति आयोग के निर्देशों के बावजूद इस बहिष्कार को समाप्त नहीं किया गया है."

हरियाणा में दलित उत्पीड़न के चन्द मामले नहीं हैं, बल्कि उनकीं एक लंबी फेहरिस्त है. गत वर्ष 25 अगस्त, 2013 को जीन्द जिले के गांव बनियाखेड़ा की 19 वर्षीया डीएड दलित छात्रा का दुष्कर्म के बाद हत्या करके नहर के समीप झाडि़यों में फेंका गया शव मिला. जब पीडि़त पक्ष पुलिस की लापरवाही के खिलाफ सड़कों पर उतरा तो उन पर बड़ी बेरहमी से लाठीचार्ज किया गया. अपै्रल, 2013 में भिवानी जिले के रिवासा गांव में नन्ही बच्ची को दूध पीला रही दलित महिला के साथ दबंगों के सामूहिक बलात्कार करने की शर्मनाक घटना घटी. 29 मार्च, 2013 को हिसार जिले के गांव ढोबी में एक दलित युवा की हत्या करके पानी की टंकी के पास फेंक दिया गया. मार्च, 2013 में ही रोहतक जिले के गांव मदीना में दबंगों ने दलितों के मौहल्ले पर अचानक फायरिंग कर दी, जिसमें दो लोग मारे गए. लंबी जद्दोजहद के बाद मामले को गंभीरता से लिया गया. फरवरी, 2013 में हिसार जिले के सिरसाना गांव में 13 साल की मासूम बच्ची के साथ कई दबंगों द्वारा सामूहिक बलात्कार जैसा घिनौना कुकत्र्य करने का मामला प्रकाश में आया. फरवरी, 2013 में भिवानी जिले के रत्तेरा गांव में दबंगों ने एक दलित युवक की घुड़चढ़ी नहीं निकलने दी और खूब मारपीट की. जनवरी, 2013 में पलवल जिले में कथित तौर पर दबंगों की भीड़ ने दलितों पर भारी हमला बोला और पुलिस द्वारा इस मामले को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया.
3 नवम्बर, 2012 को हिसार के डाया (मंगाली) गांव में एक दलित लड़की के साथ गैंगरेप किया गया और मामले में बलात्कार की दफा 376 तक हटा दी गई. अक्तूबर, 2012 में जीन्द जिले के सच्चाखेड़ा गांव में पांच दबंगों ने एक दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया. यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी अपनी संवदेना जताने पीडि़ता के घर भी पहुंची थीं. बाद में सभी दोषियों को सजा न मिलने से आहत होकर पीडि़ता ने आत्महत्या कर ली. सितम्बर, 2012 में हिसार जिले के डाबड़ा गांव में दबंगों ने एक दलित लड़की को गैंगरेप का शिकार बनाया. घटना से आहत पीडि़ता के पिता ने आत्महत्या कर ली. मई, 2011 में हिसार जिले के भगाणा गांव में दबंगों ने दलितों के मौहल्ले के आगे दीवार खींच दी और उनके हिस्से की ग्राम शामलात जमीन पर कब्जा कर लिया. जब दलितों ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई तो उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया. बहिष्कार के बावजूद दलितों ने गाँव नहीं छोड़ा तो गत 23 मार्च, 2014 को उनकीं चार लड़कियों को अगवा करके गैंगरेप को अंजाम दिया गया. फरवरी, 2011 में हिसार जिले के दौलतपुर गांव में दबंगों ने एक युवा दलित के हाथ इसीलिए काट डाले, क्योंकि खेतों में काम करते समय उसने पेड़ के नीचे रखे मटके से पानी पी लिया था.
ये सब घटनाएं तो सिर्फ बानगी भर हैं. यदि सभी मामलों की सूची तैयार की जाए तो एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो जायेगी. सभी मामलों का यदि बारीकी से अवलोकन किया जाए तो हर किसी की रूह कांप उठती है. प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2009 में अनुसूचित जाति के लोगों पर ज्यादती के 303 मामले दर्ज हुए थे. वर्ष 2010 में यह संख्या बढकर 380 हो गई. इसके अगले वर्ष 2011 में यह संख्या बढ़कर 408 हो गई, जिनमें से 60 मामले दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के शामिल थे. इस तरह से वर्ष 2008 से वर्ष 2011 के दौरान दलित उत्पीड़न में 35 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई. गत वर्ष 2013 में एक शोधकर्ता सरोजबाला ने अपने एक अध्ययन में पाया कि हरियाणा में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले में 15 प्रतिशत की बढ़ौतरी हुई है.
हरियाणा में अक्तूबर, 2012 में चले बलात्कार के अनवरत सिलसिले से खफा होकर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष पी.एल. पूनिया ने हरियाणा को ‘बलात्कार प्रदेश’ की संज्ञा देने को विवश होना पड़ा था. गत वर्ष 17 अक्तूबर, 2013 को सर्वोच्च न्यायालय को मिर्चपुर के दलितों की सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार की संवेदनहीनता पर यह तल्ख टिप्पणी करने पर मजबूर होना पड़ा कि इन लोगों का एकमात्रा दोष गरीब और ऊपर से दलित होना है. सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि क्या जाति विशेष को कानून हाथ में लेने व लोगों को मारने की पूरी छूट है? गतवर्ष 2013 में ही तत्कालीन केन्द्रीय मंत्राी कुमारी शैलजा ने दलितों पर बढ़ते अत्याचारों से आहत होकर यह कहने पर विवश होना पड़ा कि हरियाणा में दलित होना पाप है. इन्हीं सब तथ्यों की पुष्टि हरियाणा कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर ने की है. उन्होंने मीडिया के साथ बातचीत में कहा कि प्रदेश का दलित वर्ग खुद को असुरक्षित महसूस करता है. दलितों की आवाज राज्य सरकार ने नहीं सुनीं, लेकिन अब कांग्रेस संगठन उनकी बात सुनेगा. इन सबके ठीक उलट प्रदेश की भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सरकार दलितों पर अत्याचार बढ़ने के आरोपों को सिरे से नकार रही है और अन्य सभी दलों से अधिक दलित-हितैषी होने का दावा कर रही है.
इस उत्पीड़न के सन्दर्भ में दलितों का मानना है कि दबंग जातियां अपनी पुरानी जमीन को खिसकते हुए नहीं देखना चाहती. उनको लगता है कि ये जातियां हमारी गुलामी करती थीं. आज इनका जीवन क्यों बदल रहा है? यही कुढ़न इनको दलितों पर अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित करती है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दलितों की इस सोच में कितना दम है? यदि दम है तो फिर यह संकीर्ण मानसिकता कब और कैसे बदलेगी? यदि नहीं तो दलित इस तरह का निष्कर्ष निकालने के लिए विवश क्यों हुए हैं?
  
राजेश कश्यप स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं.
हिन्दी और पत्राकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर. दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी. प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित. आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित. दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित. कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल.
स्थायी सम्पर्क: म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर, गाँव टिटौली, जिला. रोहतक, हरियाणा-124005
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