मान्यवर बाबा साहब
सादर प्रणाम!
ब्रिटिश काल में शिक्षा के दायरे को बढ़ाने के प्रयास निरंतर हुए और उस समय सबके लिए समान शिक्षा के सिद्धांत की ओर बढ़ा गया। किंतु, सामाजिक ढाँचे में अंतर्निहित ग़ैरबराबरी के व्यवहार ने इसे लागू होने में क़दम-क़दम पर बाधा उत्पन्न की। आपसे ज़्यादा शिक्षा के इदारों में होने वाले भेदभाव को भला कौन जान सकता है! उसको याद करके मैं आपको और स्वयं को कष्ट नहीं देना चाहता। इस दृष्टि से हमने प्रगति तो की है किंतु अब भी जाति आधारित भेदभाव से सामाजिक वातावरण पर्याप्त रूप से स्वच्छ नहीं हुआ है। यह प्रदूषण स्कूल और कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालयों तक व्याप्त है। इसके विरुद्ध आपकी प्रतिबद्धता और संघर्ष निरंतर प्रेरणा बन रहा है। इसीलिए विद्यार्थियों के आंदोलनों में आपके विचार पथप्रदर्शक का कार्य कर रहे हैं। आपके विचारों की आज सर्वाधिक प्रासंगिकता है।
उत्पीडितों को शिक्षित करने की आवश्यकता को आपने नए सिरे से परिभाषित किया था। इस संदर्भ में पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान का पक्ष लिया। अपने यहाँ वाला वर्ण श्रेष्ठता आधारित ज्ञान तो सदा से उत्पीडितों के विरुद्ध ही था। वर्ण और उससे विकसित जाति व्यवस्था तो एक मनुष्य को दूसरेसे हीन बताने के सिद्धांत पर टिकी थी। उसका सारा ज्ञान ब्राह्मण श्रेष्ठता को साबित करने में ख़र्च होता था। अतः आपका संघर्ष इसी विरुद्ध शुरू हुआ।
परंपरा का अवलोकन करने के क्रम में आप बुद्ध के दर्शन की ओर गए। बुद्ध की शिक्षाओं को आधुनिक समता के सिद्धांत के अनुकूल पाया इसीलिए उसे अपनाया। आपने करुणा, समता, अहिंसा और न्याय की अवधारणाओं को नए समाज के निर्माण के लिए उपयुक्त पाया अत: उसे अपने विचारों में शामिल किया। मध्ययुग के प्रसिद्ध संत कवि कबीर की शिक्षाओं से जड़ शास्त्र से बहस करके उसे निरुत्तर करने की नायाब तरकीब पाई। इसके उपरांत आधुनिक युग के नवजागरण में महामानव ज्योतिबा फुले के विचारों ने आपको अत्यंत प्रभावित किया। स्वयं उनके द्वारा स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों का आप पर विशेष प्रभाव पड़ा। इसीलिए आपने बुद्ध, कबीर और फुले की त्रयी को अपने महान शिक्षक माना है।
आपने यूरोप के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में उच्चतम शिक्षा और अनुसंधान किए। इस दृष्टि से दलित-बहुजन के साथ समस्त उत्पीड़ित बहुसंख्यक तबके का पथ प्रदर्शित किया। ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में आपका कार्य उल्लेखनीय रहा। विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान उल्लेखनीय है। इन क्षेत्रों में आपकी समझ के आधार पर सत्ता को आम जन के प्रति जवाबदेह बनाया जा सका है। अर्थशास्त्र में आपके दृष्टिकोण को अमृत्य सेन सरीखे अर्थशास्त्री ने अपना पथ प्रदर्शक माना है।
आपने संविधान में ऐसे तमाम उपबन्ध किए जिससे वर्ण, वर्ग, लिंग क्षेत्र और अन्य विविध आधारों पर भेदभाव को निर्मूल किया जा सके। इसीलिए आपने शिक्षा के संस्थानों में दुर्बल अस्मिताओं के लिए पहुँच सुनिश्चित करवाने के लिए आवश्यक नियम-उपनियम निर्धारित किए। आपके द्वारा किए गए इन कार्यों से काफ़ी हद तक
लाभ पहुँचा है परंतु हज़ारों वर्ष की जड़ता, प्राचीन संस्कार और मूल्य टूटना अभी प्रतीक्षित है। स्त्री शोषण मुक्ति के लिए आपने शिक्षा को अहम औज़ार के रूप में रखा। इसके लिए वयस्क मताधिकार को अनिवार्य बनाया जबकि यूरोप के आधुनिक कहे जाने वाले अनेक देश इस दृष्टि से पिछड़ी समझ के थे। भारत में भी अनेक राष्ट्रीय नेता इसके विरुद्ध थे। आप शिक्षा सहित सभी संस्थानो में स्त्री भागीदारी को स्वस्थ लोकतंत्र का आधार समझते थे।
लाभ पहुँचा है परंतु हज़ारों वर्ष की जड़ता, प्राचीन संस्कार और मूल्य टूटना अभी प्रतीक्षित है। स्त्री शोषण मुक्ति के लिए आपने शिक्षा को अहम औज़ार के रूप में रखा। इसके लिए वयस्क मताधिकार को अनिवार्य बनाया जबकि यूरोप के आधुनिक कहे जाने वाले अनेक देश इस दृष्टि से पिछड़ी समझ के थे। भारत में भी अनेक राष्ट्रीय नेता इसके विरुद्ध थे। आप शिक्षा सहित सभी संस्थानो में स्त्री भागीदारी को स्वस्थ लोकतंत्र का आधार समझते थे।
शिक्षा ऐसा औज़ार है जिससे तर्क और वैज्ञानिक बोध के आधार पर चिंतन करने पर बल दिया जाना आवश्यक है। इस बात पर आपने मुसलसल ज़ोर दिया कि शिक्षा का वातावरण ऐसा हो जिसमें धार्मिक आडंबर, उससे जुड़े rituals के लिए कोई स्थान न हो क्योंकि ये तर्क आधारित आधुनिक शिक्षा के विरुद्ध है। आपने इस बात की पुरज़ोर वकालत की। संविधान में भी ऐसे अनेक उपबन्ध किए जो इस बोध को प्रोत्साहित करते हैं किंतु एक अध्यापक होने के नाते मैं संवैधानिक प्रावधानों की अवेहलना होते देखता हूँ तो अफ़सोस होता है। मुझे लगता है कि संविधान में वर्णित मूल्यों को अपनाने में और दकियानूसी समाज के प्रतिनिधियों द्वारा इन्हें स्वीकार करने में ख़ासा परेशानी हो रही है। इन मूल्यों को लागू करवाने में आपके द्वारा बताए गए निर्देशों की निरंतर आवश्यकता है।
आपके मिशन का सहयोगी
डॉ. गुलाब सिंह
Mobile: 9968399711
Mobile: 9968399711



डॉ. गुलाब ने जो लिखा वह सच है।
ReplyDeleteशिक्षा के democratization ने समाज में क्रांतिकारी बदलावों को जन्म दिया है।
आज हमें कर्मकाण्डीय विधानों से बचना है और वैज्ञानिक सोच को मजबूत करना है।