Monday, 2 June 2014

लोक गीतों में झलकता दलित समाज


- डा.कौशल पंवार
साहित्य समाज का प्रतिबिंब होता है. समाज के रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान सब का प्रभाव साहित्य पर पड़ता है. किसी भी देश-विशेष, काल-विशेष का अध्ययन करना हो तो उस तात्कालीन परिवेश को जानना अति आवश्यक होता है जिसमें वह समाज अपने तमाम सांस्कृतिक परिवेश के साथ रह रहा होता है, तभी हम उस समय की सामाजिक स्थिति का पता लगा सकते हैं. साहित्य में परिलक्षित समाज उसका बहुत बड़ा मापदण्ड हो सकता है पर उस समाज में गाए जाने वाले लोक गीत भी समाज का आईना बनते हैं. अगर हम एक विशेष तबके की बात करें तो दलित समाज में गाए जाने वाले लोक गीतों को लिया जा सकता है. गांव की बहुल दलित आबादी अपना मनोरंजन इन लोक गीतों के माध्यम से ही करती आयी है. भले ही आज रेडियो, डीजे और टेलीविजन का प्रभाव मानस पटल पर छाया हुआ है पर इन सब के बावजूद भी कई अवसरों पर महिलाएं इन्हीं लोक गीतों को गा-गाकर अपनी पूंजी को सम्भालकर रखती हैं. ये लोक गीत केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं गाए जाते, बल्कि उनमंे उनका जीवन छिपा होता है. जब भी महिलाएं खेत-खलियानों में काम करती हैं, तो अक्सर महिलाएं इन गीतों से ऊर्जा का संचार करती हैं. अपनी सुख-दुख को सांझा करती हैं. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम ये गीत ही बनते हैं. जब इन्हें खेतों में पहंुचना होता है तो रास्ते भर गीत गाती हैं. गीत गाते हुए कठिनाइयों से भरा रास्ता अपने आप तय हो जाता है. पता ही नहीं चलता कि कब अपनी मंजिल को पा लिया.
सभी अवसरों पर ये गीत गाये जाते हैं. चाहे वह शादी-ब्याह का अवसर हो या सावन का मौसम. या फिर खाली समय काटने के लिए ही हो.
लोक गीतों में जिन्दगी का वो रहस्य छिपा होता है जो या तो वे स्वयं जी रहीं होती हैं या फिर उनकी मांओं या दादियों ने उसे जीया होता है. ये हमें लेखन में प्राप्त नहीं होता, बल्कि मौखिक रूप से ही ये गीत हमें मिलते हैं. जो पीढ़ी दर पीढ़ी गाए जाते हैं. उस वक्त भले ही उन गीतों के अर्थ वे महिलाएं न जान पाती हों, लेकिन समाज में क्या हो रहा है, वे क्या-क्या सहन करती हैं, उसे अपने इन्हीं गीतों के माध्यम से ये वक्त करती हैं. अपनी बीती किस तरह से ये गीत में लेकर आती हैं, वह जाति-वादी, वर्णवादी-व्यवस्था का क्रूरतम चेहरा दिखा जाती है. उस व्यवस्था के खिलाफ भले ही लड़ने में ये नाकाम रही होती हैं, पर इन लोक गीतों में उसे पिरो देती हैं. अपनी अभिव्यक्ति की आजादी उन्हें मिलती है, जबकी गैरदलित समाज में महिलाओं में विरोध के स्वर हमें कम ही प्राप्त होते हैं. यहां पर व्यवस्था के प्रति विद्रोह मुखर होकर हमारे सामने आता है, चाहे वह महिलाओं से जुड़े शारीरिक अधिकार की बात हो, सुचिता की बात हो या फिर समानत या अपने अस्तित्त्व को बचाये रखने का प्रश्न हो.
अक्सर मैं भी, जब भी मुझे अवसर मिला, परिवार और आस-पड़ोस की महिलाओं, बहनों, चाची-ताईयों के साथ मिलकर ये गीत गा-गाकर खूब नाचा करती थी. मुझे उस वक्त इन गीतों के बोल के अर्थ समझ नहीं आते थे. खूब आनंद आया करता था, जब सभी झुंड में ताली बजा-बजाकर ये गीत गाती थीं. उन सब के पास ढोलक नहीं हुआ करती थी, और न ही संगीत से सम्बन्धित कोई साज-सामान हुआ करता था. बस गले की मधुर आवाज और हाथ से बजती ताली जो एक लय में उठती थी और बजती थी. साथ में हुआ करता था तो एक खाली पीपा जिसे कनस्तर कहा जाता था या फिर तेल की खाली पीपी जो दुकान से मांगकर ली जाती थी, उसी पीपे को मैं बजा रही होती थी. सभी गीत गाती और एक जनी नाचती थी. बजाने में भी बड़ा मजा आता था. पर जैसे जैसे मैं बड़ी हुई और आगे की क्लास में बढ़ती गयी, तो मुझे इन गीतों के बोल समझ आने लगे. अक्सर मैं अब उन गीतों को ध्यान से सुनती थी जो पहले सिर्फ धुन बनकर रह रहे थे जिसको मैं नही समझती थी और उन सब के साथ गाती भर थी. लेकिन अब मैं स्कूल की कक्षा में भी आगे निकल रही थी, जाति-वादी दंश जब-तब चुबने लगा था जो सब के लिए सामान्य था पर मेरे लिए तीर की तरह से चुबता और मन के आर-पार निकल जाता था. मैंने इसी गाने को बार-बार सुनाने के लिए कहा. मैं उस गीत का और उसके गहरे अर्थ का रहस्य जानने की कोशिश कर रही थी जिसके बोल थे-
ना मानै री बामण का छोरा,
आवे सीखर दोपहरी मैं-2
सासु बी सो ग्यी, सुसरा बी सो ग्या,
मेरी सेज चैबारे मंै,
इसी के निदरा छायी मेरे राजा,
जोबन लुटा दोपरी मैं
जोबन का तो जोबन लूट ग्या,
राम प्यारी लुटी दोपरी मैं-2
जेठ बी सो ग्या, जेठानी बी सो ग्यी,
मेरी सेज चैबारे मै-2
इसी के निदरा छायी मेरे राजा,
जोबन लुटया दोपरी मैं
जोबन का तो जोबन लूट ग्या,
राम प्यारी लुटी दोपरी मैं-2
इस गीत से समाज की कई तरह की परतें खुलती दिखायी देती हंै. इसमें महिलाओं के साथ किस तरह के जबरदस्ती के सम्बंध बनाये जाते थे, और महिलाएं किस तरह से अपनी इस तकलीफ को ब्यां करती होंगी, ये हमें साफ-साफ नजर आता है. लोक गीतों में तो उन्हंे अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता मिलती ही थी, जिसमें वे अपने साथ होने वाली ज्यादतियों का बखान कर सकती थी और वे करती भी हैं. पर पुरुष समाज इन सब परिस्थियों को किस नजर से देखता होगा, ये एक बड़ा प्रश्न हमारे बीच से छूट जाता है. अगर इसी गीत का विश्लेषण कर लिया जाये तो यहां पर पुरुष आराम से सोया हुआ है. क्या ये उसकी अनुमति सहमती का प्रतीक तो नहीं था, या फिर वह इस व्यवस्था के आगे इतना समर्पण कर चुका था, कि उसे खामोश रहना ही उचित लगा. स्त्राी ने तो उसे जगाकर अपनी व्यथा को स्पष्ट रूप से कहा, पर क्या वह उस व्यवस्था के खिलाफ उठ पाया था? या हम इसे इस नजरिये से देखें कि गांव में जो ये परम्परा के नाम पर महिला का पहला नथ उतारना जमींदार या सो काल्ड सवर्ण समाज का दबदबा था जिसे वह सर झुका कर स्वीकार करता आ रहा था. शायद क्या यही वजह रही होगी कि जब बेटी घर में जन्म लेती है, तो उसका सिर झुक जाता है और जब बेटा जन्म लेता है तो उसका सिर ऊंचा उठ जाता है. महिलाएं कैसे इस विडम्बना को अपने लोक गीत में मोतियों की माला की तरह पिरोती हैं, जैसे- दृ
एक रंग महल की कूण कन्या नैं
जन्म लिया-2
जब कन्या नै जन्म लिया
उसके दादा जी नै फिकर हुआ-2

दादा तुम क्यू हारे ओ
दादसा म्यारा जीत चैल्या
पोती तेरे कारण हारे ऐ,
पोत्यां के कारण जीत चलै
एक रंग..................
जब कन्या नै जन्म लिया
उसके बाबल जी नै फिकर हुआ,
बाबल तुम क्यू हारे ओ
सुसरा तो म्यारा जीत चैल्या
बेटी तेरे कारण हारे ऐ
बेटयां के कारण जीत चलै
एक रंग..................
इस लोक गीत में भी साफ-साफ बेटे और बेटी में भेद-भाव नजर आता है, जो लड़कियों को कभी भी एक बच्चे की तरह परवरिश नही करने देता. बल्कि उनकी परवरिश लड़की ही मानकर होती है. इसलिए उनके मन-मस्तिष्क का विकास भी इसी तरह से होता है जिसे हम भी प्राकृतिक मानते हैं. जबकि ये प्रकृति ने नहीं बनाया, हम लोगों ने बनाया है. समानता, समता, स्वतंत्राता जैसे शब्द झूठे पड़ने लगते हैं. इसलिए मां-बाप भी उसे एक बेगाना धन और बोझ समझकर ही पालते पोषते हैं और इस बोझ से जितनी जल्दी हो उतनी जल्दी छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं. ये तो बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर की बदौलत है कि लड़कियों की शादी एक उम्र के बाद होनी संविधान में प्रावधान रखकर हमें दे दी गयी है. परन्तु व्यवहारिकता तो आज भी मां-बाप के हाथ में ही होती है. वह चाहे तो बेटी की ठीक उम्र में शादी करें, चाहे पहले करें पर बाद में वही मां अपनी बेटी की चिंता में दिन रात घुटते दिखाई भी देते हैं. पर तब पछताने के लिए अलावा कुछ नहीं मिलता.
शादी के बाद की जिन्दगी पति के रहमोकर्म पर आधारित होती है. उसे कब बच्चे पैदा करने हैं, कितने करने हैं, कैसे रहना है सब कुछ वहीं से तय होता हैं. उसका अपना क्या ? कुछ भी नहीं. मां-बाप ने अपनी जिम्मेदारी की पोटली दूसरे के पाले में फेंक दी और अब उस पोटली को वह जहां जैसे चाहे किसी भी पाले में रखे. ऊपर से उसे महिला होने की भी कीमत चुकानी पड़ती है. कसूर पुरुष करे, पर भुगतान महिलाओं को ही करना है- बिना उसका पक्ष जाने. कैसे इस लोक गीत में वे ब्यां करती है-
ठाकै टोकणी पाणी ने चाली,
ननंदी री रस्ते मैं गोबी का फूल-2
हाथ लम्बैकै तोड़न लागी
ननंदी री माली के पकड़ने दोये हाथ.
चाहे तो री ननंदी कंठी री ले ले-2
ननंदी री घरां ना बताइयै दोये बात
ना तो री भाभी तेरी कंठी की चाना-2
भाभी री घरां बताऊं सारी बात
धार काढदा बीरा बैठा-2
बीरा रे तेरी बहु माली के के साथ-2
चालो रै गोरी खेत मै चलांगे-2
गोरी रै ओड़ै करांगे दोये बात-2
पहली कटारी मेरे पैरां मैं मारी-2
बेबे ऐ लयी दामण की ओट-2
दूजी कटारी मेरी छाती मैं मारी-2
बेबे ऐ लयी घूंघट की ओट-2
तीजी कटारी मेरी पैडू मैं मारी-2
बेबे ऐ लगते के गये  प्राण-2
इसमें किस तरह से महिलाएं अपने अनुभवों को एक दूसरे से सांझा करती हैं. शक की बिनाह पर ही कोई किस तरह से किसी की जान भी ले सकता है. कोई इन्क्वारी नहीं. सब का सब सामाजिक मान्यता प्राप्त.
असल में पुरुष वर्जस्वता का वर्णन हर समय में हर समाज में व्याप्त रहा है. चाहे वह मनु का धर्मशास्त्रा रहा हो, चाहे रामायण काल या महाभारत काल. हर युग में महिलाओं को ही सजा मिली. हमारे सारे शास्त्रों में उनकी अभिव्यक्ति को दबा दिया गया. कहां महाभारत में द्रोपदी की व्यथा हमें सुनायी देती है, हमंे गांधारी और गांधार नरेश का दुख भी कहां नजर आता है? कहां हमें रामायण में लक्ष्मण की पत्नी की पीड़ा नजर आती है, और सरुपणखां का पक्ष हम नहीं जान पाते. रावण की पत्नी मंदोदरी भी रामायण में कहां परिलक्षित की गयी है तो फिर इन लोक गीतों में उनका विद्रोह कहां से नजर आयेगा. अगर आयेगा भी तो साहित्य की श्रेणी में उसे क्यों शामिल किया जायेगा. कवि की लेखनी भी तो इन लोक गीतों पर नहीं चलती जिसमे समाज के कड़वे सच भर हुए हंै. जब विवाह करते ही पुरुष अपनी पत्नी को छोड़ कर दूर चला जाता है तो उसके परिवार वाले ही उसका भोग किया करते हैं. जिसमें उसकी मर्जी नहीं पूछी जाती, बस उसे किसी का पल्ला दे दिया जाता है. और उसके नाम पर ही उसका वंश चलने लगता है. किस तरह से वह अपनी इस पीड़ा को लोक गीतों में गाती है-
दु-पहरे मैं रोटी पोंउं,
धुम्मे के मीस रोऊं ऐ
पति गये परदेस भाण मे
कड़ै जिन्दगी खोऊं ऐ-2
वो बोल्या, तेरे मैलै कपड़े
वो बोली म्यारै दाम नहीं,
वो बोल्या मनिआडर भेजूं
वो बोल्ली भर काम नहीं-2
वो बोल्या मेरे छोरा-छोरी
वो बोली मेरे मर्द नहीं
वो बोल्या में के लागू सू
वो बोली बर जैण नहीं-2
इस गीत में किस तरह से महिलाओं की हालत थी, उसका प्रतिबिंब हमें स्पष्ट दिखायी देता है. समान नागरिक होने का अधिकार कितना मुश्किल होता है, वह न सिर्फ हमें दिखायी देता है बल्कि उसके गहरे निहितार्थ भी महसूस होते हैं. यह आज भी उतना ही मुश्किल है जितना उस समय था, जब हमंे समान नागरिकता के अधिकार प्राप्त नहीं थे. बस उसके मायने बदल गये हैं. आज वह अपने अधिकारों को पाने की जद्दोजहद में जुट गयी है. अब वह अपने अधिकारों को समझती है. इसलिए अब वह अपने पत्नी होने के अधिकार पर भी सवालियां निशान लगाती है. इस गीत में वह अपनी शिकायत यूं दर्ज करती है कि
चंदा जैसी चांदनी, तेरा देवी जैसा
रूप रै गोरी क्यूं रोई थी रात नै,
छुट्टी आये भरतार,
मेरी लयी ना नमस्ते चार,
ऐ मैं न्यूं रोई थी रात नै-2
पैर ओड़ पाणी ने निकरी,
ऐ मैं मैल लिकड़ी ऐ मेरे के मन आयी घात,
कुआं दौगढ़ तार कै ऐ मनै करड़ा घूंघट मार कै मैने जान कुएं मै झोकती-2
काढ़ै देवर-जेठ, मेरा खड़ा लखाव्यै भरतार
गौरी आज कसूत्ती सोच ली
पालने मे रोवै रणधीर रै, तेरे धोरै खड़ा रघबीर रै
गौरी किस के भरोसै छौड़गी-2
इसमें उस समाज की दशा को दिखाया है जो अपनी पत्नी को घर में सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए ही रखा जाता है. वह बाहर जाकर क्या करता है, इससे उसका कोई संबंध नहीं होता. पर यहां पर वह सवाल उठाती है, अपने पत्नी के अधिकार को प्राप्त करना चाहती है. अब उसे ये मंजूर नहीं कि ‘उसका पति बाहर कहीं भी किसी के साथ रहे पर आयेगा तो उसी के पास’ उसे पूर्णता चाहिए जो वह उसको देती है. वह इसके लिए अब अपनी जान पर खेलकर भी सभी महिलाओं के लिए एक सबल बनती है. जो गैर दलित की महिलाओं में नहीं देखा जा सकता.
आज महिलाएं आत्मनिर्भर हैं, समान जगह पर समान प्रतिभा को दिखाती है. इन सब के बावजूद भी महिलाओं को और संघर्ष करके एक जुट होकर आगे आना होगा. मिलकर इस वर्णवादी-जातिवादी, सामंतवादी-पितृसत्तावादी व्यवस्था से लड़ना होगा. वो दिन दूर नहीं जब वे अपनी एकजुटता और संघर्ष से अपनी अस्मिता की स्वयं ही रक्षा करेंगी. ये सभी अधिकार कोई उन्हे थाली में परोसकर नहीं देगा बल्कि उन्हें खुद हासिल करने होंगे.

परिचय:
डा. कौशल पंवार,
जेएनयू से सस्कृत  में पीएच.डी., एम.ए., एम. फिल,
मोतीलाल नेहरू काॅलेज में सहायक प्रोफेसर,  स्टार प्लस पर प्रसारित कार्यक्रम सत्यमेव जयते में 10 जून 2012 को आमिर खान द्वारा लिया इंटरव्यू प्रसारित. डीडी न्यूज , दिनांक 8 मार्च 2013  ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर इंटरव्यू तथाऽ ‘राज्यसभा’, मैला ढोने पर विशेष रिपोर्ट-2013 25 वीं एरियल प्रसारित.
विभिन्न देशों व काॅलेजों, विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने जाती रहती हैं. इनकी कहानियां व अन्य रचनाएं हंस, दलित अस्मिता आदि पत्रा पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं. सम्पर्क: 09999439709
E-mail : koshalpanwar@ymail.com, Panwar.kaushal@gmail.com


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