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Tuesday, 14 April 2020

बाबा साहब के नाम ख़त

मान्यवर बाबा साहब 

सादर प्रणाम!

आपने कहा था: शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो ! मैंने इस सूत्र को जीवन में क्रियान्वित करने का प्रयास निरंतर किया। इसीलिए मैंने आपके इस सूत्र के पहले हिस्से को अपना कैरियर बना लिया। यानि मैं एक शिक्षक हूँ । शिक्षा तो निरंतर चलने वाला कार्य और व्यवहार है। शिक्षा को सही-सही समझने के प्रयास होते रहे हैं। आपने शिक्षा को शेरनी का दूध कह कर शिक्षा के समाज को सशक्त करने में महत्व को रेखांकित किया था। शिक्षा को महत्व देने वाले आपके विचार को ख़ुद UNESCO ने अपनाया और  Knowledge  is power कहा।


ब्रिटिश काल में शिक्षा के दायरे को बढ़ाने के प्रयास निरंतर हुए और उस समय सबके लिए समान शिक्षा के सिद्धांत की ओर बढ़ा गया। किंतु, सामाजिक ढाँचे में अंतर्निहित ग़ैरबराबरी के व्यवहार ने इसे लागू होने में क़दम-क़दम पर बाधा उत्पन्न की। आपसे ज़्यादा शिक्षा के इदारों में होने वाले भेदभाव को भला कौन जान सकता है! उसको याद करके मैं आपको और स्वयं को कष्ट नहीं देना चाहता। इस दृष्टि से हमने प्रगति तो की है किंतु अब भी जाति आधारित भेदभाव से सामाजिक वातावरण पर्याप्त रूप से स्वच्छ नहीं हुआ है। यह प्रदूषण स्कूल और कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालयों तक व्याप्त है। इसके विरुद्ध आपकी प्रतिबद्धता और संघर्ष निरंतर प्रेरणा बन रहा है। इसीलिए विद्यार्थियों के आंदोलनों में आपके विचार पथप्रदर्शक का कार्य कर रहे हैं। आपके विचारों की आज सर्वाधिक प्रासंगिकता है।

उत्पीडितों को शिक्षित करने की आवश्यकता को आपने नए सिरे से परिभाषित किया था। इस संदर्भ में पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान का पक्ष लिया। अपने यहाँ वाला वर्ण श्रेष्ठता आधारित ज्ञान तो सदा से उत्पीडितों के विरुद्ध ही था। वर्ण और उससे विकसित जाति व्यवस्था तो एक मनुष्य को दूसरेसे हीन बताने  के सिद्धांत पर टिकी थी। उसका सारा ज्ञान ब्राह्मण श्रेष्ठता को साबित करने में ख़र्च होता था। अतः आपका संघर्ष इसी  विरुद्ध शुरू हुआ।

परंपरा का अवलोकन करने के क्रम में आप बुद्ध के दर्शन की ओर गए। बुद्ध की शिक्षाओं को आधुनिक समता के सिद्धांत के अनुकूल पाया इसीलिए उसे अपनाया। आपने करुणा, समता, अहिंसा और न्याय की अवधारणाओं को नए समाज के निर्माण के लिए उपयुक्त पाया अत: उसे अपने विचारों में शामिल किया। मध्ययुग के प्रसिद्ध संत कवि कबीर की शिक्षाओं से जड़ शास्त्र से बहस करके उसे निरुत्तर  करने की नायाब तरकीब पाई। इसके उपरांत  आधुनिक युग के नवजागरण में महामानव ज्योतिबा फुले के विचारों ने आपको अत्यंत प्रभावित किया। स्वयं उनके द्वारा स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों का आप पर विशेष प्रभाव पड़ा। इसीलिए आपने बुद्ध, कबीर और फुले की त्रयी को अपने महान शिक्षक माना है।

आपने यूरोप के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में उच्चतम शिक्षा और अनुसंधान किए। इस दृष्टि से दलित-बहुजन के साथ समस्त उत्पीड़ित बहुसंख्यक तबके का पथ प्रदर्शित किया। ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में आपका कार्य उल्लेखनीय रहा। विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान उल्लेखनीय है। इन क्षेत्रों में आपकी समझ के आधार पर सत्ता को आम जन के प्रति जवाबदेह बनाया जा सका है। अर्थशास्त्र में आपके दृष्टिकोण को अमृत्य सेन सरीखे अर्थशास्त्री ने अपना पथ प्रदर्शक माना है। 

आपने संविधान में ऐसे तमाम उपबन्ध किए जिससे वर्ण, वर्ग, लिंग क्षेत्र और अन्य विविध आधारों पर भेदभाव को निर्मूल किया जा सके। इसीलिए आपने शिक्षा के संस्थानों में दुर्बल अस्मिताओं के लिए पहुँच सुनिश्चित करवाने के लिए आवश्यक नियम-उपनियम निर्धारित किए। आपके द्वारा किए गए इन कार्यों से काफ़ी हद तक
लाभ पहुँचा है परंतु हज़ारों वर्ष की जड़ता, प्राचीन संस्कार और मूल्य टूटना अभी प्रतीक्षित है। स्त्री शोषण मुक्ति के लिए आपने शिक्षा को अहम औज़ार के रूप में रखा। इसके लिए वयस्क मताधिकार को अनिवार्य बनाया जबकि यूरोप के आधुनिक कहे जाने वाले अनेक देश इस दृष्टि से पिछड़ी समझ के थे। भारत में भी अनेक राष्ट्रीय नेता इसके विरुद्ध थे। आप शिक्षा सहित सभी संस्थानो में स्त्री भागीदारी को स्वस्थ लोकतंत्र का आधार समझते थे।

शिक्षा ऐसा औज़ार है जिससे तर्क और वैज्ञानिक बोध के आधार पर चिंतन करने पर बल दिया जाना आवश्यक है। इस बात पर आपने मुसलसल ज़ोर दिया कि शिक्षा का वातावरण ऐसा हो जिसमें धार्मिक आडंबर, उससे जुड़े rituals के लिए कोई स्थान न हो क्योंकि ये तर्क आधारित आधुनिक शिक्षा के विरुद्ध है। आपने इस बात की पुरज़ोर वकालत की। संविधान में भी ऐसे अनेक उपबन्ध किए जो इस बोध को प्रोत्साहित करते हैं किंतु एक अध्यापक होने के नाते मैं संवैधानिक प्रावधानों की अवेहलना होते देखता हूँ तो अफ़सोस होता है। मुझे लगता है कि संविधान में वर्णित मूल्यों को अपनाने में और दकियानूसी समाज के प्रतिनिधियों द्वारा इन्हें स्वीकार करने में ख़ासा परेशानी हो रही है। इन मूल्यों को लागू करवाने में आपके द्वारा बताए गए निर्देशों की निरंतर आवश्यकता है।

आपके मिशन का सहयोगी
डॉ. गुलाब सिंह
Mobile: 9968399711

Friday, 20 December 2019

अपनाएं ये खास तरीके ताकि दुरुस्त रहे दिमाग




हम लोग बहुत टोका-टाकी करने पर अपने शरीर की ओर तो ध्यान देते हैं, लेकिन अपने दिमाग को अकसर नजरअंदाज करते रहते हैं। आज भी देश के कई हिस्सों में अगर कोई डिप्रेशन की शिकायत कर दे, तो उसे पागल कहा जाता है। पर इस सोच में तब्दीली आना बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह जरूरी है कि लोग इस विषय पर खुल कर बातें करें, ताकि इससे जुड़ी धारणाओं को तोड़ा जा सके। कुछ बिंदुओं पर ध्यान देकर आप मानसिक तौर पर स्वस्थ रह सकते हैं।
संकेतों को नजरअंदाज करना सही नहीं : 
हम मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित संकेतों को कभी जान-बूझ कर तो कभी अनजाने में अनदेखा करते हैं। समाज सेवक नीरज दोशी कहते हैं, ‘मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे लोगों को समझा नहीं जाता। यह एक बड़ी समस्या है। हमारे समाज में ऐसी चीजों पर बात करना मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख कहते हैं, ‘मानसिक स्वास्थ्य जीवन की समग्र गुणवत्ता को निर्धारित करने में मदद करता है। हमें उस पर ध्यान देने की जरूरत है। हम जितना अपने शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देते हैं, उतना ही ध्यान हमें अपने मानसिक स्वास्थ्य पर भी देना चाहिए।’
मुद्दे की चर्चा जरूरी : मनोवैज्ञानिक डॉ. आरती सूर्यवंशी बताती हैं, ‘अगर किसी के परिवार में मानसिक रोगी है, तो सबसे पहली कोशिश यह होनी चाहिए कि उसके आसपास का माहौल बेहतर बनाया जाए। उसे किसी भी तनाव से मुक्त रखा जाए। साथ ही उसे
आगे वह कहती हैं, ‘जब आप अपने बच्चों के साथ बैठकर उनकी भावनाओं के बारे में बात करते हैं, तो यह महत्वपूर्ण है कि आप जिस बारे में बात कर रहे हैं, उस पर ध्यान केंद्रित करें। किसी भी बात पर चर्चा करने से पहले आप उन्हें शांत रहना और अपनी भावनाओं को पहचानना सिखाएं। जब वे परेशान हों, तब किसी मुद्दे पर चर्चा करना सही नहीं होगा। हमें तब तक इंतजार करना चाहिए, जब तक वे दिमागी रूप से शांत न हो जाएं और आपका पक्ष सुनने के लिए मानसिक रूप से तैयार न हो जाएं।’
माता-पिता होने के नाते कोई भी अपने बच्चे के लिए सबसे बेहतर ही चाहेगा। हर माता-पिता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अगर उनका बच्चा तनाव में है, तो वे उसके लक्षणों को लेकर सजग रहें। दोशी कहते हैं, ‘उनके व्यवहारों को लेकर आप चिंतित हो सकते हैं, इसलिए आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें सही मदद मिले। मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय पर चर्चा करने के लिए माता-पिता को अपने बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए। इस विषय को भारत में निषेध माना जाता है और लोग आमतौर पर ऐसे मुद्दों पर चर्चा करने के लिए नहीं खुलते हैं।’
सुरक्षित और प्रेम महसूस कराया जाए। उसे सहज महसूस करवाया जाए और अपनी भावनाएं जाहिर करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।’

वर्जित माना जाता है। इस  मुद्दे को लेकर आज भी समाज में कई भ्रांतियां हैं, जिनकी मुख्य वजह इन्हें लेकर जागरूकता का अभाव है। यह समझना जरूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य हमारे जीवन पर एक बड़ा प्रभाव डालता है।’
क्या हैं लक्षण
किसी में अगर मानसिक बीमारी की शुरुआत होती है, तो सबसे पहले उसकी भूख और नींद में तब्दीली आती है। बहुत कम या बहुत अधिक नींद आना, खाने से जुड़ी आदतें बदलना - ये  मानसिक स्वास्थ्य की बिगड़ती स्थिति के शुरुआती लक्षण हैं। हर मानसिक बीमारी की अपनी बारीकियां होती हैं। दोशी कहते हैं, ‘उदाहरण के लिए, अवसाद के दौरान एक व्यक्ति अपनी पसंदीदा हर चीज में रुचि खो देता है- जैसे संगीत, दोस्तों के साथ बातचीत आदि।’ मनोवैज्ञानिक सलाहकार रितिका अग्रवाल मेहता कहती हैं, ‘हर मानसिक बीमारी के अपने अलग तरह के लक्षण होते हैं, पर सामान्य लक्षणों की बात की जाए, तो इनका नाम लिया जा सकता है-
- भूख और नींद में अचानक बहुत बढ़ोत्तरी होना या बहुत कमी आ जाना
- व्यवहार और व्यक्तित्व में अचानक परिवर्तन होना
- बार-बार और जल्दी-जल्दी बदलता मूड
- दैनिक गतिविधियों को निपटाने में कठिनाई
- निराशा, लाचारी और व्यर्थता की व्यापक भावनाएं होना
- आत्महत्या के बारे में बात करना  या सोचना
- दैनिक गतिविधियों से जुड़ी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर अत्यधिक चिंता जताना
- मादक द्रव्यों जैसे शराब, निकोटीन या ड्रग्स की लत लगना
-आक्रामक हो जाना या हिंसक व्यवहार करने लगना
- अजीब से ख्याल आना या अजीब व्यवहार करना
- हलूसिनेशन (भ्रम)  
अपनाएं ये खास तरीके...
मनोवैज्ञानिक सलाहकार रितिका अग्रवाल मेहता बताती हैं  मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण तरीका यह है कि आप पर्याप्त नींद लें और स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं। इसके अलावा आप और भी कुछ तरीकों को अपना सकते हैं, जैसे-
- चिंता और खराब मूड को एक भावना के रूप में पहचानें। इनसे जितना संभव हो, दूरी बनाए रखने की कोशिश करें।
-दोस्तों के साथ समय बिताना भी जरूरी है। किसी ऐसे व्यक्ति से बात करें, जिस पर आप विश्वास करते हैं। समय-समय पर उसे बताते रहें कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं। अगर कोई समस्या हो तो ऐसे लोगों की मदद लें। याद रहे, हर समस्या को अकेले सुलझाना जरूरी नहीं होता।
- सोशल मीडिया के इस्तेमाल की समय-सीमा तय करें। इस पर एक नजर रखने के लिए आप अपने फोन की विशेष ‘डिजिटल वेलनेस सेटिंग’ का इस्तेमाल कर सकते हैं।
- नियमित रूप से व्यायाम करें।
- अपने शौक को पूरा करने के लिए हर दिन थोड़ा-बहुत समय जरूर निकालें। अगर आपका कोई शौक या जुनून है ही नहीं, तो इसे विकसित करें।
- अपनी भावनाओं को लेकर सजग रहें। ऐसा करने से कोई समस्या महसूस होने पर आप तुरंत ही किसी की मदद ले पाएंगे।
- यदि आपने इन सभी तकनीकों पर काम किया है और फिर भी आपको मदद नहीं मिल रही है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।
                                                                                                -अंजलि शेट्टी,नई दिल्ली
                                                                                                              हिंदुस्तान, नई दिल्ली से साभार 

Saturday, 11 July 2015

बारिश के मौसम में सर्दी-जुकाम जब करे परेशान

ध्यान रखें कि बारिश के मौसम में हमारी पाचन क्रिया और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. इस लिए हमारी खान-पान उसी प्रकार होना चाहिए. उन खाने-पीने की चीजों का इस्तेमाल न करें, जो पचने में भारी हों. बीमार होने पर कुछ ऐसी दवाओं का इस्तेमाल करें और हमारे पेट को ठीक करे.
बारिश में भीगे नहीं कि सर्दी-जुकाम का शिकार! फिर शुरु होता घरेलू नुस्खों का दौर. अदरक, लौंग आदि की चाय. नहीं आराम आया तो भागे अंग्रेजी दवाओं के डाॅक्टर के पास. तुरंत ठीक भी होना है. लेकिन एक यह भी सच्चाई है कि ज्यादा अंग्रेजी दवाओं का प्रयोग शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को घटा देता है. छोटी-छोटी तकलीफों में अंग्रेजी दवाओं के प्रयोग शरीर के लिए घातक साबित होता है. इसलिए अच्छा रहे कि बात-बात पर अंग्रेजी दवाओं के बजाय अन्य पद्धति की दवाओं का इस्तेमाल करें. जैसे होम्योपैथी. होम्योपैथी रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाकर बीमारी को दूर करती है, वो भी शरीर को हानि पहुंचाए बिना. सबसे बड़ी बात यह कि जब आपको अंग्रेजी दवाओं की जरूरत पड़ ही जाए तो अंग्रेजी दवाएं अधिक कारगर तरह से काम करती हैं और जल्दी ठीक भी होते हैं.
होम्योपैथी में सर्दी-जुकाम के लिए दवाओं का भंडार है. एकोनाईट, नेट्रम म्यूर, चायना, फेरम फाॅस, नेट्रम सल्फ, एलियम सीपा, सेंगुनैरिया, एसिड फास आदि
ध्यान रखें, जल्दी-जुल्दी सर्दी-जुकाम होने का मतलब आपका लीवर कमजोर होना भी है. बारिश के मौसम में हमारा लीवर अधिक प्रभावित होता है. इसलिए सर्दी-जुकाम की दवा के साथ-साथ लीवर की दवा भी ले लेनी चाहिए. यदि सर्दी-जुकाम के साथ एसिडिटी बनने और छाती में जलन है तो आईरिश वर्सि0 और नेट्रम सल्फ भी लें.
एकोनाइट नेपलेस: तेज छींक, तेज प्यास है तो इसे जरूर लें. इसके साथ नेट्रम म्यूर, चायना, भी लें.
कुछ दवाओं के संक्षिप्त लक्षण:
एकोनाइट नेपलेस: अचानक ठण्ड लग जाने तथा बार-बार छींक आने पर यह दवा काम करती है. किसी भी तकलीफ की तीव्रता में इसका अच्छा काम रहता ही है, साथ ही गला सूखता हो और तेज प्यास हो तो यह दवा तुरंत अपना असर दिखाती है. तेज छींक में इसके साथ नेट्रम म्यूर भी ले लेनी चाहिए. दोनों दवाओं की 30-30 पावर लेकर देखें. यह भी ध्यान रखें कि किसी समय खांसते-खांसते काफी परेशानी हो रही हो, बेचैनी घबराहट लगे, पानी की प्यास भी हो तो एक खुराक दे देनी चाहिए. यह किसी भी तकलीफ की बढ़ी हुई अवस्था, घबराहट, बेचैनी में बहुत अच्छा काम करती है तथा तकलीफ की तीव्रता कम कर देती है.
नेट्रम म्यूरियेटिकम:  हम जो नमक खाते हैं, उसी से यह दवा तैयार होती है. हल्की सी ठण्ड होते ही सर्दी-जुकाम हो जाता है. इस दवा का मुख्य लक्ष्ण है हाथ, पैर ठण्डे रहना. जिस भी बीमारी में यह लक्षण रहे, यह दवा उसे जरूर देकर देखनी चाहिए- चाहे बीमारी कोई भी हो.
बहुत अच्छा खाना खाने पर भी शरीर कमजोर रहना. बार-बार छींक आने, कब्ज रहने और प्यास लगने पर एकोनाइट नेपलेस के साथ इस दवा को देना चाहिए.
रस टाक्सिकोडेण्ड्रन: ठण्ड या पानी में भीग जाने के कारण सर्दी, जुकाम हो जाने और बदन दर्द में इस दवा का अच्छा काम है.
फेरम फास: रक्त संचय में अपनी क्रिया करती है. कोई तकलीफ एकाएक बढ़ जाने और किसी तकलीफ की प्रथम अवस्था में इसका अच्छा इस्तेमाल किया जाता है. यह किसी भी प्रकार की खांसी- चाहे बलगमी हो या सूखी सब में फायदा करती है. कमजोर व्यक्तियों ताकत देने में यह दवा काम में लाई जाती है. क्योंकि कुछ रोग कमजोरी, खून की कमी की वजह से लोगों को परेशान करते हैं. अतः खून में जोश पैदा करने का काम करती है. फेरम फाॅस आयरन है और दवा आयरन की कमी को भी दूर करती है.
नेट्रम सल्फ: जब मौसम में नमी अधिक होती है, चाहे मौसम सर्दी का हो या बारिश का या फिर और रात उस समय खांसी बढ़ती है. खांसते-खांसते मरीज कलेजे पर हाथ रखता है, क्योंकि खांसने से कलेजे में दर्द बढ़ता है. दर्द बाईं तरफ होता है. दवा दमा रोगियों को फायदा करती है. क्योंकि दमा रोगियों की तकलीफ भी बारिश के मौसम व ठण्ड के मौसम में बढ़ती है.
संगुनेरिया: रात में भयंकर सूखी खांसी, खांसी की वजह से मरीज सो नहीं सकता, परेशान होकर उठ जाना और बैठे रहना. लेकिल बैठने से तकलीफ कम न होना. सोने पर खांसी बढ़ना. दस्त के साथ खांसी. इसके और भी लक्षण है, महिलाओं को ऋतु गड़बड़ी की वजह से खांसी हुई हो तो उसमें यह फायदा कर सकती है. पेट में अम्ल बनने की वजह से खांसी होना, डकार आना. हर सर्दी के मौसम में खांसी होना.
एलियम सीपा: इस दवा का मुख्य लक्षण है जुकाम के समय पानी की तरह नाक से पानी बहना. बहुत तेज छींक. आंख से पानी आना. नाक में घाव होना. जुकाम के कारण सिर में दर्द हो जाना. गरमी में बीमारी बढ़ना.
चायना: चायना का कमजोरी दूर करने भूख बढ़ाने में बहुत अच्छा काम है. खांसी हो, भूख कम लगती हो तो कोई भी दवा लेते समय यह दवा ले लेनी चाहिए. काफी बार लीवर की कमजोरी, शरीर की कमजोरी की वजह से बार-बार खांसी परेशान करती है, बार-बार निमोनिया हो जाता है, खासकर बच्चों को. यदि चायना, केल्केरिया फाॅस, फेरम फाॅस कुछ दिन लगातार दी जाए तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है. इस दवा के खांसी में मुख्य लक्षण है- खांसते समय दिल धड़कने लगता है, एक साथ खांसी अचानक आती है कपड़े कसकर पहनने से भी खांसी होती है. इसकी खांसी अक्सर सूखी होती है.
हीपर सल्फ:  इसकी खांसी बदलती रहती है, सूखी हो सकती है, और बलगम वाली भी. हल्की सी ठण्डी लगते ही खांसी हो जाती है. यही इस दवा का प्रमुख लक्षण भी है. ढीली खांसी व काली खांसी में भी यह विशेष फायदा करती है. जिस समय ठण्डा मौसम होता है, उस समय अगर खांसी बढ़ती हो तो, तब भी यह फायदा पहुंचाती है. जैसे सुबह, रात को खांसी बढ़ना. लेकिन ध्यान रखें कि यदि स्पंजिया दे रहे हों, तो हीपर सल्फ नहीं देनी चाहिए, यदि हीपर सल्फ दे रहे हों, तो स्पंजिया नहीं देनी चाहिए.
बेलाडोना: गले में दर्द के साथ खांसी, खांसी की वजह से बच्चे का रोना, कुत्ता खांसी, भयंकर परेशान कर देने वाली खांसी, खांसी का रात को बढ़ना. खांसी सूखी होना या काफी खांसी होने के बाद या कोशिश के बाद बलगम का ढेला सा निकलना. गले में कुछ फंसा सा अनुभव होना. बलगम निकलने के बाद खांसी में आराम होना, फिर बाद में खांसी बढ़ जाना.
इपिकाक: इसका मुख्य लक्षण है, खांसी के साथ उल्टी हो जाना. उल्टी आने के बाद खांसी कुछ हल्की हो जाती है. सांस लेते समय घड़-घड़ जैसी आवाज आना, सीने में बलगम जमना आदि इसके लक्षण हैं. यह दवा काफी तरह की खांसियों में फायदा करती है, चाहे निमोनिया  या दमा. कई बार ठण्ड लगकर बच्चों को खांसी हो जाती उसमें भी फायदा करती है. खांसते-खांसते मुंह नीला, आंख नीली हो जाना, दम अटकाने वाली खांसी छाती में बलगम जमना आदि इसके लक्षण हैं.
चेलिडोनियम: दाहिने कन्धे में दर्द होना, तेजी से सांस छोड़ना. बलगम जोर लगाने से निकलता है, वो छोटे से ढेले के रूप में. सीने में से बलगम की आवाज आती है. लीवर दोष की वजह से हुई खांसी में बहुत बढि़या क्रिया दिखाती है. खांसते-खांसते चेहरा लाल हो जाता है. खसरा व काली खांसी के बाद हुई दूसरी खांसी में इससे फायदा होता है.
कोनियम मैकुलेटम: बद्हजमी के साथ खांसी. खांसी सूखी जो स्वर नली में उत्तेजना से उत्पन्न खांसी. इस दवा का प्रमुख लक्षण है, खांसी रात को ही अधिक बढ़ती है, जैसे कहीं से उड़कर आ गई हो. खांसी के साथ बलगम आता है तो मरीज उसे थूकने में असमर्थ होता है, इसलिए उसे सटक जाता है.
एसिड फास्फोरिकम: यह दवा शरीर में ताकत देने का काम करती है और जवान होते बच्चों में अच्छी क्रिया करती है. इसकी क्यू पावर बहुत ही कारगर साबित हुई है. स्नायु कमजोरी और नर्वस सिस्टम को ठीक करती है. बहुत ही जल्दी सर्दी लग जाना. नाक से पानी बहना. तेज छींक, सोने के बाद खांसी बढ़ना. गले में सुरसरी होकर खांसी होना.
ध्यान रखें कि बारिश के मौसम में हमारी पाचन क्रिया और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. इसलिए हमारा खान-पान उसी प्रकार होना चाहिए. उन खाने-पीने की चीजों का इस्तेमाल न करें, जो पचने में भारी हों. बीमार होने पर कुछ ऐसी दवाओं का इस्तेमाल करें और हमारे पेट को ठीक करे.
नोट: उपरोक्त लेख केवल होम्योपैथी के प्रचार हेतु है. कृपया बिना डाॅक्टर की सलाह के दवा इस्तेमाल न करें. कोई भी दवा लेने के बाद विपरीत लक्षण होने पर पत्रिका की कोई जिम्मेवारी नहीं है. 

Friday, 15 May 2015

दलित लेखक संघ विवाद : डा. अम्बेडकर को मानने वालों ने ही उनके नारे "संगठित रहो" को मानने से इन्कार कर दिया

डा. अम्बेडकर ने कहा था- संगठित रहो. लेकिन जो खुद को अम्बेडकर का अनुयायी कहते हैं, वही संगठित नहीं रहते. विचारों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन झगड़ा? दुख होता है. संभव है कुछ लोग मेरी बात को हवा में उड़ाने का प्रयास करें, लेकिन यह उनकी इच्छा है. लेकिन जो मेरी पीड़ा है, उसे व्यक्त करना मैं जरूरी समझता हूं.
दलित लेखक संघ कोई इतने फायदे या प्रतिष्ठा दिलवाने वाला नाम नहीं है कि इसे झपटने की ज्यादा कोई जरूरत समझे, खासकर 4-5 वर्षों जो हालात चल रहे हैं. शील बोधि ने अजय नावरिया को अध्यक्ष पद संभालने की बात कहते हुए कहा था कि "दलित लेखक संघ की स्वाभाविेक मृत्यु हो चुकी है. यदि आप इसे पुन: जीवित कर सकते हैं तो कर लो."
महासचिव व अध्यक्ष दो पद ऎसे हैं जो अपने दायरे व अधिकार को लेकर उलझ पड़ते हैं. शील बोधि के समय भी यही हुआ, हीरालाल राजस्थानी के समय में भी. संगठन समन्वय से चलता है, मंच संचालन व अन्य कार्य के लिए सभी को मौका मिलना चाहिए. ताकि संगठन निरंतर चलता रहे, बढ़ता रहे. जब हम संगठन के सदस्यों को ही केवल दर्शक के रूप में बुलाते रहेंगे तो दूसरे लोग भी अपनी उपयोगिता संगठन में नहीं समझेंगे. सभी को मौका मिलना चाहिए.
हमें यह मानना ही ही पड़ेगा कि फिलहाल दलित लेखक संघ के जो दो फाड़ हुए हैं, वह केवल दो व्यक्तियों के अहम के कारण हुए हैं. जो मुद्दा मिल बैठकर सुलझाया जा सकता था, वह संगठन तोड़कर सुलझाने का प्रयास किया गया, जो आंदोलन के लिए बड़ा ही खतरनाक है. न तो संगठन का अध्यक्ष बनने से अजय नावरिया जी को ज्यादा फायदा मिलना है, न ही कर्मशील भारती जी को. रजनी तिलक के साथ भी यह बात नहीं हो सकती, वह तो पहले ही से बड़ा संगठन चला रही हैं.
दलित दस्तक(दलित मत) व अन्य शब्दांकन जैसी वेबसाइटों ने मित्रता खूब अच्छी तरह निभाई और बिना दूसरे का पक्ष जाने एक तरफा रिर्पोटिंग प्रकाशित कर दी.
मान्य उमराव सिंह जाटव उसी समय से अजय नावरिया जी के पीछे लगे हुए थे, जब तीन-चार लोग जमा हुए तथा उसमें अजय नावरिया को अध्यक्ष बना दिया, वे शील बोधि की उस बात को भूल गए कि दलित लेखक संघ की स्वाभाविक मृत्यु हो चुकी है, अजय जी आप इसे पुनर्जीवित कर सकते  हो तो कर लो.  उमराव जी  बार-बार फेसबुक पर कहते रहे कि तीन चार लोगों के अध्यक्ष. जबकि जो दलित लेखक संघ के साथी हैं, वे जानते होंगे कि बार बार सूचना देने के बावजूद लोग दलित लेखक संघ के चुनाव व कार्यक्रम/मीटिंग में नहीं पहुंच रहे थे. 10 मई 2015 को पहुंचे तो केवल छ:, जो एक गुट के थे. जैसा कि फेसबुक पर बताया जा रहा है. रजनी तिलक, हीरालाल राजस्थानी आदि केवल उन्हें ही अपने दलित लेखक संघ का सदस्य मान रहे थे. उन्हें पता ही नहीं था कि कौशल पवार, भीमसेन आनंद, नीलम रानी, राकेश आदि भी दलित लेखक संघ के सदस्य हैं, हां, वे अजय नावरिया के साथ थे. सभी को महसूस हो गया था कि यह अजय नावरिया के पक्ष में वोटिंग करेंगे.
उमराव सिंह जाटव जी ने हद ही कर दी. एक-दो दिन बाद फेसबुक पर अपनी चोट लगी पीठ का फोटो लगा दिया कि देखे, किस तरह की गुंदागर्दी दलित लेखक संघ के चुनाव के समय उनके साथ हुई. जबकि अजया नावरिया ने साफ मना कर दिया कि उनके साथ ऎसा कुछ नहीं हुआ. पता चला कि दलित लेखक संघ के चुनाव न हों, इसके लिए उमराव जी ने पुलिस तक बुला ली थी.
कुल मिलाकर अजय नावरिया जी अपने पक्ष के साथियों के कारण अध्यक्ष बन गए, निश्चित ही, यह उनके इतने फायदा का काम नहीं है, वे तो हीरालाल राजस्थानी को सबक सिखाना चाहते थे. इसका आभास उन्होंने हीरालाल राजस्थानी के मैसेज बाक्स  में उसी रात को दे भी दिया.
हीरालाल जी द्वारा चुनाव की घोषणा केवल अजय नावरिया को सबक सिखाना था, वे तय कार्यक्रम या पहले से तय कार्यक्रम के आधार पर चुनाव नहीं करवा रहे थे.
हीराला राजस्थानी भी कहां चुप रहने वाले थे, उन्होंने भी 12 मई 2015 को मीटिंग बुलाई और खुद महासचिेव व कर्मशील भारती जी को अध्यक्ष बना दिया. इस तरह दो दलित लेखक संघ बन गए, एक के अध्यक्ष  अजय नावरिया हैं, दूसरे के अध्यक्ष कर्मशील भारती जी हैं. एक की महासचित नीलम रानी हैं, दूसरे के महासचिव हीराला राजस्थानी हैं. यह तो अच्छा रहा कि पहले मा. विमल थोरात जी ने अपने अपने वाले दलित लेखक संघ का नाम बदलकर दलित साहित्य मंच रख लिया, अन्यथा इस समय तीन दलित लेखक संघ होते, तीनों ही खुद को असली दलित लेखक संघ घोषित. पिसता कौन.....? कहने की जरूरत नहीं.

रहा मैं, मैं सभी के साथ रहना चाहता हूं. हीरालाल राजस्थानी, शील बोधि, अजय नावरिया जी तीनों को जब मैंने कहा कि संगठन में गुटबाजी है. मैं उस जगह नहीं जाता जहां गुट बन जाएं. हीरालाल राजस्थानी जी को चूंकि तुरंत गुस्सा आता है, इसलिए उन्होंने तो मेरी इस बात पर ही मुझे अजय नावरिया वाले गुट में शामिल कर दिया. अजय नावरिया को कहा तो वह बोले, हम किसी गुटबाजी का शिकार नहीं हैं. शील बोधि जी ने भी कोई गुटबाजी होने से इंकार कर दिया. चूंकि मैं कोई बुद्धिजीवी तो हूं नहीं, जो किसी शब्द को इतनी गहराई से समझ पाऊं, हां, बुद्धिजीवी वर्ग के लोग मुझे समझाने का प्रयास करें कि यह गुटबाजी नहीं तो क्या है. गुटबाजी नहीं होती तो  सभी मिलकर उस व्यक्ति को अध्यक्ष व महासचिव बनाते, जिनपर किसी को विवाद नहीं होता, एक दूसरे को सबक सिखाने का प्रयास नहीं किया जाता.

कुल मिलाकर तो हुआ यही कि  डा. अम्बेडकर को मानने वालों ने ही उनके  विचार "संगठित रहो" को मानने से इन्कार कर दिया.
 संगठन तभी चलते हैं, जब हम अध्यक्ष की सुने तथा अध्यक्ष हमारी सुने. अध्यक्ष ऎसा हो, जिसका सभी सम्मान करे, वे कहना माने. अध्यक्ष भी सभी की सुने, सभी को एक करके चले. सभी की सलाह लेकर काम करे. जब किसी संगठन में राजनीति शुरू हो जाती है, वह बिखर जाता है. दलित लेखक संघ भी बिखर गया. हम सभी को सोचना है- हम सभी से कहां और क्या गलती हुई, वरना संगठन मत चलाओ, केवल लिखो. लिखना भी समाज सेवा ही है. जो नाम भी देगा, प्रतिष्ठा भी. इस समय संस्था के जरिए गैर दलितों को  हम सभी पर हंसने का मौका दिया है, इस पर विचार कर सकें तो कर लें. वरना अपनी तो सभी दलित लेखक संघ से अलविदा. 

कृपया मुझे यह भी बताने का प्रयास किया जाए कि जिन दिन समन्वय समिति बनी थी, उस दिन कौन-कौन थे? उस समय के फोटोग्राफ हों तो  बताएं. दूसरी बात क्या समन्व समिति का चुनाव करवाने का काम था या खुद ही चुनाव में भाग लेकर खुद ही पदाधिकारी बनना था.
कृपया ध्यान रखें कि कोई भी कोई भी कार्यक्रम करेगा, उसमें शामिल होने का मेरे पास समय होगा, मैं उसमें जरूर शामिल होने का प्रयास करूंगा. लेकिन कोई भी दलित लेखक संघ अपनी मीटिंग में मुझे न बुलाए, या अपनी संस्था के नाम बदले. आशा है, आप सभी मेरी भावना का सम्मान करेंगे. मुझे किसी तरह का लालच नहीं, न लेखन में नाम कमाने का या अन्य लाभ लेने का. मुझे केवल अपने काम पर ध्यान देना है. मैं न कोई प्रोफेसर हूं, न ही अध्यापक. न मेरी कोई दूसरी सरकारी या प्राइवेट नौकरी है. मुझे रोज कुआ खोदना पड़ता है, रोज पानी पड़ता है. सभी लोग मुझे क्षमा करेंगे,  ऎसी आशा है.
कोई(अजय नावरिया जी नहीं) मुझसे कहता है, अनिता भारती तुम्हारा बहुत नुकसान कर देगी , कोई कहता है यह अजय नावरिया से फायदा उठाना चाहता है. किसी ने यह तक कह दिया कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की यह बंदा इसलिए हेल्प कर रहा है कि यह उनसे फायदा उठाना चाहता है और न जाने क्या-क्या? अशोक भारती, मोहनदास नैमिशराय, विजय प्रताप आदि बहुत से लोगों को 1993 से जानता हूं. मोहनदास नैमिशराय उन दिनों नवभारत टाइम्स में थे, उन्होंने नवभारत में काम के लिए कहा, मैंने साफ मना कर दिया, नौकरी करने का स्वभाव नहीं है मेरा. अशोक भारती, रजनी तिलक आदि को मैंने कभी भी फायदे के लिए नहीं कहा, जबकि मिलते रहते हैं. संस्था मैं भी चलता हूं.1992-1993 में अशोक भारती के साथ मैंने जब काम किया है जब उनके यहां रामविलास पास की पत्रिका चक्र निकलती थी. उसका अन्य पत्र-पत्रिका, पुस्तकों का काम किया. उस समय मैं "आशा" नाम की पत्रिका भी निकालता था.
ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ने सही कहा था, दिल्ली राजनीति का अखाड़ा है. यदि मैं दिल्ली होता तो इतना व इतना अच्छा लेखन नहीं हो पाता, यह संभव देहरादून में ही हुआ.

हीरालाल राजस्थानी व अजय नावरिया जी : 

दलित लेखक संघ आपको इसलिए नहीं सौंपा था यह  कि संघ सार्वजनिक लड़ाई का अड्डा बन जाए. यदि कोई मतभेद था आप फोन करके, एसएमएस करके या किसी को बीच में लेकर सुलझाते. हीरालाल जी, यदि अजय जी ने कोई कार्यक्रम खुद ही तय कर लिया (वैसे तो यह इतनी बड़ी बात नहीं है,मैं करता तो गलत था), आपको इसपर आपत्ति थी तो आप अजय जी से  बात करते. वे बात नहीं करते तो उनके फेसबुक के मैसेज बाक्स में आपत्ति दर्ज करते. अजय नावरिया ने कहा कि आप उनका फोन नहीं उठा रहे थे, उठा लेते थे तो आप गुस्से में बोलते थे. अजय जी का फर्ज था कि कार्यक्रम की सूचना उनके मैसेज बाक्स में देते.
अध्यक्ष कार्यक्रम कर रहा है, हीरालाल राजस्थानी जी बिना किसी से बात किये सार्वजनिक स्थल फेसबुक पर डाल दिया कि कार्यक्रम अवैध है- आप महासचिव हो, इसलिए आप किसी कार्यक्रम को अवैध घोषित कर सकते हो? यदि दूसरे सदस्य, कार्यकारिणी, पदाधिकारियों को आप कुछ नहीं समझते? आपका फर्ज नहीं था कि आप उस कार्यक्रम को लेकर एक मीटिंग लेते और अपनी आपत्ति दर्ज करते, ताकि अध्यक्ष आगे से इस तरह का करते समय दस बार सोचते, चूंकि आपको गुस्सा बहुत आता है, इसलिए गुस्से का काबू न करते हुए तुरंत फेसबुक पर दलित लेखक संघ के कार्यक्रम को अवैध घोषित कर दिया, जिसके कारण हम दूसरों के सामने हंसी के पात्र बने. संगठन का कोई महासचिव है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वही हर बार मंच संचालन करे, दूसरों को भी मौका मिलना चाहिए.

अब उनके लिए, जो मुझे नया-नया लिखाड़ी समझ रहे हैं :

मैं अपने साथियों को बता दूं कि जब मैं घोषित रूप में दलित लेखक नहीं था, उस समय 1992-1993 में "आशा" नाम की पत्रिका निकालता था, उसके बाद प्रज्जवला नाम की पत्रिका का संपादक था. 1989 से 2000 तक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपा. 1989 से 1995 तक कई दलित कहानियां  एक गांव की दाई, रात की रानी, सफर की बात,   प्रेम की उमंग, माथे पर बिंदिया, भंगनिया, भैंस आदि आधा दर्जन के करीब प्रकाशित हो चुकी थी.चाहे मैं अच्छा न लिखता हूं, लेकिन मैं नया लेखक नहीं हूं. सन् 2000 से लेकर 2010 तक मैंने परिवार को संभालने के लिए लेखन बंद रखा. 2010 से ही लोगों से जुड़ा, दलित साहित्यकार के रूप में आपके सामने आया, पहले भी मैं साहित्य लिख रहा था, लेकिन वह दलित साहित्य था, मुझे नहीं  पता था.  तो अपनी, अपने समाज की पीड़ा लिख रहा था, व्यवसायिक लेखन के साथ-साथ. व्यवसायिक लेखन का तो मैंने कार्स भी किया था, बाद में कहानी लेखन भी किया.  मैं घोषित रूप में दलित लेखक नहीं था, लेकिन हमारी पत्रिका कहीं पर भारतीय दलित साहित्य अकादमी को कहीं मिल गई थी, उन्होंने उसी के आधार पर मुझे 1993 में अम्बेडकर फैलाशिप दिया. वो तो बाद में  ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा ही पता चला चला कि उसी दिन  उन्हें (ओमप्रकाश वाल्मीकि) को सम्मानित किया गया था.
-कैलाश चंद चौहान,
ईमेल : kailashchandchauhan@yahoo.co.in

Sunday, 19 April 2015

कटने, छिलने, जलने, चोट लगने पर प्राथमिक उपचार का अच्छा विकल्प है होम्योपैथी


अक्सर घर परिवार, रास्ते-बीच में चिकित्सक के उपलब्ध न रहने तक प्राथमिक उपचार की जरूर हो जाती है. लेकिन प्राथमिक उपचार में होम्योपैथी से बढि़या कोई विकल्प नहीं है, इस बात का कोई प्रचार नहीं किया जाता. हालांकि काफी मामलों में होम्योपैथी बिना किसी जोखिम के बहुत कारगर हो जाती है. क्योंकि होम्योपैथी यदि फायदा नहीं पहुंचाती तो नुकसान भी कोई नहीं करती. प्राथमिक उपचार के कुछ उदाहरण देखिएः

चोट लगने पर होम्योपैथी :

घर में कोई न कोई दुर्घटना हो ही जाती है. सब्जी काटते समय यदि हाथ में चाकू लग गया तो खून बहने लगता है. कई बार रोके नहीं रुकता. यदि डाक्टर तक भागा जाए तो डाक्टर तक पहुंचने में काफी देर जाएगी, ऊपर से वहां लाईन लगी मिली तो और भी दिक्कत. जब तक शरीर के लिए अमृत खून काफी मात्रा में बह जाएगा. बहुतों को तो खून देखते ही घबराहट होने लगती है. कई बार परिवारों में चोट लगने या कटने पर घरेलू कपड़ा या पट्टी बांध ली जाती है, जो कि कई बार जोखिम बन जाती है, क्योंकि वहां सेप्टिक बनने का खतरा बन जाता है या हो जाता है- जिसके बाद घाव ठीक होना मुश्किल हो जाता है या ठीक होता ही नहीं, फिर वह अंग काटना पड़ सकता है. लेकिन होम्योपैथी से ऐसा कोई जोखिम नहीं रहता. घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है.
इसके लिए आप होम्योपैथी की हैमामेलिस वरजिनिका क्यू, हैमामेलिस वरजिनिका -30, आर्निका मोण्टेना-30, फेरम फास-30, एकोनाईट-30, हाइपेरिकम-30, लिडम पैलस्टर आदि रखिए. जैसे चोट आदि के कारण कहीं से खून बहने लगे तो तुरंत उस स्थान पर हैमामेलिस वरजिनिका की क्यू पावर वहां छिड़क दीजिए या रूई से लगा लें. और हैमामेलिस वरजिनिका की क्यू पावर की 10-12 बूंद आधा कप पानी में डालकर पी लीजिए, देखिए कितनी जल्दी खून बन्द होता. फिर चाहे आप डाक्टर से पट्टी कराएं या कोई क्रीम लगाकर पट्टी बांध लें. आप हेमामेलिश की भी नियमित पट्टी कर सकते है. घाव भी जल्दी ठीक होगा. इसके साथ आर्निका मोण्टेना-30, फेरफ फास-30, केल्केरिया सल्फ-30 भी कुछ दिन खा सकते हैं. आर्निका मोण्टेना-30 एंटीसेप्टीक का बहुत बढि़या काम करती है. यह सेप्टीक नहीं बनने देती. इसे लेने पर आपको कोई इंजेक्शन लगवाने की जरूरत नहीं है.

यदि घाव हड्डी तक हो गया है तो हाईपैरिकम-30, केल्केरिया फास-30 लें, रूटा-30 ले सकते हैं.
यदि दर्द में आर्निका लेने से आराम न आ रहा हो तो लिडम पैलस्टर-30 लेंकर देखें.
हड्डी टूटने के बाद जुड़ने में समय लग रहा हो या जुड़ने में परेशानी हो रही हो तो केल्केरिय फास-30 तथा ले लें-  सिम्फाइटस आफिसिनेल, लें. ले लें-  सिम्फाइटस आफिसिनेल हड्डी जोड़ने की बहुत बढ़िया दवाई है. यह दवा पीने व लगाने दोनों में अच्छा काम करती है.

चोट, कटने से हुआ घाव ठीक न हो रहा हो, उसमें पीब पड़ गई हो तो
आर्निका मोण्टेना-30
साईलेशिया-30
केल्केरिया सल्फ-30 लें.
किसी दुर्घटना के कारण बेहोशी आदि हो रही हो तो रेस्क्यू-30 दें.
यदि आंख की पुतली में चोट लग गई है तो आर्निका-30, फेरमफास-30 लें. साथ ही इनमें से एक दवाई साथ में आर्टिमिसिया वल्गैरिस लें.आर्टिमिसिया वल्गैरिस आंख की चोट की बहुत बढ़िया दवाई है. यह दवाई आंख में चोट लगने पर दूसरी परेशानियों को भी दूर करती है.
चोट, खरोंच पर लगाने के लिए कैलेण्डुला, आर्निका की क्रीम भी आती है. जले हुए स्थान पर लगाने के लिए केन्थरिश की भी क्रीम आती है. यह क्रीमें हमेशा घर में रखनी चाहिए.

जलने पर होम्योपैथी :

इसी तरह यदि किसी कारण शरीर का कोई भाग जल जाए तो आप कैन्थरिश की क्यू व 30 पावर जरूर रखें. कैन्थरिश की क्यू पावर की कुछ बूंदे पानी में डालकर जले भाग लगाएं, तुरंत आराम आएगा, फफोले भी नहीं पड़ेंगे. जलन भी खत्म होगी व घाव जल्दी ठीक होगा. कैन्थरिश क्यू की क्रीम भी होम्योपैथी की दुकान पर मिलती है.  इसे घर में रखें. कुछ दिन कैन्थरिश -30 व फेरम फास-30 को गोली में बनाकर 4-4 गोली दिन में चार बार लें. देखिए, घाव कितनी जल्दी ठीक होता है, आप भी अचंभा करेंगे. दो दवाओं के बीच में 10 मिनट का अंतर रखें.

सेप्टिक(टिटनेस) को भी ठीक करती है होम्योपैथी

आर्निका माण्टेना-30 एंटीसेप्टिक का बहुत बढि़या काम करती है. किसी भी तरह से चोट लगने पर, यानी लोहे से भी चोट लगने पर आर्निका माण्टेना-30 ले लेनी चाहिए. इसके साथ लिडम पैलस्टर-30 भी ले  सकते हैं.  यह सेप्टिक नहीं बनने देती. इसे लेने पर आपको कोई इंजेक्शन लगवाने की जरूरत नहीं. यदि चोट लगने के बाद सेप्टिक बन गया है, इलाज कराते-कराते भी ठीक नहीं हो रहा है तो एक बार होम्योपैथी का जरूर इस्तेमाल करके देखें. सेप्टिक होने की वजह से गल रहा अंग कटने से बच सकता है. घाव सुखाने, पीप रोकने-सोखने, ठीक करने में केल्केरिया सल्फ जैसी अनेक दवाईंया हैं, जो घाव को ठीक कर देती हैं. आर्निका माण्टेना, लीडम जैसी दवाईंयां सेप्टिक को ठीक करने में बहुत कारगर है. आर्निका माण्टेना, कैलेण्डूला के मरहम भी मिलते हैं. मरहम चोट पर लगाएं. कैलेण्डुला भी कटे-छिले घाव के लिए अच्छी दवा है. यह दर्द को कम करती है.


कीट पतंगे काटने पर :

कई बार घर में या दूसरी जगह ततैया, मधु मक्खी, आदि शरीर में कहीं न कहीं डंक मार देते हैं. डंक इतना भयंकर होता है कि डंक वाले स्थान पर बहुत दर्द होता है. शरीर का वह हिस्सा सूज भी जाता है. आप इस तरह के समय के लिए घर में लिडम पैलस्टर व एपिस मेल रखें. डंक वाले स्थान पर लिडम पैलस्टर  क्यू की कुछ बूंद छिड़के या रूई से लगाएं. साथ ही लिडम पैलस्टर-30 तथा एपिस मे.30 की  4-4 बूंदे 10-10 मिनट के अंतर से जीभ पर डालकर लें. यह दवाईंया सूजन नहीं होने देगी, यदि सूजन हो गई तो उसे जल्द ठीक करेगी. दर्द को भी कम करेगी. चूहे के काटने पर भी यह दवा प्रयोग कर सकते हैं, उसी तरह.

 नक्सीर छूटने होने पर : 

कई बार तेज धूप, गर्मी की वजह से नक्सीर छूट जाती है और तेज खून नाक से बहने लगता है, डाक्टर के पास ले जाने तक काफी देर हो सकती है. इसके प्राथमिक उपचार के लिए प्रथम तो सिर पर गीला तौलिया रख दें. उसके बाद यदि लाल सुर्ख खून हो तो तुरंत पहले हेमामेलिश क्यू में 12 बूंद आधा कप पानी में पिला दें. यही दवा नाक में किसी प्रकार डालें, इसके लिए चम्मच, रूई आदि का प्रयोग कर सकते हैं. फिर एकोनाईट नेपलेस-30 की 4 बूंदे मुंह में डालें. इसके बाद ब्रायोनिया-30 की 4 बंदें दें. दवाईंया देने में 10-10 मिनट का अंतर रखें
नियमित तौर पर दवाई खाने के लिए लक्षण देखकर दवाई दें. जैसे :
एकोनाईट नेपलेस-30
ब्रायोनिया ऎल्ब-30
मेरे अनुभव में एक व्यक्ति की 6-7 साल पुरानी नक्सीर ब्रायोनिया-30 से ठीक हो गई थी, 5 साल हो गये ठीक हुए, उसे आज तक दोबारा नहीं छूटी.

ध्यान रखें : उपरोक्त जानकारी होम्योपैथी के प्रचार व जानकारी बढ़ाने के लिए है. इसलिए कोई दवा डाक्टर की सलाह से या अच्छी तरह सोच-समझकर व अध्ययन के बाद ही लें.

Saturday, 31 January 2015

पेट दर्द, बदहजमी हो तो होम्योपैथी को करें याद

पल्सेटिला नाईग्रीकैन्स: तली हुई या देर से पचने वाली चीजें खाकर होने वाला पेट दर्द। खट्टी डकार, जलन, खट्टा पानी मुंह में आना। पेट फूलना, जीभ फटी हुई या सफेद व सूखी, प्यास न लगना। यदि खाना खाने के एक घंटे बाद जलन खट्टी डकार, पेट में दर्द हो तो यह दवा बहुत अधिक फायदा देती है।
मेगफास फास्फोरिका: इस दवा का असर बहुत बार तुरंत ही हो जाता है, मरीज और चिकित्सक दोनों आष्चर्य करते रह जाते हैं। स्नायविक दर्दों में इसका प्रयोग बहुत होता है। काले व कमजोर मरीजों पर इसका असर अच्छा होता है। इसका दर्द दबाने, किसी गर्म वस्तु से सिकाई करने वह चलने फिरने से कम होता है। काफी बार दर्द की जगह भी बदलती रहती है तथा दर्द रुक-रुककर होता है। पेट में मरोड़, ऐंठन का दर्द, कई तरह के दर्दों में यह दवा काम कर जाती है।
कार्बो वेजिटेविलिस: इस दवा का सबसे बड़ा लक्षण है डकार आने पर पेट का अफारा कम हो जाता है। पेट में षूल जैसा दर्द। यह दर्द कई बार सोने पर अधिक होता है। हल्की चीजें भी उसे हजम नहीं होती। दूसरा लक्षण है मरीज चिढ़चिढ़ा हो जाता है। अधिक सेक्स-सुख भोगी, देर रात तक जगना, षराब आदि नषा करना भी इस दवा के लक्षण हैं। इन्हीं लक्षणों की एक और दवा है- नक्स।
सिनकोना/चायना: इसका सबसे उपयोगी लक्षण खाने के बाद गले में अटका सा महसूस होना, याना जो खाया वह गले,छाती में ही अटक गया हो। कुछ भी हजम न होना, यहां तक फल भी नुकसान करते हैं। जरा सा खाते ही पेट भरा सा मेहसूस होना। थोड़ा सा खाते ही खाने से उठ जाना है। इसका रोगी डकार लाने की कोषिष करता है, लेकिन डकार आने पर भी उसे कोई आराम नहीं आता। यह दवा लीवर की बहुत अच्छी दवा है। यह षरीर  की कमजोरी को दूर करती है, लीवर को ताकत देती है और उसकी सूजन कम करती है। भूख बढ़ाने में इस दवा का बहुत अच्छा काम है। इसकी सहयोगी दवा चेलीडोनियम है।
आईरिस वर्सिकालरः यह खराब पानी से उत्पन्न बीमारी की मुख्य दवा है। बद्हजमी, खट्टी डकार, गले, अन्न नली, छाती में जलन। सिरदर्द, खट्टी उल्टी जिससे दांत भी खट्टे हो जाते हैं, मुंह में लार आते रहना। पेट में जो दर्द होता है वह अम्ल की वजह से होता है। यदि उपरोक्त लक्षण रहने के साथ पेट में दर्द हो तो आईरिस लेकर जरूर देखें।
स्पाईजेलिया एन्थेलमिण्टिकाः  हृत्पिंड की तकलीफ की यह मुख्य दवा है। जोर से कलेजा धड़कना। हृत्पिंड यानी नाभि से ऊपर, छाती के नीचे बीचो-बीच दर्द होना। इस तकलीफ के साथ बद्हजमी तथा मुंह, गले में जलन में यह दवा ‘आईरिस वर्सि0’ के साथ बहुत अच्छी क्रिया करती है। इस दवा का एक लक्षण है- दर्द वाली जगह में सुईं चुभने सा महसूस होना. स्पर्श सहन न होना।
बेलाडोनाः पेट दर्द की जगह जरा भी नहीं छुई जाती। दर्द एक बार जोर से होता है फिर षुरु हो जाता है, हाथ लगाने दर्द बढ़ता है। कई बार दर्द रुक-रुककर होता है। बेचैनी होती है।
नेट्रम म्यूरः इस दवा का कमजोर, दुर्बल व्यक्तियों पर अच्छा असर होता है। जो अच्छा खाना भी खाते हैं। कब्ज होती हो, शौच सूखा होता है। मुंह का स्वाद खराब व जीभ सफेद होती है, भूख अधिक लगती है, लेकिन षरीर को खाया पिया लगता नहीं। यह भी गैस निकासी व पेट की गर्मी की अच्छी दवा है। यदि इसके साथ काली म्यूर ली जाए इसकी क्रिया बढ़ जाती है और कब्ज भी ठीक करती है.
नेट्रम सल्फ: बाईं तरफ लेटने पर दर्द बढ़ता है, बारिष के मौसम में जलन, गैस बनना अम्ल बनना, जीभ पर पीला लेप, आंखों ,त्वचा पर पीला-पन, पीलिये की षिकायत लगना, यकृत दोश इसके लक्षण है।
नेट्रम फास: बच्चों व बड़ों में अम्ल पिŸा की तकलीफ, बच्चों के पेट में कीड़े होने से दर्द आदि तकलीफ, सोते समय मुंह से लार बहना, दांत किटकिटाना, मुंह में पानी भर आना, गैस बनना, खाना खाने के बाद पेट में दर्द आदि।
चेलिडोनियम मेजसः यह दवा लीवर की बहुत अच्छी दवा है। दाहिने भाग पर इसकी अच्छी क्रिया होती है। चायना इसकी सहयोगी दवा है। मैली- राख जैसी जीभ। गर्म या अन्य कोई चीज खाने से दर्द घट जाना, खाली पेट दर्द होना इसके मुख्य लक्षण हैं। इसमें पेषाब पीला, कंधे के दाहिने हिस्से में दर्द होता, मुंह का स्वाद भी बिगड़ जाता है।
डायस्कोरिया विल्लोसा: पेट में किसी प्रकार का दर्द हो, लेकिन जगह बदलने वाला दर्द इसका विषेश लक्षण है। शौच वाली जगह में भी दर्द होता है। दर्द के साथ पतले दस्त हों तो यह अच्छा काम कर सकती है। पेट दर्द में इसके और लक्षण हैं पीछे की ओर झुकने से आराम होना, दर्द वाली जगह दबाने से सिकुड़ना, बढ़ना।
कार्डुअस मेरिऐनस: पत्थरी का दर्द हो या लीवर दोश के कारण दर्द, पीलिये के लक्षण दिखाई देते हों तो उसमें भी यह अच्छा कार्य करती है और तुरंत असर दिखाती है।
केमोमीला: इसका मुख्य लक्षण है- गुस्सा. पेट दर्द के साथ गुस्सा बहुत आ रहा हो, साथ ही बेचैनी, घबराहट हो तो यह दवा फायदा कर सकती है, विषेशकर बच्चों को।
एण्टीमक्रूड: बच्चा हाथ लगाते ही रोता है। जीभ एक-दम सफेद- इसी लक्षण में पेट व अन्य तकलीफों में यह दवा जल्द आराम करती है। पेट की गर्मी दूर करती है। मुंह में मीठा पानी भर आना। ज्यादा खाना खाने की वजह से दर्द होना। एक बार दर्द ठीक होकर पुनः दूसरी जगह होना। खट्टा खाने की इच्छा होना, लेकिन हजम न होना। खाई हुई चीज उल्टी हो जाना।
लाईकोपोडियम क्लैवेटमः पेट के अन्दर गों-गों की आवाज होना, ऊपर की तरफ से पेट में अफारा अधिक होना, पेट फूलना, पेट गड़ गड़ाना, खाना के बाद ही पेट दर्द होना। यकृत की जगह हल्का-हल्का लगातार दर्द होना, पेट में बाईं तरफ अधिक दर्द होना, तेज भूख लगने के बावजूद थोड़ा सा खाना खाते ही पेट भरा सा महसूस होना, खाना खाने के कुछ देर बाद ही भूख लग आना।
कोलोसिंथः पेट में मरो़ड की तरह दर्द। बहुत अधिक गुस्सा होने की वजह से कोई बीमारी होना, चाहे पेट दर्द होना, सामने की ओर झुकने या पैर, घुटने मोड़ने, दर्द वाली जगह दबाने से आराम होना।
लियाट्रिस स्पाइकेटा: हृत्पिंड, पेट, लीवर आदि कहीं भी सूजन हो, इससे बहुत जल्दी सूजन ठीक होती है। पेशाब ज्यादा होकर सूजन में आराम आता है। इसकी  क्यू पावर की दवा 12 से 15 बूंदे आधा कप पानी में सुबह-शाम लेनी चाहिए। हृत्पिंड के दर्द में भी जल्द आराम आता है। इस दवा के विषेश लक्षण नहीं है, षरीर के किसी भाग या पेट, लीवर में सूजन महसूस होने पर दी जा सकती है।
मैग्नेशिया म्यूरियोटिका: कड़ी कब्ज, सूखा मल जो टूट-टूटकर निकलता है.। डकार में प्याज या सड़े अण्डे की सी बदबू. यकृत सख्त जिसमे हाथ लगाने या चलने से दर्द बढ़ता   है। दाहिने तरफ सोने, खाना खाने से दर्द बढ़ना। गैस बनना और गोले की तरह ऊपर की तरफ चढ़ना। कब्ज हो तो 200 से ज्यादा पावर देनी चाहिए। मुंह से थूक आते रहना। पैरों में सूजन. जीभ पर दांत के निषान बनना तथा जीभ पर पीला मैल जमना।
एबिस नाईग्रा: यह दवा सबसे अधिक फायदा पेट रोगों में करती है। हृत्पिंड की तकलीफ में भी।  गैस बनना व खट्टी डकारें आना, बुजुर्गों को होने वाली पेट की तकलीफों में यह दवा फायदेमंद है। खाना खाने के बाद पेट में दर्द व कब्ज भी इस दवा का लक्षण है, लेकिन इस दवा का मुख्य लक्षण है जिसमें कि यह   अधिक फायदा करती है वे है पेट में गोला सा महसूस होना, जैसे अण्डा हो। यह गोला पेट में पड़े खाने का भी हो सकता है और गैस का भी। सुबह भूख नहीं लगती है, लेकिन दिन के समय व रात को अच्छी भूख लगती है, भूख की वजह से सो नहीं पाता।

विशेष

कैरिका पेपयाः यह दवा कच्चे पपीते से तैयार होती है। पपीता लीवर के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। जब खाने में कुछ भी हजम न हो रहा है, जो खाता है वही उल्ट देता हो, मुंह का स्वाद खराब हो, आंखें पीली, खून की कमी, कमजोरी, पानी के पीने से भी डरे तो भोजन करने के इस दवा की क्यू पावर की 10-12 बूंदें आधा कप पानी में खाना के बाद लेने से लाभ होता है।
नोट: उपरोक्त लेख केवल होम्योपैथी के प्रचार हेतु है. कृपया बिना डाॅक्टर की सलाह के दवा इस्तेमाल न करें. कोई भी दवा लेने के बाद विपरीत लक्षण होने पर पत्रिका की कोई जिम्मेवारी नहीं है.

Wednesday, 28 January 2015

होम्योपैथी में है खांसी का सटीक इलाज


आमतौर पर विषेशज्ञ मानते हैं कि खांसी का एलोपैथी में खास अच्छा इलाज नहीं हैं. चिकित्सक आम तौर पर मीठे शरबत रूप में कई दवाओं का मिक्चर मरीज को देते हैं, जिसमें एल्कोहल काफी मात्रा में होती है, जिसकी वजह से गले का तनाव कम होता है और मरीज को कुछ राहत महसूस होती है- और काफी बार खांसी खुद ही ठीक हो जाती है. कई बार खांसी अपना विकराल रूप धारण करती है और टीबी, दमा, फेंफड़े कमजोर होने में तबदील हो जाती है. लेकिन होम्योपैथी में ऐसा नहीं है.
होम्योपैथी में खांसी का सटीक इलाज है, चाहे खांसी कोई भी हो, कैसी भी और किसी भी कारण से हो. बस आपको लक्षण देखने हैं और दवाई दे देनी या खा लेनी है. कुछ दवाओं का विवरण नीचे दिया जा रहा है.
एंटीम टार्ट: षरीर में कफ बनने की प्रवृत्ति , बलगम गले में फंसा लगना, छाती में कफ जमा महसूस होना, छाती में घड़-घड़ की आवाज आना, रात को खांसी बढ़ना, बलगम निकालने की कोषिष में काफी बलगम निकलना, खांसी के साथ उल्टी हो जाना इसके लक्षण हैं.
कार्बोवेज: गरमी से खांसी कम होना, गले में सुरसुरी होने की वजह से लगातार खांसने की इच्छा होना,खांसना. अचानक तेज खांसी उठना. कोई ठण्डी वस्तु खाने, पीने से, ठण्डी हवा से , षाम को खांसी बढ़ना. गले में खराष महसूस होना. बारिश, सर्दी के मौसम में तकलीफ बढ़ना.
हीपर सल्फ:  इसकी खांसी बदलती रहती है, सूखी हो सकती है, और बलगम वाली भी. हल्की सी ठण्ड लगते ही खांसी हो जाती है. यही इस दवा का प्रमुख लक्षण भी है. ढीली खांसी व काली खांसी में भी यह विशेष फायदा करती है. जिस समय ठण्डा मौसम होता है, उस समय अगर खांसी बढ़ती हो, तब भी यह फायदा पहुंचाती है. जैसे सुबह, रात को खांसी बढ़ना. लेकिन ध्यान रखें कि यदि स्पंजिया दे रहे हों, हीपर सल्फ नहीं देनी चाहिए, यदि हीपरसल्फ दे रहे हों, स्पंजिया नहीं देनी चाहिए.
फेरम फाॅस: रक्त संचय में अपनी क्रिया करती है. कोई तकलीफ एकाएक बढ़ जाना, किसी तकलीफ की प्रथम अवस्था में इसका अच्छा इस्तेमाल किया जाता है. यह दवा किसी भी प्रकार की खांसी- चाहे बलगमी हो या सुखी सब में फायदा करती है. कमजोर व्यक्तियों को ताकत देने में यह दवा काम में लाई जाती है. क्योंकि कुछ रोग कमजोरी, खून की कमी की वजह से लोगों को परेषान करते हैं. अतः खून में जोश पैदा करने का काम करती है.
नेट्रम सल्फ: जब मौसम में नमी अधिक होती है, चाहे मौसम सर्दी का हो या बारिश का या फिर और रात, उस समय खांसी बढ़ती है. खांसते-खांसते मरीज कलेजे पर हाथ रखता है, क्योंकि खांसने से कलेजे में दर्द बढ़ता है. दर्द बाईं तरफ होता है. दवा दमा रोगियों को फायदा करती है. क्योंकि दमा रोगियों की तकलीफ भी बारिष के मौसम व ठण्ड के मौसम में बढ़ती है.
संेगुनेरिया: रात में भयंकर सूखी खांसी, खांसी की वजह से मरीज सो नहीं सकता, परेषान होकर उठ जाना और बैठे रहना. लेकिन बैठने से तकलीफ कम न होना. सोने पर खांसी बढ़ना. दस्त के साथ खांसी. इसके और भी लक्षण है, महिलाओं को ऋतु गड़बड़ी की वजह से खांसी हुई हो तो उसमें यह फायदा कर सकती है. पेट में अम्ल बनने की वजह से खांसी होना, डकार आना. हर सर्दी के मौसम में खांसी होना- यह भी इस दवा के लक्षण है.
केल्केरिया फास: जब गले में बलगम फंस रहा हो, छाती में बलगम जमा हो तो यह उसे ढीला कर देती है. जब बच्चे खांस-खांसकर परेशान होते हैं, उस समय भी इससे फायदा होते देखा गया है. यह दवा बच्चों में कैल्षियम की कमी को भी दूर करती है. गले में बलगम फंसना, छाती में बाईं तरफ दर्द में भी यह दवा दी जाती है.
चायना: चायना का कमजोरी दूर करने भूख बढ़ाने में बहुत अच्छा काम है. खांसी हो, भूख कम लगती हो तो कोई भी दवा लेते समय यह दवा ले लेनी चाहिए. काफी बार लिवर की कमजोरी, षरीर की कमजोरी की वजह से बार-बार खांसी परेषान करती है, बार-बार निमोनिया हो जाता है, खासकर बच्चों को. यदि चायना, केल्केरिया फास, फेरम फाॅस कुछ दिन लगातार दी जाए तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है. इस दवा के खांसी में मुख्य लक्षण है- खांसते समय दिल धड़कने लगता है, एक साथ खांसी अचानक आती है कपड़े कसकर पहनने से भी खांसी होती है. इसकी खांसी अक्सर सूखी होती है.
बोरेक्स: बलगम में बदबू व खांसते समय दाहिनी तरफ सीने में दर्द तथा ऊपर की तरफ चढ़ने पर सांस फूलना इसके लक्षण है. यह दवा टीबी तक की बीमारी में काम लाई जाती है.
काली म्यूर: यह दवा फेंफड़ों में पानी जमना, निमोनिया, काली खांसी में काम आती है. एक लक्षण इसका मुख्य है- बलगम गाढ़ा, गोंद जैसा आना.
बेलाडोना: गले में दर्द के साथ खांसी, खांसी की वजह से बच्चे का रोना, कुत्ता खांसी, भयंकर परेशान कर देने वाली खांसी, खांसी का रात को बढ़ना. खांसी सूखी होना या काफी खांसी होने के बाद या कोषिष के बाद बलगम का ढेला सा निकलना. गले में कुछ फंसा सा अनुभव होना. बलगम निकलने के बाद खांसी में आराम होना, फिर बाद में बढ़ जाना.
स्पंजिया टोस्टा: यह दवा काली खांसी की बहुत ही अच्छी दवा मानी जाती है. जब सांस लेने में दिक्कत महसूस होती हो तो इसका प्रयोग अच्छा रहता है. गले में दर्द के साथ खांसी हो तो उसमें भी यह अच्छा काम करती है. यदि काली खांसी के साथ बुखार हो तो पहले एकोनाइट दे देनी चाहिए. इस दवा के और भी लक्षण हैं. कोई गरम चीज खाने से खांसी घटना और ठण्डी हवा, ठण्डा खान-पान, मीठा खाने बातचीत करने, गाने से खांसी बढ़ना, खांसते समय गले से सीटी बजने या लकड़ी चीरने की आवाज निकलना.
इपिकाक: इसका मुख्य लक्षण है, खांसी के साथ उल्टी हो जाना. उल्टी आने के बाद खांसी कुछ ठीक सी लगती है. सांस लेते समय घड़-घड़ जैसी आवाज आना, सीने में बलगम जमना आदि इसके लक्षण हैं. यह दवा काफी तरह की खांसियों में फायदा करती है, चाहे निमोनिया हो या दमा. कई बार ठण्ड लगकर बच्चों को खांसी हो जाती उसमें भी फायदा करती है. खांसते-खांसते मुंह नीला, आंख नीली हो जाना, दम अटकाने वाली खांसी छाती में बलगम जमना आदि इसके लक्षण हैं.
हायोसियामस नाइगर: सूखी खांसी. रात को खांसी अधिक होना, सोने पर और अधिक खांसी बढ़ जाना, मरीज परेशान होकर उठकर बैठ जाता है, लेकिन उसके बैठने से खांसी घट जाती है.
मैग्नेसिया म्यूर: इसका मुख्य लक्षण है कि इसकी खांसी सोने पर घट जाती है.
एसिड कार्ब: किसी को कैसी भी खांसी हो, किसी बीमारी के साथ हो, यह सब में फायदा कर सकती है. शोच, बलगम में बदबू हो तो काफी फायदा हो सकता है. इसमें लगातार खांसी आकर परेषान करती है.
कालचिकम औटमनेल: यह दवा तन्दुरुस्त लोगों को अधिक फायदा करती है. इसका प्रमुख लक्षण है, कोई तकलीफ या खांसी किसी गंद या रसोई की गंद से बढ़ना. इसमें तकलीफ हिलने से भी व सूर्य ढूबने के बाद बढ़ती.
चेलिडोनियम: दाहिने कन्धे में दर्द होना, तेजी से सांस छोड़ना, बलगम जोर लगाने से निकलना, वो भी छोटे से ढेले के रूप में. सीने में से बलगम की आवाज आना इस दवा के प्रमुख लक्षण है. लिवर दोश की वजह से हुई खांसी में बहुत बढि़या क्रिया दिखाती है. खांसते-खांसते चेहरा लाल हो जाता है. खसरा व काली खांसी के बाद हुई दूसरी खांसी में इससे फायदा होता है.
कास्टिकम: खांसी हर वक्त होते रहना. सांस छोड़ने व बातचीत करने से खांसी बढ़ना. खांसी के साथ पेषाब निकल जाना. ठण्डा पानी पीने खांसी घटना. छाती में दर्द तथा बलगम निकलने कोषिष में बलगम न निकाल सकना और बलगम अन्दर सटक लेना. रात में बलगम अधिक निकलना इस दवा के लक्षण है.
कोनियम मैकुलेटम: बद्हजमी के साथ खांसी. खांसी सूखी जो स्वर नली में उत्तेजना से उत्पन्न खांसी. इस दवा का प्रमुख लक्षण है, खांसी रात को ही अधिक बढ़ती है, जैसे कहीं से उड़कर आ गई हो. खांसी के साथ बलगम आता है तो मरीज उसे थूकने में असमर्थ होता है, इसलिए उसे सटक जाता है.
ब्रायोनिया एल्ब: खांसी के साथ दो-तीन छींक आना. सिर दर्द के साथ खांसी. हाथ से सीना दबाने पर खांसी घटना. सूखी खांसी. गले में कुटकुटाहट होकर खांसी होना यदि बलगम होता है बड़ी मुष्किल से निकलता है जिसपर खून के छींटे होते है या बलगम पीला होता है. खाना खाने के बाद या गरमी से खांसी बढ़ना इसके प्रमुख लक्षण हैं.
रियुमेक्स: खांसते समय पेषाब निकल जाना, गला अकड़ जाना, सूखी खांसी, मुंह में ठण्डी हवा जाने, षाम को, कमरा बदलने हवा के बदलाव की वजह से खांसी बढ़ना इसके प्रमुख लक्षण है. इस दवा का एक और लक्षण है गर्दन पर हाथ लगाने से खांसी अधिक होती है. गरमी से तथा मुंह ढकने से खांसी कम होती है.
एसिड फाॅस: जरा सी हवा लगते ही ठण्ड लग जाना. सोने के बाद, सुबह, शाम को खांसी अधिक होती है. खांसी पेट से आती सी महसूस होती है. बलगम का रंग पीला होता है, जिसका स्वाद नमकीन होता है.
कार्डुअस: लीवर के ठीक से काम न करने की वजह से होने वाली खांसी में इससे फायदा होता है. इसका एक और लक्षण है कि जब खांसी आती है तो उसके साथ कलेजे  के पास भी दर्द होता है.
कैप्सिकम: गले में मिर्ची डालने की सी जलन तथा खांसने में बदबू आना, खांस-खांसकर थक जाना तथा थोड़ा सा बलगम निकलना, बलगम निकलने पर आराम महसूस होना इसके प्रमुख लक्षण हैं. इन लक्षणों में दमा में यह दवा काम करती है.
स्कुइला: छींक आने व आंख से पानी टपकने साथ तेज खांसी. अपने आप बूंद-बूंद पेशाब निकलना. सीने में कुछ चुभोने की तरह दर्द होना.
बैराइटा कार्ब: बहुत बार टाॅंसिल बढ़ने, गले में दर्द के साथ खांसी हो जाती है. यह दवा टांसिल की बहुत अच्छी दवा है. यदि दूसरी दवाओं के साथ उपरोक्त तकलीफ के साथ हुई खांसी में इसकी 200 पावर की दवा हफ्ते में एक बार ले लेनी चाहिए या गोलियों बनाकर 4 गोली सुबह 4 गोली षाम को लेनी चाहिए. इस दवा का एक और लक्षण है कि जरा सी ठण्डी हवा लगते ही या ठण्डे पानी से हाथ मुंह धोने से खांसी जुकाम हो जाता है. जुकाम छींक वाला होता है.
काली फास: यह दवा षरीर में ताकत लाने व जीवनी षक्ति जगाने का काम करती है. जब काफी दवा देने के बाद भी आराम न आ रहा हो तो लक्षण अनुसार अन्य दवा देते हुए भी इसका प्रयोग कर सकते है, संभव है फायदा हो. दमा रोगियों को इससे काफी फायदा होते देखा गया है.
लाईको पोडियम: इसकी खांसी दिन रात उठती रहती है. खांसने की वजह से पेट में दर्द हो जाता है. गलें मेंसुरसुरी होकर खांसी होती है. बलगम युक्त खांसी में कई बार बलगम नहीं निकलता, निकलता है बहुत ज्यादा वो भी या तो हरा होता है या पीला पीब जैसा. कई बार एक दिन खांसी ठीक रहती है, किन्तु दूसरे दिन फिर खांसी परेषान करती है. ठण्डी चीजें खाने से खांसी बढ़ती है व षाम को खांसी अधिक होती है. खांसी ऐसी हो कि टीबी होने की संभावना हो तो यह दवा जरूर दें. यह जहां खांसी जल्दी ठी करेगी व टीबी होने की संभावना को भी खत्म करेगी.
नोट: उपरोक्त लेख केवल होम्योपैथी के प्रचार हेतु है. कृपया बिना डाॅक्टर की सलाह के दवा इस्तेमाल न करें. कोई भी दवा लेने के बाद विपरीत लक्षण होने पर पत्रिका की कोई जिम्मेवारी नहीं है.
ध्यान रखने योग्य कुछ दवाई
एकोनाइट नेपलेसःयह भी ध्यान रखें कि किसी समय खांसते-खांसते काफी परेषानी हो रही हो, बेचैनी घबराहट लगे, पानी की प्यास भी तो  एकोनाइट नेपलेस-30 की एक खुराक दे देनी चाहिए. यह किसी भी तकलीफ की बढ़ी हुई अवस्था, घबराहट, बेचैनी में बहुत अच्छा काम करती है तथा तकलीफ की तीव्रता कम कर देती है. यदि साथ ही तेज प्यास लग रही हो, बार-बार पानी पीना पड़ता हो तो इस दवा के फेल होने की संभावना बहुत मुष्किल ही है.
बेसलीनमः यह दवा टीबी से ग्रसित फेफड़े की पीब से तैयार होती है. जब खांसी पुरानी हो, टीबी के से लक्षण हों, पीला बलगम हों- कई बार खून के छींटे भी बलगम में हो सकते हैं. खांसते समय गले, छाती में दर्द हो तो हफ्ते में केवल 2 बंूद 200 पावर की दवा लें. इसकी कम पावर की दवा नहीं लेनी चाहिए, 200 या 200 से ऊपर पावर की दवा ले सकते हैं. 2-3 बार से अधिक बार भी यह नहीं लेनी चाहिए. बार-बार इस दवा का दोहारण भी ठीक नहीं.
लक्षण मिलने पर यह दवा बहुत तीव्र गति से अपनी क्रिया दिखाती है और लक्षणों को दूर करती है. बलगम का रंग बदलती है. यदि टीबी न हुई तो तो उसे रोकती है. यदि हो गई हो तो उसे बढ़ने से रोकती है. नियमित रूप से लेना लक्षण अनुसार दूसरी लेनी चाहिए. यदि किसी भी दवा से खांसी में आराम न आ रहा हो तो अन्य दवाओं को अपनी क्रिया करने का मार्ग प्रशस्त करती है.
सल्फरः खांसी बलगम वाली हो, सुबह बढ़ती है. छाती में से बलगम की घड़घड़ाहट जैसी आवाज आती हो, खांसकर बायें फेंफड़े में से तो इनमें से कोई लक्षण रहने पर कई दवाईंयां लक्षण मिलान करके देने के बावजूद आराम न आ रहा हो सुबह खाली पेट एक खुराक तीस पावर की जरूर देकर देखें, चाहे लिक्विड में दें चाहे गोलियों में बनाकर.

Sunday, 25 January 2015

होम्योपैथी को करें याद जब बच्चा रोकर करे परेशान

बच्चा बोल न पाने की वजह से अपनी तकलीफ के संबंध में न तो बोलकर बता पाता न इशारे से बता पाता है. फलतः बच्चा रोने लगता है- काफी कोशिशों के बाद भी वह चुप नहीं होता. अभिभावक परेशान हो जाते हैं, पता नहीं क्या हो गया है बच्चे को! कई बार तो अभिभावक डाक्टर के पास न ले जाकर उसकी नजर उतारने लग जाते हैं.
एलोपैथी इलाज पद्धति के अनुसार भी जब तक तकलीफ का अंदाजा सही न हो तो दवाई देने के बाद भी बच्चे का रोना बन्द करना मुश्किल हो जाता है. लेकिन होम्योपैथी में रोते बच्चे को चुप कराने का समाधान संभव है, चाहे बच्चा किसी भी तकलीफ की वजह से रो रहा हो. चाहे चिढ़चिढ़ेपन की वजह से या किसी भय, बुरा सपना देखने, दांत निकलने के कारण बच्चा रोकर परेशान करता हो.
बच्चे की कोई विशेष तकलीफ जाने बिना, बिना कोई विशेष कारण जाने केवल बच्चे के रोने के लक्षण के अनुसार दवाई देकर बच्चे का रोना बन्द किया जा सकता है, इससे बच्चे के अन्दर कोई तकलीफ हुई हो, वह भी ठीक हो सकती है.
बच्चा सोकर अचानक उठे और बुरी तरह से रोने लग जाए, ऐसा लगे जैसे बच्चा भय, या बुरा सपना देखकर उठा हो  रेस्क्यू-30 दें. यह भय को दूर करने की बहुत अच्छी दवा है. कई बार रात को बच्चे को होने वाली कई तकलीफों में फायदा दे देती है, जब डाॅक्टर उपलब्ध होना कठिन हो जाता है. रात को बच्चे की कोई तकलीफ समझ न आए तो एक बार इस दवा को देकर जरूर देखें.
बच्चा रोकर परेशान करे. सिर दर्द, पेट दर्द का अंदेशा हो. पेट में भारी-पन महसूस हो तो
मेगफास-30, पल्सटिला-30
देकर देखें. यदि रात का वक्त हो, उपरोक्त दवाओं से आराम न महसूस हो तो इन दवाओं के बाद एक बार ओपियम-30 देकर देखें. ओपियम केवल रात के समय दें. ओपियम दर्द को कम करते हुए नींद लाने का काम करती है.
मूत्रा करने से पहले बच्चे का रोना, बार-बार पेशाब करना, निद्रा में अचानक चिल्ला उठना
बोरेक्स-30, रेस्क्यू-30
दिन के समय शांत रहना, रात को रोना, सोकर अचानक उठकर रोना, सिर घुमाना ऐसा लगना जैसे डर गया हो, मल में बदबू
जैलापा-30, जिंकम मेट-30
साईलेसिया-30
बच्चा हाथ लगाने, उसकी तरफ देखने से ही रोना, केवल गोद में घुमाने से चुप रहना, जीभ सफेद
एण्टीम क्रूड-30, सीना-30
केल्केरिया फाॅस-30
बच्चा छोटा हो या बड़ा, काफी बार बिना किसी खास तकलीफ के पूरे दिन रात रोते रहना, जरा-जरा सी बात पर रोना, गुस्सा होना, जिद्द करना, कोई चीज देने पर चुप होना या उसे भी फैंक देना, चुप करने से और अधिक रोना
कैमोमीला-30, केल्केरिया फास-30
नेट्रम म्यूर-30
दांत निकलते समय बच्चा चिढ़चिढ़ा हो गया हो, रोता हो
केल्केरिया फाॅस-30 नेट्रम फास-30, एंटीम क्रूड-30
बच्चे के अन्दर मिट्टी खाने के लक्षण हों या सलेटी आदि खाता हो
केल्केरिया फास-30, नेट्रम फाॅस-30, ऐल्यूमीना-30
गुस्से में बच्चे में एंठ, अकड़ जाने का भाव होने पर इग्नेशियाऐमेरा-30, कैमोमीला-30

बच्चे के रोने में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के संक्षिप्त लक्षण

कैमोमीलाः चिढ़चिढ़ा बच्चा. बच्चे का गुस्से में भरे रहना जैसे कुछ मांग रहा हो, लेकिन कुछ देते ही उसे फैंक देना. बहुत अधिक गुस्सा, जिद्द करना व हर वक्त रें रें करते रहना. दांत निकलते समय बच्चों को नींद आने के समय भी यह अच्छा काम करती है. बच्चे का नींद में चैंकना, बेचैन रहना, हाथ-पैर मारना.
कैल्केरिया फाॅसः यह बच्चों में केल्षीयम की कमी को दूर करने की प्रमुख दवाई है. केल्षियम की कमी की वजह से होने वाले रोगों में यह अपनी क्रिया करती है, तथा दांत निकलते समय बच्चों में होने वाले रोगों में यह फायदेमंद है. यदि बच्चों को यह दवाई नियमित  दी जाए तो उनके दांत जल्दी से खराब नहीं होते, दांतों की बीमारी से बच्चे बचे रहते हैं.
एण्टिमोनियम क्रूडः बच्चे की जीभ सफेद. बच्चा गुस्सेबाज, चिड़चिड़ा. उसकी तरफ देखने, उससे हाथ लगाने से रोना. मल में सफेद-पन.
सीनाः बार-बार नाक खोंटना, खुजाना. भूख अधिक. पेट में कीड़े होने के लक्षण. बच्चे का रो-रोकर हाथ-पैर पटकना. शरीर पर हाथ लगाने से और अधिक रोना. केवल गोद में रहना. रात को बेचैन रहना. नींद से उठकर रोने लगना. पेशाब गंदा. खाना खाने के कुछ दूर बाद ही खाना मांगना, भूख अधिक.
नेट्रम म्यूरः बहुत अधिक भूख लगना, हमेशा खाना मांगना, ज्यादा खाने के बाद भी शरीर न पनपना. सांत्वना या चुप करने पर और अधिक रोना, चिढ़ना. 
साइलिसियाः बच्चे को कब्ज. मल में बदबू. बच्चे का पेट मोटा, सिर बड़ा परन्तु पैर दुबले-पतले. बदबूदार पसीना. बच्चा जिद्दी तथा हमेशा रोते रहना. सिर में पसीना आता है.
नैट्रम फासः इसका  प्रमुख लक्षण बच्चे का मिट्टी खाना है. बच्चा दूध उल्टता है तथा खट्टी बदबू वाले दस्त करता है. दस्त हरे भी हो सकते हैं. बच्चे सोते समय दांत किड़किड़ाता है.
ऐल्यूमीनाः वो बच्चे जो मां के दूध पर न पलकर ऊपरी दूध पर पल रहे हों, कमजोर, गुस्से बाज व चिड़चिड़े. बच्चे के जो हाथ आता है वही खा जाता है चाहे चाक हो या कोयला, मिट्टी, नमक. मल बहुत सख्त तथा गांठ-गांठ सा तथा आंव युक्त. मल करने के लिए बच्चा बहुत जोर लगाता है. नरम मल के लिए भी जोर लगाता है.
इग्नेशिया ऐमेराः इसका सबसे बड़ा लक्षण है बच्चे को डांटने पर, बच्चे को अधिक गुस्सा आने पर उसे अकड़न, ऐंठन होना या अन्य कोई तकलीफ होना.
जैलापाः बच्चे का दिन-रात रोना कई बार बच्चा दिन में हंसता, खेलता है लेकिन रात होते ही तेज-तेज रोने लगता है. दस्त लगे रहने पर बच्चे के रोने पर यह दवा और भी अच्छा काम करती है.
जिंकम मेटः नींद से जगकर बच्चे का बुरी तरह रोने लगना, सिर पटकना जैसे डर गया हो ऐसा भाव प्रकट करना.
बोरेक्सः जरा सी बात पर डर जाना. नींद की अवस्था में अचानक चिल्लाकर उठ जाना. पेशाब गर्म, पेशाब करते समय बच्चे का रोना. ऊंचाई से डरना. यहां तक कि कुर्सी, चारपाई पर से भी उसे डर लगता है, गोद में लेकर उसे उतारना पड़ता है.
रेस्क्यूः यह मुख्यतः भय, बेहोशी को दूर करने वाली दवा है. चाहे भय, बेहोशी किसी भी वजह से हो. भय, बेहोशी दुर्घटना की वजह से भी हो सकती है या अन्य कारण से. आप इसका एक बार इस्तेमाल करके देखें, जरूर फायदा होगा. बच्चा अगर बिना किसी कारण या आपको कोई कारण समझ न आ रहा हो तो यह दवा देकर बच्चे को देकर सुला सकते हैं.

Saturday, 24 January 2015

जिस बीमारी का इलाज एलोपैथी में नहीं, होमियोपैथी में है

यह तो बहुत से लोगों को कि काफी बीमारियों का इलाज एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में नहीं है, बहुत से डॉक्टर प्रयोग करने के सिवा कुछ नहीं करते जबकि होमियोपैथी से वह ठीक हो सकते थे। भारत अभी वो सोच पनप भी नहीं पाई है कि अगर किसी चिकित्सा पद्धति से इलाज संभव नहीं है तो डॉक्टर दूसरी पद्धति से ईलाज करने की सलाह मरीज को दे सके । यह कमी सभी पद्धति के चिकित्सकों में है। हालाँकि ऐसी सोच चिकित्सकों में पनप जाए तो मरीजों का बहुत भला हो. जैसे संकट / एमरजैंसी में एलोपैथी चिकित्सा में ग्लूकोज, इंजेक्शन के मरीज को बहुत जल्दी और अधिक आराम पहुँचाया जा सकता , मौत के मुंह से बचाया जा सकता है। उसके बाद बीमारी को ख़त्म करने के लिए होम्योपैथी का
इस्तेमाल किया जा सकता है।
It's a lot of people a lot of diseases that allopathic treatment Ciktsa is not in the system, many doctors do not do anything except to use Homeopathy when he could be fine। India right now they could not even think of building up a system of medicine that if treatment is not possible with the other method of treatment to the doctor's advice to give to the patient। The shortage of doctors in the system। However, the building up in the doctors think that patients are very good। Such as crisis / Mrjansi in allopathic medicine in glucose, injection of the patient more comfortable very quickly and can be delivered, saved from death can be. After the illness of the end for homeopathy can be used.

वंश दोषों को दूर करने में कारगर है होमियोपेथी

बहुत सी तकलीफें हमें धातुगत दोषों के कारण उत्पन्न होतीं हैं.हमारे जन्म से पहले परिवार में किसी को हुई कोई खतरनाक बीमारी के कारण वन्शागुत आधार पर मिलती है। यह जरूरी नहीं है की, पूर्वज को जो तकलीफ हुई हो वही आपको हो। कोई अन्य बीमारी ठीक होने में रोड़ा भी बन सकती है.
अनेक बीमारी वंश दोष के कारण हो सकती है, जैसे फोड़े-फुंसी,सुजाक , दमा, टीबी आदि। फोड़े-फुंसी,सुजाक , खुजली के दब जाने के कारण बहुत सी बीमारियाँ हो जाती हैं.कोई भी तकलीफ हो सकती है -जैसे दमा, टीबी, दिल की बीमारियाँ। शरीर, जोड़ों में बाय का दर्द।
फोड़े-फुंसी,सुजाक , टीबी आदि तकलीफें जहाँ बहुत गर्म एलोपैथी दवा , इंजेक्शनों के जरिये जहाँ दबा दी या सुखा दी जाती है, वहीं होमियोपेथी लक्षणों को दूर कर बीमारी जड़ से ख़त्म कर इनके दब जाने
से होने वाली दूसरी बीमारियों के होने संभावना ख़त्म देती है. होमियोपेथी से इलाज बच्चे होने से पहले करा लिया जाए तो वह वंश दोष, बीमारी आगे की पीढी में नहीं जाएगी। होमियोपेथी चिकित्सा पद्धति के अनुसार खानदान में चाहे पहले की पीढी में किसी को सुजाक , टीबी, दमा, आदि रोग हुए हों, तो आने वाली पीढी में यह रोग होने की संभावना रहती है - होमियोपेथी से इस संभावना को रोका जा सकता है। अच्छे चिकित्सक परिवार में हुई बीमारियों के इतिहास को ध्यान में रखते हुए इलाज करते हैं - फलतः इससे बीमारी ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है या ये दवाएं सोरा विष को समाप्त कर अन्य ली जाने वाली दवाओं के लिए काम का मार्ग प्रशस्त करती है। सल्फर , सिफेलियनियम , मैडोरिनम, सोरिनमआदि ढेरों दवाएं खानदानी दोषों को दूर करने का काम करतीं हैं।
मैडोरिनम: यह वंश की वजह से होने वाली बीमारियों में काम आने वाली नोसोडस दवा है। नोसोडस यानी किसी बीमारी के कीटाणु या पीब से तैयार दवा। यह दवा उस किसी भी बीमारी में काम आ सकती है, जो परिवार में किसी को हुए सुजाक (गुप्त रोग ) के दब जाने की या होने की वजह से वर्तमान की पीढी में कोई बीमारी हुई हो। यह दवा वात रोग -कंधे, कूल्हे, घुटने आदि सभी जोडों में दर्द, चलने, फिरने वाला दर्द में अधिक फायदा करती है. क्योंकि कहा जाता है , वात रोग होने का प्रमुख वजह यह भी सम्भव है की परिवार के किसी पूर्व पुरूष -पिता,दादा आदि को सुजाक (गुप्त रोग) हुआ हो, और उनके सुजाक का विष वर्तमान पीढी में आ गया हो। साधारण वात रोग में भी यह फायदा करती है.
कोई भी बीमारी हो, लेकिन खानदान में किसी को सुजाक किसी को सुजाक हुआ हो तो यह दवा कोई भी बीमारी ठीक होने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है, लेकिन किसी नै बीमारी में इसका जल्दी से इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ज्यादातर पुराणी तकलीफ में ही दी जाती है, उसमें भी कई चुनी हुई काफी दवाई देने के बाद भी जब कोई फायदा नहीं हो रहा हो, दी जाती है।
कई बार पति के कारण सुजाक का विष स्त्री के शरीर में पहुँच जाता है और कोई बीमारी होने पर ठीक होने का नाम नहीं लेती - तब भी इस दवा का इस्तेमाल किया जा सकता है।इस दवा के प्रमुख लक्षण हैं:- बुखार में हाथ तथा पैर ठंडे रहने, गर्दन, मुंह गर्म व सिर में दर्द के साथ जलन, दबाव महसूस होना. पेशाब करते समय जलन तथा दर्द व वात का किसी प्रकार का दर्द.
इस दवा की पावर 200या उससे ऊपर इस्तेमाल करनी चाहिए. परन्तु यह दवा किसी अनुभवी चिकित्सक की कई बिना नहीं कई जानी चाहिए।
सोरिनम: खाज-खुजली की पीब से तैयार यह दवा सोरा विष की वजह से होने वाली सभी सभी बीमारियों में फायदा करती है. कई बार खाज-खुजली के दब जाने की वजह से होने वाली खांसी, जुकाम, बुखार आदि तकलीफ में बहुत बढ़िया काम आती है. शरीर में कोई भी बीमारी हो,लेकिन लक्षण अनुसार कई दवाई देने के बाद भी आराम नहीं आ रहा हो तो यह दवा अन्य दवाओं की क्रिया करने का मार्ग प्रशस्त करती है।
कोई नई बीमारी, जिसका कोई विशेष कारण नजर न आए तो तब भी यह दवा दी जा सकती है. इस दवा का एक लक्षण और है, भूख काम लगना या अधिक भूख लगना- रत को जागकर भी खाना खाना. बार-बार सर्दी सताती हो, जरा सी ठण्ड लगते ही सर्दी लग जाती हो, यहाँ तक कि गरमी के मौसम में भी सर्दी लग जाना- तब भी इस दवा का इस्तेमाल करना चाहिए.नहाने के बाद भी शरीर कि बदबू न मिटना. मल, पसीना, पेशाब, स्त्रियों के मासिक धर्म, सफ़ेद पानी आदि में बदबू. थोड़ी सी गर्मी से भी खुजली बढ़ जाना. इतनी खुजली कि खुजली वाली जगह भी घाव हो जाते हैं. भोजन अधिक खाने के बावजूद शरीर में ताकत न आना . डकार में सड़े अंडे की सी बदबू आना. त्वचा पर भूसी जैसा चर्म रोग हो- जो सर्दी में बढ़ता है, उसमें भी यह फायदा करती है।
सिफेलियनियम: उपदंश के घाव के विष से बनने वाली यह नोसोडस दवा तब काम आती है, जब दूसरी दवाओं से स्थाई फायदा नहीं होता, यानी बामारी ठीक होकर फिर प्रकट हो जाती है. इसकी तकलीफें रात को बढती हैं. मुंह का दाहिना हिस्सा पक्षाघात से ग्रस्त होना, मुंह का कोई घाव, दांतों में कोई तकलीफ, सिर में गांठें होना व स्नायु सिर दर्द में यह दवाई फायदा करती है। यह दवा लेने पर कोई बीमारी तीव्र गति से बढा सकती है, इसलिए बिना डाक्टर की देखरेख में न लें, पूरी जानकरी व अनुभव के बाद इस दवा का प्रयोग करें.
बैसलीनम: यह नोसोडस दवा टीबी से ग्रस्त फेंफड़ों की पीब से तैयार की जाती है तथा अधिक पुरानी खांसी में इस्तेमाल की जाती है, जब काफी दवाई देने के बाद भी खांसी में आराम न हो रहा हो.टीबी हो या टीबी बनने के से लक्षण हों. परिवार या खानदान में किसी को टीबी रही हो या हो. लक्षण व लेने के तरीके के बारे में जानने के लिए खांसी वाला अध्याय देखें।
स्टैफिसग्रिया: बच्चे के दांत जल्दी सड़ गल जाते हैं, काले पड़ जाते हैं, मसूड़े फूलते हैं, तब इस दवा का इस्तेमाल करना चाहिए। हो सकता है कि परिवार के किसी पुरुष को सुजाक(गुप्त रोग) हो, इस वजह से बच्चा इन तकलीफों को भोग रहा हो तो यह दवा काम कर जाती है तथा उस विष को ख़त्म कर सकती है जिससे दूसरी दवा का काम करना आसान हो जाता है।
सल्फर: यह सोरा दोष नाशक दवा है.यह गंधक से तैयार होती है. त्वचा रोग की मुख्य दवा होने के कारण यह काफी बार रामबाण का काम कर जाती है. जब किसी बीमारी में काफी दवाएं देने के बावजूद फायदा न होने पर ज्यादातर चिकित्सक इन्हीं लक्षणों में काम आने वाली अन्य दवाओं की अपेक्षा इसी दवा को देतें हैं। यह दवा अन्य दवाओं को क्रिया करने का मार्ग प्रशस्त करती है, जब यह दवा भी काम नहीं करती, जब अन्य दवाएं दी जातीं हैं. फिर भी हम कहेंगे कि लक्षण मिलान जरूरी है.
इस दवा के प्रमुख लक्षण हैं - अक्सर सर्दी लग जाना. सर्दी लगने के शिकार इसके रोगी को सोरिनम दवा के विपरीत नहाना पसंद नहीं करता, क्योंकि उसको बीमार होने का डर रहता है. सर्दी लग जाने के बावजूद उसे ठंडक अच्छी लगती है. यह दवा शरीर से कमजोर व बुद्धिमान तथा जिनकी चलने की गति तेज होती है, उन पर अच्छा काम करती है। शरीर से बदबू आती है- जो नहाने के बाद भी नहीं जाती. पैर, हाथ, तलवे में जलन होती है. पैर में ऐंठन होती है. रात को नींद नहीं आती, दिन में नींद की झपकी आती रहती है. बच्चे को बहुत भूख लगती है, जो सामने आता है उसे खा जाता है. हमेशा कुछ न कुछ खाने को मांगता रहता है. त्वचा रोग में फुंसी हो सकती है, सूखी खुजली भी.खुजली सूखी होती है,लेकिन खुजलाने में आनंद आता है- बाद में जलन होती है. इसकी खुजली का लक्षण बवासीर व मस्सों में भी है.
पेशाब व शोच करने के की जगह त्वचा रोग की वजह से लाल हो जाती है. शोच करते समय दर्द, दर्द के कारण बच्चे को शोच करने में डर लगता है. बुखार में रोगी ठंडक चाहता है, मुंह सूखा रहने की वजह से रोगी बार-बार पानी पीता है- मुंह, गले का सूखापन दूर करने के लिए. जीभ के किनारे लाल होते हैं , जीभ के बीच में सफेद निशान होता है.मानसिक लक्षण में मरीज बड़ा ही चिड़चिडा होता है, जरा सी बात ही से नाराज हो जाता है.किसी के उपदेश तो सुनना ही नहीं चाहता. कोई भी तकलीफ हो, आधी रात के बाद अधिक परेशान करती है. खांसी बलगम वाली होती है, जो सुबह अधिक बढती है.बलगम की वजह से छाती में घडघडाहट की आवाज आती है. इसका एक और उपयुक्त लक्षण है- मरीज की तकलीफ खड़े होने व बिस्तर से तकलीफ बढती है.कमर में इतना अधिक दर्द होता है कि उठने-बैठने में भी परेशानी होती है.दवा के लक्षण मिलने पर यह दवा आरम्भ में ली जा सकती है.
-कैलाश चंद चौहान

Tuesday, 10 June 2014

हिन्दी सिनेमा की भाषा तब और अब

- डा. जय कौशल
"सामान्य जीवन में हम सिनेमा की भाषा से उसके व्यवहारों से, चित्रों से, व्यवस्था से बेतरह प्रभावित रहते हैं. सिनेमा यानी पर्दे से छूटते ही सिनेमा का क्या होता है, हमारे अपने जेहन में, हमारी वाणी में. सिनेमा कैसे अपनी जगह तलाशता है, ये देखना बेहद मजेदार अध्ययन हो सकता है. मुझे अच्छी तरह याद है- बल्कि आजकल भी राजस्थान, बिहार, बंगाल आदि प्रान्तों के छोटे शहरों, कस्बों में जो फिल्मी-पोस्टर लगाए जाते हैं, उनकी तस्वीरों को देखकर ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि फिल्म से क्या अपेक्षाएँ की जानी चाहिए?"

फिल्म और समाज के बीच गहरा रिश्ता होता है. जहां फिल्में समाज से विषयों का चुनाव करती हैं, वहीं समाज पर अपना असर भी डालती हैं. बहरहाल, मैं ‘हिन्दी सिनेमा की भाषा: तब और अब’ विषय पर अपनी बात रखूंगा. मैंने यह विषय इसलिए चुना है कि क्रिश्चियन मेट्ज से लेकर लेव मानोविच तक, फिल्म की भाषा को एक खास मुहावरे की तरह देखने और बताने की एक परंपरा रही है. जैसे फिल्म की भाषा एक अलग अंदाज-ए-बयाँ लेकर आती है, जो कि हमारी आम बोलचाल की भाषा से कुछ अलग है. इस बात की पड़ताल होनी चाहिए. दूसरे, सिनेमा की भाषा को लेकर ही हरीश त्रिवेदी ने एक लेख लिखा था- ‘इट्स आल काइन्ड्स आफ हिन्दी’, जिसमें उन्होंने स्थापित किया है कि हिन्दी सिनेमा में हर तरह की हिन्दी के लिए जगह है, और ये अच्छी बात है. उक्त दोनों सवालों और वर्तमान परिदृश्य को लेकर मैंने कुछ विचार किया है.
चूंकि सिनेमा में दृश्य भी हैं, श्रव्य भी और भी बहुत तरह के आयोजन भी हैं. जब हम भारतीय सिनेमा पर नज़र डालते हैं तो पता चलता है कि सिनेमा की भाषा के प्रचार-प्रसार, साहित्यिक रचनाओं के फिल्मी रुपांतरण, हिंदी गीतों को लोकप्रियता दिलवाने में, हिन्दी की उपभाषाओं, बोलियों, सांस्कृतिक एवं जातीय प्रश्नों को उभारने में बहुत बड़ा योगदान रहा है. हिन्दी भाषा की संचारात्मकता, शैलीवैज्ञानिक अध्ययन, जन संप्रेषणीयता, पटकथा-निर्माण, संवाद लेखन, दृश्यात्मकता, संक्षिप्त कथन, बिम्बधर्मिता, प्रतीकात्मकता आदि विभिन्न मानकों को भारतीय सिनेमा ने गढ़ा, निर्मित किया है. भारतीय सिनेमा हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति का लोकदूत बनकर इन तक पहुंचने की दिशा में अग्रसर है. हिंदी सिनेमा ने बीते सौ सालों में कई बार अपना स्वरूप बदला है. समय के साथ-साथ सिनेमा की तस्वीर भी बदलती चली गई. ये बदलाव फिल्मों में हिंदी भाषा के प्रयोग में भी आए. जहाँ हिंदी सिनेमा की शुरुआत 1913 में रिलीज हुई मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से हुई, वहीं बदलते वक्त ने 1931 में अर्देशिर ईरानी द्वारा निर्देशित भारत को उसकी पहली टाॅकी ‘आलम आरा’ दी. अगर फिल्मों में संवादों की बात हो तो जाहिर है शुरुआत ‘आलम आरा’ से ही करनी होगी. जहां शुरुआती दौर में भाषा साफ, लयबद्ध और सरल थी, वहीं आधुनिक युग की भाषा के कई रंग हैं. पहले की भाषा बेहद रचनात्मक, लोक और देशकाल की दृष्टि से अर्थगर्भित होती थी. श्लीलता, चारित्रिकता और भाषाई साफगोई का पूरा ध्यान रखा जाता था, जबकि आज की तारीख में ‘स्लैंग’ शब्दों का प्रयोग फिल्मों में बेबाक तरीके से हो रहा है. गुलजार के गीत ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ से लेकर अमिताभ भट्टाचार्य के ‘भाग-भाग डीके बोस’ तक भाषा के प्रयोग में कितना अन्तर आ गया है, ये आप खुद ही देख सकते हैं. क्या यही हिन्दी के ‘आॅल काइंड्स’ हैं? और इन्हें ‘अच्छा’ कहा जाना चाहिए?
असल में, हिन्दी सिनेमा या भारतीय सिनेमा की वाचालता, प्रगल्भता, इसके बातूनीपन को देखते हुए भी हमने इसकी भाषा के अध्ययन को एक तरह से नजरअंदाज किया है. जबकि हम भाषा में ही सिनेमा को याद रखते हैं,  ऊपर के कथन से अलग जाते हुए कहूं तो सामान्य जीवन में हम सिनेमा की भाषा से उसके व्यवहारों से, चित्रों से, व्यवस्था से बहुत प्रभावित रहते हैं.
सिनेमा यानी पर्दे से छूटते ही सिनेमा का क्या होता है, हमारे अपने जेहन में, हमारी वाणी में. सिनेमा कैसे अपनी जगह तलाशता है, ये देखना बेहद मजेदार अध्ययन हो सकता है. मुझे अच्छी तरह याद है- बल्कि आजकल भी राजस्थान, बिहार, बंगाल आदि प्रान्तों के छोटे शहरों, कस्बों में जो फिल्मी-पोस्टर लगाए जाते हैं, उनकी तस्वीरों को देखकर ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि फिल्म से क्या अपेक्षाएँ की जानी चाहिए? इसमें ऐक्शन है या रोमान्स, मारधाड़ है या प्यार, या कुछ और, या सब-कुछ का घालमेल. लेकिन इसके अलावा एक और महत्त्वपूर्ण चीज होती थी, जिसे हम रेडियो पर विविध भारती चैनल आदि के माध्यम से सुनते थे- आने वाली फिल्म के हिट डायलाग, यह बताते हुए कि फिल्म के आकर्षण ये भी हैं. मुझे ये चीजें बहुत दिलचस्प लगती थीं कि ये कैसे हो रहा है कि सिनेमा को लोगों तक ले जाने के लिए दीगर माध्यमों का इस्तेमाल होता है. रेडियो इसी श्रृंखला की बहुत जरूरी कड़ी है. फिल्म देखकर आने के बाद दिलचस्प ढंग से वे डायलाॅग हमारी बातचीत का हिस्सा हो जाते थे. जिस साल मुगले-आजम आई, तो तत्कालीन प्रेमियों को मानो अभिव्यक्ति की एक नई भाषा ही मिल गई-प्यार किया कोई चोरी नहीं की, छिप-छिप आहें भरना क्या.’ अकबर और सलीम के संवादों ने पिता-पुत्रा के बीच बातचीत को एक नया संदर्भ दिया. ये आज भी होता है.
सिनेमा भाषा के प्रचार-प्रसार का एक जबर्दस्त माध्यम है. इसे मैंने गैर-हिन्दी भाषी प्रदेशों में रहते हुए करीब से देखा है. त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में, जहां हिन्दी को लेकर  कितने ही सरकारी प्रयास किए हों, जो असर सिनेमा से पड़ा है, उतना किसी तरीके से नहीं. वहां छोटे-छोटे बच्चे तीर-कमान लेकर गाते हुए मिल जाते थे- ‘मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए, बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाय.’ वे सब बड़ी आसानी से हिन्दी और उसके अनुप्रयोग समझ रहे हैं. उन्हें किसी ने क्लास में बुलाकर या एक ‘इंक्रीमेंट’ का लालच देकर हिन्दी सीखने को प्रेरित नहीं किया है. बहरहाल, ये भाषा और सिनेमा के अंतर्संबंध का सकारात्मक पहलू है. मुझे अपनी बात इसके नकारात्मक हिस्से को लेकर करनी है.
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, सिनेमा की भाषा को लेकर हरीश त्रिवेदी का लेख ‘इट्स आल काइन्ड्स आफ हिन्दी’ इस नज़रिए से काफी महत्त्वपूर्ण है. इसमें उन्होंने यही घोषित किया है कि हिन्दी सिनेमा में हर तरह की हिन्दी के लिए जगह है और ये अच्छी बात है. मेरा सवाल इस ‘हर तरह की हिन्दी’ और ‘अच्छी बात’ पर ही है. यहां मैं खराब हिन्दी या भद्दी हिन्दी, हिंगलिश, अच्छी उर्दू, खराब उर्दू, भद्दी उर्दू आदि भाषिक मेलों की बात नहीं कर रहा हूं. मेरा फोकस भाषा के प्रचलित शब्दों, मुहावरों के अर्थ-परिवर्तन यानी अर्थ-संकोच, अर्थ विस्तार या अर्थों के रूढि़करण पर है. हम जानते हैं कि सिनेमा का समाज पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ता है, इस तथ्य का उपयोग अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में संभव है. भाषा के संबंध में भी. सिनेमा में प्रयुक्त हुए एक-एक शब्द, हरेक डायलाॅग का अपना असर होता है. अगर आपको समाज में किसी शब्द को ‘क्वाइन’ करवाना है, बस उसका किसी फिल्म में प्रयोग करा दीजिए, फिर देखिए. गांधीगीरी, हिन्दी कर देना.....जैसे कितने ही शब्द-पद इसके उदाहरण हैं.
एक समय इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता था कि रेडियो पर वैसे गाने नहीं बजाए जाएंगे जिनके शब्द ठीक नहीं हैं, फ़ोहश हैं, यानि एक तरह की श्रव्य सेंसरशिप भी लागू थी और बाज मर्तबा मजेदार स्थितियां भी पेश आती थीं, जिनका समय-समय पर श्रोता वर्ग ने लुत्फ लिया, समर्थन किया तो विरोध भी. कई गाने रिकार्डों पर तो होते थे, लेकिन फिल्म से गायब पाए जाते थे, कई गानों के कुछ अंश ही फिल्म या प्रसारण से उड़ा दिए जाते थे. सिर्फ एक ही फिल्म की मिसाल लेते हैं. अमेरिकावासी उद्भट सिनेसंगीत-रसिया सतीश कालरा के अनुसार, फिल्म छलिया(1960) का सबसे पहला शीर्षक गीत था ‘छलिया मेरा नाम’....जिस पर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति की थी कि इससे फिल्म के नायक के व्यवसाय का पता चलता है कि वह जेबकतरा है. इसलिए रिकाॅर्ड पर दिए गए मुखड़े - छलिया मेरा नाम, छलना मेरा काम -2 को बदलकर यूं कर दिया गया था - छलिया मेरा नाम, छलिया मेरा नाम. ‘आवारा’ जैसे शब्द जरूर चले थे पर इसमें वैसी अशिष्टता नहीं है.
इसी तरह इस फिल्म के अन्य गीत ‘डम डम डिगा डिगा’ में भी हेर-फेर हुआ था. प्रथम अंतरे की अंखियाँ झुकीं-झुकीं, बातें रुकीं-रुकीं देखो लुटेरा आज लुट गया... पंक्तियों को बदलकर ‘अंखियां झुकीं-झुकीं, बातें रुकीं-रुकीं, देखो कोई रे आज लुट गया’ कर दिया गया था. इसके दूसरे अंतरे के बीच की पंक्तियों, धंधा खोटा सही, बन्दा छोटा सही को नसीबा खोटा सही, बंदा छोटा सही कर दिया गया था. गीत का तीसरा अंतरा - तेरी कसम तू मेरी जान है, मुखड़ा भोला-भाला, छुपके डाका डाला...तो फिल्म से शायद काट ही दिया गया था क्योंकि यह वीडियो कैसेट, आदि पर भी सुनाई नहीं देता. आजकल न तो श्रव्य की सेंसरशिप बची दृश्य की. एक तो वह जमाना था और  एक आज का समय है.
जिस तरह की द्विअर्थी भाषा का प्रयोग ‘डैली बैली’, ‘गैंग्स आफ वासेपुर’, ‘ग्रांड मस्ती’, ‘रामलीला’, ‘बाॅस’ या आजकल आ रही फिल्मों में हो रहा है क्या उससे हिंदी के स्तर में गिरावट नहीं आई है? क्या आपको ‘कमीने’, ‘लफंगे-परिन्दे’, ‘बद्तमीज’ सुनकर अब पहले जितना बुरा लगता है. आजकल आ रही फिल्मों ने इन शब्दों के अर्थ का विस्तार कर दिया है. पहले जिन्हें सुनकर गुस्से या अपमान का बोध होता था, अब वहां गर्व जैसा कुछ महसूस होता है. पहले प्यार में ‘पगला’, ‘पगली’, ‘बेवकूफ’, ‘नादान’ कह दिया जाता था, आजकल बद्तमीज, लफंगे, कमीने और बहुत कुछ द्विअर्थी, जिसे यहां बताया भी नहीं जा सकता. अब तो फिल्मों को ‘यू’, ‘ए’ सर्टिफिकेट देना या उन्हें ‘बी’ या ‘सी’ ग्रेड में श्रेणीगत करना फालतू की कवायद लगती है. सब जगह कमोबेश एक जैसी ‘डर्टी पिक्चर’ हैं. चूंकि ये सब हमारे लोक में भी मौजूद है अथवा जनता ऐसा ही सिनेमा चाहती है, क्या ऐसे लचर तर्क देकर समस्या से किनारा कर लिया जा सकता है. शायद नहीं. ना ही आप मुझ पर सामंती नैतिकतावादी होने का आरोप लगाकर मुद्दे से बच सकते हैं. मैं ये नहीं कह रहा कि साहित्य में ऐसे प्रयोग नहीं हुए हैं. बरसों पहले भीष्म साहनी ने ही एक कहानी लिखी थी- ‘ओ हरामजाद’. पर इसके बावजूद ऐसे प्रयोगों को ऐसा कथित ‘अर्थ-गौरव’ नहीं मिला था, जैसा आजकल के सिनेमा से मिला है. ‘आधा गांव’, ‘काशी का अस्सी’ अथवा समकालीन अस्मितावादी साहित्य में भी गालियों का प्रयोग मिल जाता है, पर वह सोद्देश्य है, घटिया मनोरंजन मात्रा वहां नहीं है. मुझे गंभीरतापूर्वक लगता है कि सिनेमा की सामाजिक सोद्देश्यता, उपयोगिता और ‘पाॅप्युलेरिटी’  देखते हुए मात्रा मनोरंजन के नाम पर ऐसे घटिया द्विअर्थी उपयोगों से बचा जाना चाहिए.

परिचय :

जय कौशल
1981 में राजस्थान के अलवर जिले में जन्म. 2009 से 2013 तक त्रिपुरा विश्वविद्यालय में और अब प्रेसीडेन्सी विश्वविद्यालय, कोलकाता के हिंदी विभाग में सहायक प्राध्यापक. जेएनयू से ‘वी.एस. नायपाल के उपन्यास हाफ ए लाइफ का हिन्दी अनुवाद’ पर एम.फिल और ‘प्रेमचन्द की कहानियों के अंग्रेजी अनुवादों का आलोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर पीएच.डी. दो पुस्तकें, कुछ आलेख और समीक्षाएँ प्रकाशित। फिलहाल कोलकाता में रहनवारी.  मो. नं.: 09612091397
ईमेल: jaikaushal81@gmail-com
पता: हिन्दी विभाग, एन एस बिल्डिंग,
86ध्1, काॅलेज स्ट्रीट,   प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता-73

Friday, 6 June 2014

जुल्म और उससे मुक्ति की राह

- डा. गुलाब


"उत्पीड़न आज के संदर्भ में नया और अधिक स्पष्ट इसलिए नज़र आता है, क्योंकि इसके प्रतिरोध की जमीन तैयार हुई है. पहले के समय में ये प्रकाश में नहीं आता था. अब एक ओर यह प्रतिरोध की बदौलत अधिक हिंसक हुआ है तो दूसरी ओर साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा है." 

जाति-पाति आधारित भारतीय समाज में दलित जातियों के प्रति घृणा और भेदभाव  व्यापक स्तर पर विद्यमान है. किसी+7 भी सभ्य समाज में किसी समूह विशेष  के प्रति होने वाली हिंसा के पीछे के कारणों को जानना और उसके खिलाफ जनमत  तैयार करना एक आवश्यक कार्य है. किसी दुर्बल अस्मिता अथवा कमजोर आर्थिक हैसियत वाले समूह या समुदाय पर दमन अथवा हिंसा जनतंत्रा और जनतांत्रिक व्यवस्थाओं के आधार में मौजूद विद्रूपता को बेनक़ाब करती है.
 भारतीय समाज में एक समुदाय द्वारा किसी दूसरे समुदाय के प्रति होने वाली हिंसा के आधार मोटे तौर पर ये हैं:
1. साम्प्रदायिक हिंसा      
2. क्षेत्रावाद आधारित हिंसा
3. भाषायी आधार पर हिंसा
4. नस्लीय हिंसा
5. जाति आधारित हिंसा
साम्प्रदायिक हिंसा: साम्प्रदायिक हिंसा भारत में बहुसंख्यक धार्मिक समुदायों द्वारा अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों पर होती रहती है. इसमें समय-समय पर मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई शिकार बनते रहे हैं. मुख्यतः इन्हीं साम्प्रदायिक भावनाओं को आधार बनाकर प्रमुख तौर पर भाजपा और शिवसेना सरीखे दल अस्तित्त्व में आए और शासकीय दल बनते रहे हैं. ऐसा करके अपने लिए राजनीतिक गोलबंदी करना तुलनात्मक रूप से आसान है.
क्षेत्रवाद आधारित हिंसा: क्षेत्रवाद को आधार बनाने वालों भी दक्षिणपंथी दल ही प्रमुख हैं. दरअसल क्षेत्रावाद को आधार बनाकर समाज में छद्म संघर्ष पैदा करके शिवसेना द्वारा उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वालों के प्रति नफरत और हिंसा करके राजनीतिक अवसर तलाशा गया.  
भाषाई आधार पर हिंसा: एक भाषा-भाषी समूह गैर भाषा-भाषी समूह को अपनी नफरत का आधार बना कर अपने असंतोष और क्रोध को अभिव्यक्त करता है. यह अनायास नहीं होता बल्कि इसके पीछे प्रतिक्रियावादी विचारधारा ही काम करती है. ये राजनीतिक ताकतें वास्तविक संघर्षों पर पर्दा डालकर, झूठे मुद्दों को आधार बना कर अपने लिए राजनीतिक स्पेस बनाती है. इस प्रकार ये वर्ग सत्ता में भागीदार बनकर अपनी आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करता है.
नस्लीय हिंसा: नस्ल आधारित हिंसा वैश्विक पैमाने पर शासक वर्गों के लिए व्यवहार में लाई जाती रही है. किन्तु भारत में उत्तर-पूर्व से आने वाले लोगों पर उत्तर भारतीयों के प्रतिक्रियावादी तबकों द्वारा नस्ली टिप्पणी करके उन्हें अपमानित-लांछित किया जाता रहा है.दिल्ली में ऐसी घटना पिछले दिनों प्रकाश में आई.
जाति आधारित हिंसा:  जहां तक जाति आधारित उत्पीड़न का सवाल है, यह भारत भर की विशेषता है. इसके पीछे के कारणों को टटोला जाए तो यह साफ है कि परंपरा से अछूत और वर्तमान में दलित कही जाने वाली जातियां इसकी सबसे बड़ी शिकार होती रही हैं. आज के संदर्भ में यह नया और अधिक स्पष्ट इसलिए नज़र आता है, क्योंकि इसके प्रतिरोध की ज़मीन तैयार हुई है. पहले के समय में ये प्रकाश में नहीं आता था. अब एक ओर यह प्रतिरोध की बदौलत अधिक हिंसक हुआ है तो दूसरी ओर साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा है.
ऊपरवर्णित हिंसा अत्यंत निंदनीय ही नहीं, आधुनिक समाज की ओर जाने की दिशा में बहुत बड़ी बाधा हैं. साथ ही ये वास्तविक संघर्ष को ओझल करके न केवल रोड़ा बनती हैं बल्कि ऊपरी वर्ग को बल भी प्रदान करती है. अब इस वास्तविक कटु सच्चाई के खिलाफ क्या किया जाए? ये सोचने का विषय है. क्या सचेतन प्रयासों के आधार पर तस्वीर को बदलने में विचारों की कोई भूमिका होती है? इसका जवाब न में देने पर हम चेतना के महत्त्व को खारिज कर देंगे जो  न तो उचित है और न ही सच.  इस संदर्भ में देखने की बात यह है कि निम्न वर्गों में वस्तुगत स्तर पर तरक्की-पसंद संभावना मौजूद है. यदि इसको शिक्षा, आंदोलन और गतिविधियों के आधार पर बढ़ाया जाए तो असली संघर्षों (आर्थिक)  को मुख्य संघर्ष बनाया जा सकता है. ऐसा होने पर धर्म, क्षेत्रा, भाषा, नस्ल और जाति आधारित उत्पीड़न न केवल समाप्त हो सकता है बल्कि उच्च वर्गों  के लिए बड़ा आघात हो सकता है .
दलित उत्पीड़न एवं राजनीतिक दल  
दलित-उत्पीड़न पर विभिन्न राजनीतिक समूहों की प्रतिक्रिया अपने चुनावी नफे-नुकसान से तय होती है, किसी वैचारिक संजीदगी की वजह से नहीं. उदाहरण के लिए गांधी विचार की हामी  कांग्रेस अपने भरपूर  दलित हितैषी होने की घोषणाओं के बावजूद दलितों के पक्ष में खड़ी होने से कतराती है. दूसरी और भाजपा की महान राष्ट्र की अवधारणा में दलित समाहित ही नहीं हो पाते. उनके लिए भी वोट आधारित राजनीति में ये घाटे का सौदा साबित हो सकता है. फायदे के सौदे में वे कदापि पीछे नहीं रहते. मुसलमानों के खिलाफ और हिन्दुओं के पक्ष में वे खुलकर आती है और वोट भी पाती है. राष्ट्रवाद यहां प्रश्नांकित होता है.
वामपंथी दल वंचितों-शोषितों की राजनीति के हामी हैं. इसके लिए वे किसानों और खेत मजदूरों की यूनियन का निर्माण करते हैं. किन्तु दलित उत्पीड़न को लेकर स्पष्ट पहलकदमी लेने में ये भी अक्सर पीछे ही रहते हैं. आखिर घोषित तौर पर दलित और तरक्की पसंद बुद्धिजीवियों की पहलकदमी पर ही दलितों पर हो रहे जोर-जुल्म के खिलाफ आवाजें सुनाई देती हैं. हां बाद में हमदर्दी जताने या नैतिकता के दबाव में कांग्रेस से लेकर वामपंथी दलों तक के नुमाइंदे अपनी हाजि़री लगा जाते हैं. वास्तविकता में इन मुद्दों को उठाने का यह कार्यभार वामदलों और उनके जनसंगठनों का बनता है. अपनी घोषित निम्न वर्गीय राजनीति के बावजूद वे ऐसा क्यों नहीं करते? आखिर कौन इस सवाल को उठाए और इस हद तक उठाए की फिर ऐसी घटनाओं की पुनरावृति न हो?
जोर-जुल्म की घटनाओं में नुक्सान सर्वाधिक गरीब दलितों का होता है. दरअसल आरक्षण के चलते किसी गांव में गिनती के कुछ लोग सरकारी सेवा में आ पाते हैं. ये लोग ही स्वर्ण समाज की किरकरी बने रहते हैं. इनकी किंचित बेहतर स्थिति उच्च जातीय अहम् को नागवार गुजरती है. कभी किसी तात्कालिक घटना की आड़ में यह कुंठित अहम दलित समूह पर टूट पड़ता है. यहां इसका शिकार सर्वाधिक गरीब दलित ही होते हैं. इस स्थिति में मध्य वर्गीय रेखा छूने वाला वर्ग अपने दलित भाई-बहनों की लड़ाई में नहीं कूदता. आवश्यकता, जातीय आधार पर एकता  स्थापित करने और सामूहिक जिम्मेवारी लेने की बनती है. इसके सिवा कोई चारा नहीं उत्पीड़न के इन सिलसिलों पर रोक लगाने का. उच्चजातीय प्रतिक्रियावादी समूह कभी एक दलित जाति के खिलाफ आएंगे तो दूसरी दलित जाति मौन रहेगी. कभी वे किसी अति पिछड़ी जाति के खिलाफ जुल्म करेंगे तो दूसरी दलित जाति अलग-थलग रहेंगी और जुल्मी को बल मिलेगा .
असल में तो यह कार्य क्रांतिकारी राजनीति के पैरोकार संगठनों को करना चाहिए. इनके अभाव में निम्न जातियों की सामूहिक एकता पर आधारित संगठनों का निर्माण बेहद जरूरी है. अन्यथा हम फिर किसी जुल्म का इंतजार करेंगे. धरना-प्रदर्शन करेंगे और घरों को लौट जाएंगे अगली किसी घटना के इंतजार तक.
इस लेख में अनेक बार वामपंथी राजनीतिक ताकतों की तरफ इशारा किया गया है कि वामपंथी अपने कर्तव्य अथवा दायित्वबोध को नहीं निभा पाये. कोई यह सवाल उठा सकता है कि वामपंथी कोई फरिश्ते नहीं होते जो किसी अन्य लोक से आकर इस जुल्मोसितम को जड़ से मिटा दें. बात सही भी है. फिर क्या हो?
कम्युनिस्टों ने अनेक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर सही पक्ष लेकर शासक वर्गों को उंगली उठाने का मौका दे दिया. आजादी से पहले 1942 के भारत छोडो आंदोलन से दूर रहने के पीछे फासीवाद को पराजित करना था. अंतर्राष्ट्रीय भाईचारे के मद्देनज़र ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष ना करने की नीति अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक दृष्टि से अपितु कोई गलत नहीं थी. लेकिन यह भारतीय जनता को नहीं समझाई जा सकी. इसके परिणाम स्वरूप मध्यवर्गीय राजनीति के पैरोकार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के हिमायती आर. एस. एस. जैसे संगठनों को अपनी राजनीति फैलाने का अवसर मिल गया. कम्युनिस्टों का सच आर. एस. एस. और कांग्रेस के झूठ से हार गया.
भारत-चीन युद्ध नेहरू की तमाम गलतियों और कूटनीतिक अदूरदर्शिता के कारण हुआ. ऐसे में वामपंथियों ने युद्ध की मुखालफत करने का निर्णय लिया. राष्ट्रवादियों की निगाह में वे फिर ‘देशद्रोही’ बने. प्रकारांतर  में वामपंथ के लिए स्पेस कम हुआ और कथित राष्ट्रवादियों के लिए बड़ा, जिसका परिणाम बी. जे. पी. का उभार हमारे सामने है.
धर्म के महत्त्व और ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के कारण भी साम्यवादी विचारधारा अपना आधार फैलाने में अपेक्षित रूप से कामयाब नहीं हो सकी. यद्यपि धार्मिक मतों की व्यक्तिगत मान्यता की वह हिमायती है, किन्तु शासक वर्गीय वैचारिक  समूह को धर्म के प्रति कम्युनिस्ट नज़रिये के प्रति दुष्प्रचार करने के मौका मिल गया.
सच पर चलना दरअसल सदैव मुश्किल होता है किन्तु, कहा यह जाता है कि सच की जीत होती है. जरुरत है सच पर पड़ी परत को हटाने की. इस परत को हटाने के लिए पुरातत्ववेत्ता की सी नज़र की दरकार है जो, इतिहास की महत्त्वपूर्ण सामग्री बड़े सलीके से खोजता है. इस सलीके से कि उस सामग्री को कोई नुकसान भी न हो और वह सामने भी आ जाए.
निम्न जातियों को उच्च जातीय जुल्म से मुक्ति की दिशा में बढ़ने के लिए दलित जातियों की एकता के साथ-साथ उच्च जाति के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के साथ एकता बनानी जरूरी है. दरसल यह तबका उच्च जातीय अहं से ग्रस्त होता है लेकिन उसे समझाना नामुमकिन नहीं है. जातिवादी मानसिकता से मुक्ति की जरुरत तो स्वयं दलितों को भी है, केवल गैरदलितों पर ऊँगली उठाना काफी नहीं.
सूझ बूझ और विवेक के आधार पर संघर्ष और निर्माण की राह पर चलकर ही मुक्ति की राह निकलेगी, लेकिन यह भी ठीक है कि मुक्ति के रास्ते अकेले नहीं मिलते, यह जुल्म के विभिन्न रूपों के प्रति हमलावर होने से ही निकलेंगे!