-राजेश कश्यप
उत्पीड़न के सन्दर्भ में दलितों का मानना है कि दबंग जातियां अपनी पुरानी जमीन को खिसकते हुए नहीं देखना चाहती. उनको लगता है कि ये जातियां हमारी गुलामी करती थीं. आज इनका जीवन क्यों बदल रहा है? यही कुढ़न इनको दलितों पर अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित करती है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दलितों की इस सोच में कितना दम है? यदि दम है तो फिर यह संकीर्ण मानसिकता कब और कैसे बदलेगी? यदि नहीं तो दलित इस तरह का निष्कर्ष निकालने के लिए विवश क्यों हुए हैं?
हरियाणा में दलित उत्पीड़न की स्थिति बेहद गंभीर हो चली है. स्थिति की गंभीरता का अन्दाजा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा हाल ही में हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव को भेजे गए उस पत्रा से बड़ी सहजता से लगाया जा सकता है, जिसमें पिछले तीन वर्षों के दौरान दर्ज हुए दलित उत्पीड़न मामलों का पूरा ब्यौरा 10 दिन के अन्दर देने के निर्देश जारी किए गए हैं. आयोग ने पत्रा के जरिये हरियाणा सरकार से वर्ष 2011-12, वर्ष 2012-13 और वर्ष 2013-14 के दौरान हत्या, बलात्कार, आगजनी, गंभीर चोट व भारतीय दण्ड संहिता के तहत अन्य सभी मामलों का ब्यौरा स्पष्ट तौर पर मांगा है. मुख्य सचिव आयोग को क्या ब्यौरा भेजेंगे, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा, लेकिन हाल-फिलहाल हरियाणा प्रदेश में दलितों की स्थिति अत्यन्त दयनीय एवं चिंतनीय दिखाई दे रही है. जिस तरह से एक के बाद एक मामले संज्ञान में आ रहे हैं, उनसे दलितों में कथित तौर पर दबंगों का खौफ स्पष्ट नजर आ रहा है. इस समय हिसार जिले के गांव भगाणा की चार दलित लड़कियों के साथ हुए गैंगरेप का मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में छाया हुआ है.गत 23 मार्च, 2014 को रात आठ बजे दबंग जाति के लोगों ने चार दलित परिवार की लड़कियों को घसीटकर कार में डाल लिया और दो दिन तक दर्जन भर युवक गैंगरेप करते रहे. प्राप्त जानकारी के अनुसार ये पीडि़ताएं उन दलित परिवारों की हैं, जिनका गांव के दबंग लोगों ने वर्ष 2011 से जमीन विवाद के चलते सामाजिक बहिष्कार कर रखा है और न्यायालय, मानवाधिकार आयोग एवं अनसूचित जाति आयोग के निर्देशों के बावजूद इस बहिष्कार को समाप्त नहीं किया गया है. पीडि़त परिवार ने बहिष्कार के बावजूद गांव नहीं छोड़ा तो गुस्से से भन्नाये दबंगों ने दलित परिवारों को सबक सिखाने के लिए उनकी चार बेटियों के साथ गैंगरेप के कुकृत्र्य को अंजाम दे डाला. मामले के संज्ञान में आने के बावजूद पुलिस ने दो दिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं की. विरोध के बढ़ते व मामले को गंभीर होता देख 25 मार्च को पुलिस ने एफआईआर दर्ज की.
वर्ष 2011 से जमीन विवाद के चलते सामाजिक बहिष्कार के शिकार पीडि़त दलित परिवार 21 मई, 2012 से न्याय पाने के लिए हिसार के लघु सचिवालय में धरने पर बैठे हैं. कुछ परिवार इस समय दिल्ली के जंतर-मंतर पर न्याय के लिए बैठे हैं. उनकी मांग है कि गैंगरेप मामले के बचे हुए दोषियों को गिरफ्तार किया जाए. यह लोग पीडि़त परिवार व लड़कियों को किसी दूसरी जगह पुनर्वास सुविधा के साथ-साथ आर्थिक सहायता देने की भी मांग कर रहे हैं. मामले में मात्रा 5 दोषियों की गिरफ्तारी के अलावा अन्य कोई प्रगति अभी तक नहीं हुई है. इसी तथ्य से सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है कि सरकार इस मामले के प्रति कितनी सजग और संवेदनशील है.
वर्ष 2010 में घटित हिसार जिले के मिर्चपुर गांव का मामला भी आज तक नहीं सुलझ पाया है. इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय भी हरियाणा सरकार को खरी-खोटी सुना चुका है. लेकिन, हरियाणा सरकार की संवेदनहीनता टूटने का नाम ही नहीं ले रही है. दरअसल, 21 अपै्रल, 2010 को मिर्चपुर में दलित परिवार के एक कुत्ते के भोंकने की सजा दबंग लोगों ने दलित बस्ती को आग में झोंककर दे डाली. इस आगजनी में 70 साल का दलित बुजुर्ग और एक 18 वर्षीय अपंग लड़की जिन्दा जल गए और मौत के इस नंगे नाच से सदमें में आए सौ से अधिक दलित परिवारों को गांव छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा. बेघर हुए इन लोगों को एक समाजसेवी वेदपाल तंवर ने हिसार स्थित अपने फार्म हाऊस में शरण दी और उनकी लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठाया. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी हिसार में पीडि़तों से मिलने के लिए पहुंचे थे. इसके बावजूद पीडि़तों की न्याय के लिए आज भी जंग जारी है. गत 4 अपै्रल को हरियाणा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपना जवाबदावा पेश करते हुए बताया कि मिर्चपुर पर 19 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं, जिसमें सुरक्षा व्यवस्था के लिए सीआरपीएफ पर 11 करोड़, पुलिस पर 4 करोड़ और शेष राशि अन्य कार्यों पर खर्च की गई है. इसके साथ ही दावा किया गया कि पीडि़त परिवारों के 49 लोगों को सरकारी नौकरियां भी दी जा चुकी हैं. हरियाणा सरकार के इस जवाबदावे पर सर्वोच्च न्यायालय ने पीडि़त पक्ष से चार सप्ताह में अपना जवाब पेश करने के आदेश दिए हैं. इस बीच ह्यूमन राइट लाॅ नेटवर्क के स्टेट काॅर्डिनेटर एडवोकेट कल्सन ने बताया है कि सरकारी नौकरी 49 को नहीं, बल्कि चन्द लोगों को ही मिली है. बाकी लोगों को कान्ट्रेक्ट पर लगाया था, जोकि अब हट चुके हैं.
"गत 23 मार्च, 2014 को रात आठ बजे दबंग जाति के लोगों ने चार दलित परिवार की लड़कियों को घसीटकर कार में डाल लिया और दो दिन तक दर्जन भर युवक गैंगरेप करते रहे. प्राप्त जानकारी के अनुसार ये पीडि़ताएं उन दलित परिवारों की हैं, जिनका गाँव के दबंग लोगों ने वर्ष 2011 से जमीन विवाद के चलते सामाजिक बहिष्कार कर रखा है और न्यायालय, मानवाधिकार आयोग एवं अनसूचित जाति आयोग के निर्देशों के बावजूद इस बहिष्कार को समाप्त नहीं किया गया है."
हरियाणा में दलित उत्पीड़न के चन्द मामले नहीं हैं, बल्कि उनकीं एक लंबी फेहरिस्त है. गत वर्ष 25 अगस्त, 2013 को जीन्द जिले के गांव बनियाखेड़ा की 19 वर्षीया डीएड दलित छात्रा का दुष्कर्म के बाद हत्या करके नहर के समीप झाडि़यों में फेंका गया शव मिला. जब पीडि़त पक्ष पुलिस की लापरवाही के खिलाफ सड़कों पर उतरा तो उन पर बड़ी बेरहमी से लाठीचार्ज किया गया. अपै्रल, 2013 में भिवानी जिले के रिवासा गांव में नन्ही बच्ची को दूध पीला रही दलित महिला के साथ दबंगों के सामूहिक बलात्कार करने की शर्मनाक घटना घटी. 29 मार्च, 2013 को हिसार जिले के गांव ढोबी में एक दलित युवा की हत्या करके पानी की टंकी के पास फेंक दिया गया. मार्च, 2013 में ही रोहतक जिले के गांव मदीना में दबंगों ने दलितों के मौहल्ले पर अचानक फायरिंग कर दी, जिसमें दो लोग मारे गए. लंबी जद्दोजहद के बाद मामले को गंभीरता से लिया गया. फरवरी, 2013 में हिसार जिले के सिरसाना गांव में 13 साल की मासूम बच्ची के साथ कई दबंगों द्वारा सामूहिक बलात्कार जैसा घिनौना कुकत्र्य करने का मामला प्रकाश में आया. फरवरी, 2013 में भिवानी जिले के रत्तेरा गांव में दबंगों ने एक दलित युवक की घुड़चढ़ी नहीं निकलने दी और खूब मारपीट की. जनवरी, 2013 में पलवल जिले में कथित तौर पर दबंगों की भीड़ ने दलितों पर भारी हमला बोला और पुलिस द्वारा इस मामले को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया.3 नवम्बर, 2012 को हिसार के डाया (मंगाली) गांव में एक दलित लड़की के साथ गैंगरेप किया गया और मामले में बलात्कार की दफा 376 तक हटा दी गई. अक्तूबर, 2012 में जीन्द जिले के सच्चाखेड़ा गांव में पांच दबंगों ने एक दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया. यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी अपनी संवदेना जताने पीडि़ता के घर भी पहुंची थीं. बाद में सभी दोषियों को सजा न मिलने से आहत होकर पीडि़ता ने आत्महत्या कर ली. सितम्बर, 2012 में हिसार जिले के डाबड़ा गांव में दबंगों ने एक दलित लड़की को गैंगरेप का शिकार बनाया. घटना से आहत पीडि़ता के पिता ने आत्महत्या कर ली. मई, 2011 में हिसार जिले के भगाणा गांव में दबंगों ने दलितों के मौहल्ले के आगे दीवार खींच दी और उनके हिस्से की ग्राम शामलात जमीन पर कब्जा कर लिया. जब दलितों ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई तो उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया. बहिष्कार के बावजूद दलितों ने गाँव नहीं छोड़ा तो गत 23 मार्च, 2014 को उनकीं चार लड़कियों को अगवा करके गैंगरेप को अंजाम दिया गया. फरवरी, 2011 में हिसार जिले के दौलतपुर गांव में दबंगों ने एक युवा दलित के हाथ इसीलिए काट डाले, क्योंकि खेतों में काम करते समय उसने पेड़ के नीचे रखे मटके से पानी पी लिया था.
ये सब घटनाएं तो सिर्फ बानगी भर हैं. यदि सभी मामलों की सूची तैयार की जाए तो एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो जायेगी. सभी मामलों का यदि बारीकी से अवलोकन किया जाए तो हर किसी की रूह कांप उठती है. प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2009 में अनुसूचित जाति के लोगों पर ज्यादती के 303 मामले दर्ज हुए थे. वर्ष 2010 में यह संख्या बढकर 380 हो गई. इसके अगले वर्ष 2011 में यह संख्या बढ़कर 408 हो गई, जिनमें से 60 मामले दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के शामिल थे. इस तरह से वर्ष 2008 से वर्ष 2011 के दौरान दलित उत्पीड़न में 35 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई. गत वर्ष 2013 में एक शोधकर्ता सरोजबाला ने अपने एक अध्ययन में पाया कि हरियाणा में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले में 15 प्रतिशत की बढ़ौतरी हुई है.
हरियाणा में अक्तूबर, 2012 में चले बलात्कार के अनवरत सिलसिले से खफा होकर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष पी.एल. पूनिया ने हरियाणा को ‘बलात्कार प्रदेश’ की संज्ञा देने को विवश होना पड़ा था. गत वर्ष 17 अक्तूबर, 2013 को सर्वोच्च न्यायालय को मिर्चपुर के दलितों की सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार की संवेदनहीनता पर यह तल्ख टिप्पणी करने पर मजबूर होना पड़ा कि इन लोगों का एकमात्रा दोष गरीब और ऊपर से दलित होना है. सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि क्या जाति विशेष को कानून हाथ में लेने व लोगों को मारने की पूरी छूट है? गतवर्ष 2013 में ही तत्कालीन केन्द्रीय मंत्राी कुमारी शैलजा ने दलितों पर बढ़ते अत्याचारों से आहत होकर यह कहने पर विवश होना पड़ा कि हरियाणा में दलित होना पाप है. इन्हीं सब तथ्यों की पुष्टि हरियाणा कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर ने की है. उन्होंने मीडिया के साथ बातचीत में कहा कि प्रदेश का दलित वर्ग खुद को असुरक्षित महसूस करता है. दलितों की आवाज राज्य सरकार ने नहीं सुनीं, लेकिन अब कांग्रेस संगठन उनकी बात सुनेगा. इन सबके ठीक उलट प्रदेश की भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सरकार दलितों पर अत्याचार बढ़ने के आरोपों को सिरे से नकार रही है और अन्य सभी दलों से अधिक दलित-हितैषी होने का दावा कर रही है.
इस उत्पीड़न के सन्दर्भ में दलितों का मानना है कि दबंग जातियां अपनी पुरानी जमीन को खिसकते हुए नहीं देखना चाहती. उनको लगता है कि ये जातियां हमारी गुलामी करती थीं. आज इनका जीवन क्यों बदल रहा है? यही कुढ़न इनको दलितों पर अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित करती है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दलितों की इस सोच में कितना दम है? यदि दम है तो फिर यह संकीर्ण मानसिकता कब और कैसे बदलेगी? यदि नहीं तो दलित इस तरह का निष्कर्ष निकालने के लिए विवश क्यों हुए हैं?
हिन्दी और पत्राकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर. दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी. प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित. आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित. दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित. कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल.
स्थायी सम्पर्क: म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर, गाँव टिटौली, जिला. रोहतक, हरियाणा-124005
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