- डा. गुलाब
"उत्पीड़न आज के संदर्भ में नया और अधिक स्पष्ट इसलिए नज़र आता है, क्योंकि इसके प्रतिरोध की जमीन तैयार हुई है. पहले के समय में ये प्रकाश में नहीं आता था. अब एक ओर यह प्रतिरोध की बदौलत अधिक हिंसक हुआ है तो दूसरी ओर साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा है."
भारतीय समाज में एक समुदाय द्वारा किसी दूसरे समुदाय के प्रति होने वाली हिंसा के आधार मोटे तौर पर ये हैं:
1. साम्प्रदायिक हिंसा
2. क्षेत्रावाद आधारित हिंसा
3. भाषायी आधार पर हिंसा
4. नस्लीय हिंसा
5. जाति आधारित हिंसा
साम्प्रदायिक हिंसा: साम्प्रदायिक हिंसा भारत में बहुसंख्यक धार्मिक समुदायों द्वारा अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों पर होती रहती है. इसमें समय-समय पर मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई शिकार बनते रहे हैं. मुख्यतः इन्हीं साम्प्रदायिक भावनाओं को आधार बनाकर प्रमुख तौर पर भाजपा और शिवसेना सरीखे दल अस्तित्त्व में आए और शासकीय दल बनते रहे हैं. ऐसा करके अपने लिए राजनीतिक गोलबंदी करना तुलनात्मक रूप से आसान है.
क्षेत्रवाद आधारित हिंसा: क्षेत्रवाद को आधार बनाने वालों भी दक्षिणपंथी दल ही प्रमुख हैं. दरअसल क्षेत्रावाद को आधार बनाकर समाज में छद्म संघर्ष पैदा करके शिवसेना द्वारा उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वालों के प्रति नफरत और हिंसा करके राजनीतिक अवसर तलाशा गया.
भाषाई आधार पर हिंसा: एक भाषा-भाषी समूह गैर भाषा-भाषी समूह को अपनी नफरत का आधार बना कर अपने असंतोष और क्रोध को अभिव्यक्त करता है. यह अनायास नहीं होता बल्कि इसके पीछे प्रतिक्रियावादी विचारधारा ही काम करती है. ये राजनीतिक ताकतें वास्तविक संघर्षों पर पर्दा डालकर, झूठे मुद्दों को आधार बना कर अपने लिए राजनीतिक स्पेस बनाती है. इस प्रकार ये वर्ग सत्ता में भागीदार बनकर अपनी आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करता है.
नस्लीय हिंसा: नस्ल आधारित हिंसा वैश्विक पैमाने पर शासक वर्गों के लिए व्यवहार में लाई जाती रही है. किन्तु भारत में उत्तर-पूर्व से आने वाले लोगों पर उत्तर भारतीयों के प्रतिक्रियावादी तबकों द्वारा नस्ली टिप्पणी करके उन्हें अपमानित-लांछित किया जाता रहा है.दिल्ली में ऐसी घटना पिछले दिनों प्रकाश में आई.
जाति आधारित हिंसा: जहां तक जाति आधारित उत्पीड़न का सवाल है, यह भारत भर की विशेषता है. इसके पीछे के कारणों को टटोला जाए तो यह साफ है कि परंपरा से अछूत और वर्तमान में दलित कही जाने वाली जातियां इसकी सबसे बड़ी शिकार होती रही हैं. आज के संदर्भ में यह नया और अधिक स्पष्ट इसलिए नज़र आता है, क्योंकि इसके प्रतिरोध की ज़मीन तैयार हुई है. पहले के समय में ये प्रकाश में नहीं आता था. अब एक ओर यह प्रतिरोध की बदौलत अधिक हिंसक हुआ है तो दूसरी ओर साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा है.
ऊपरवर्णित हिंसा अत्यंत निंदनीय ही नहीं, आधुनिक समाज की ओर जाने की दिशा में बहुत बड़ी बाधा हैं. साथ ही ये वास्तविक संघर्ष को ओझल करके न केवल रोड़ा बनती हैं बल्कि ऊपरी वर्ग को बल भी प्रदान करती है. अब इस वास्तविक कटु सच्चाई के खिलाफ क्या किया जाए? ये सोचने का विषय है. क्या सचेतन प्रयासों के आधार पर तस्वीर को बदलने में विचारों की कोई भूमिका होती है? इसका जवाब न में देने पर हम चेतना के महत्त्व को खारिज कर देंगे जो न तो उचित है और न ही सच. इस संदर्भ में देखने की बात यह है कि निम्न वर्गों में वस्तुगत स्तर पर तरक्की-पसंद संभावना मौजूद है. यदि इसको शिक्षा, आंदोलन और गतिविधियों के आधार पर बढ़ाया जाए तो असली संघर्षों (आर्थिक) को मुख्य संघर्ष बनाया जा सकता है. ऐसा होने पर धर्म, क्षेत्रा, भाषा, नस्ल और जाति आधारित उत्पीड़न न केवल समाप्त हो सकता है बल्कि उच्च वर्गों के लिए बड़ा आघात हो सकता है .
दलित उत्पीड़न एवं राजनीतिक दल
दलित-उत्पीड़न पर विभिन्न राजनीतिक समूहों की प्रतिक्रिया अपने चुनावी नफे-नुकसान से तय होती है, किसी वैचारिक संजीदगी की वजह से नहीं. उदाहरण के लिए गांधी विचार की हामी कांग्रेस अपने भरपूर दलित हितैषी होने की घोषणाओं के बावजूद दलितों के पक्ष में खड़ी होने से कतराती है. दूसरी और भाजपा की महान राष्ट्र की अवधारणा में दलित समाहित ही नहीं हो पाते. उनके लिए भी वोट आधारित राजनीति में ये घाटे का सौदा साबित हो सकता है. फायदे के सौदे में वे कदापि पीछे नहीं रहते. मुसलमानों के खिलाफ और हिन्दुओं के पक्ष में वे खुलकर आती है और वोट भी पाती है. राष्ट्रवाद यहां प्रश्नांकित होता है.
वामपंथी दल वंचितों-शोषितों की राजनीति के हामी हैं. इसके लिए वे किसानों और खेत मजदूरों की यूनियन का निर्माण करते हैं. किन्तु दलित उत्पीड़न को लेकर स्पष्ट पहलकदमी लेने में ये भी अक्सर पीछे ही रहते हैं. आखिर घोषित तौर पर दलित और तरक्की पसंद बुद्धिजीवियों की पहलकदमी पर ही दलितों पर हो रहे जोर-जुल्म के खिलाफ आवाजें सुनाई देती हैं. हां बाद में हमदर्दी जताने या नैतिकता के दबाव में कांग्रेस से लेकर वामपंथी दलों तक के नुमाइंदे अपनी हाजि़री लगा जाते हैं. वास्तविकता में इन मुद्दों को उठाने का यह कार्यभार वामदलों और उनके जनसंगठनों का बनता है. अपनी घोषित निम्न वर्गीय राजनीति के बावजूद वे ऐसा क्यों नहीं करते? आखिर कौन इस सवाल को उठाए और इस हद तक उठाए की फिर ऐसी घटनाओं की पुनरावृति न हो?
जोर-जुल्म की घटनाओं में नुक्सान सर्वाधिक गरीब दलितों का होता है. दरअसल आरक्षण के चलते किसी गांव में गिनती के कुछ लोग सरकारी सेवा में आ पाते हैं. ये लोग ही स्वर्ण समाज की किरकरी बने रहते हैं. इनकी किंचित बेहतर स्थिति उच्च जातीय अहम् को नागवार गुजरती है. कभी किसी तात्कालिक घटना की आड़ में यह कुंठित अहम दलित समूह पर टूट पड़ता है. यहां इसका शिकार सर्वाधिक गरीब दलित ही होते हैं. इस स्थिति में मध्य वर्गीय रेखा छूने वाला वर्ग अपने दलित भाई-बहनों की लड़ाई में नहीं कूदता. आवश्यकता, जातीय आधार पर एकता स्थापित करने और सामूहिक जिम्मेवारी लेने की बनती है. इसके सिवा कोई चारा नहीं उत्पीड़न के इन सिलसिलों पर रोक लगाने का. उच्चजातीय प्रतिक्रियावादी समूह कभी एक दलित जाति के खिलाफ आएंगे तो दूसरी दलित जाति मौन रहेगी. कभी वे किसी अति पिछड़ी जाति के खिलाफ जुल्म करेंगे तो दूसरी दलित जाति अलग-थलग रहेंगी और जुल्मी को बल मिलेगा .
असल में तो यह कार्य क्रांतिकारी राजनीति के पैरोकार संगठनों को करना चाहिए. इनके अभाव में निम्न जातियों की सामूहिक एकता पर आधारित संगठनों का निर्माण बेहद जरूरी है. अन्यथा हम फिर किसी जुल्म का इंतजार करेंगे. धरना-प्रदर्शन करेंगे और घरों को लौट जाएंगे अगली किसी घटना के इंतजार तक.
इस लेख में अनेक बार वामपंथी राजनीतिक ताकतों की तरफ इशारा किया गया है कि वामपंथी अपने कर्तव्य अथवा दायित्वबोध को नहीं निभा पाये. कोई यह सवाल उठा सकता है कि वामपंथी कोई फरिश्ते नहीं होते जो किसी अन्य लोक से आकर इस जुल्मोसितम को जड़ से मिटा दें. बात सही भी है. फिर क्या हो?
कम्युनिस्टों ने अनेक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर सही पक्ष लेकर शासक वर्गों को उंगली उठाने का मौका दे दिया. आजादी से पहले 1942 के भारत छोडो आंदोलन से दूर रहने के पीछे फासीवाद को पराजित करना था. अंतर्राष्ट्रीय भाईचारे के मद्देनज़र ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष ना करने की नीति अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक दृष्टि से अपितु कोई गलत नहीं थी. लेकिन यह भारतीय जनता को नहीं समझाई जा सकी. इसके परिणाम स्वरूप मध्यवर्गीय राजनीति के पैरोकार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के हिमायती आर. एस. एस. जैसे संगठनों को अपनी राजनीति फैलाने का अवसर मिल गया. कम्युनिस्टों का सच आर. एस. एस. और कांग्रेस के झूठ से हार गया.
भारत-चीन युद्ध नेहरू की तमाम गलतियों और कूटनीतिक अदूरदर्शिता के कारण हुआ. ऐसे में वामपंथियों ने युद्ध की मुखालफत करने का निर्णय लिया. राष्ट्रवादियों की निगाह में वे फिर ‘देशद्रोही’ बने. प्रकारांतर में वामपंथ के लिए स्पेस कम हुआ और कथित राष्ट्रवादियों के लिए बड़ा, जिसका परिणाम बी. जे. पी. का उभार हमारे सामने है.
धर्म के महत्त्व और ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के कारण भी साम्यवादी विचारधारा अपना आधार फैलाने में अपेक्षित रूप से कामयाब नहीं हो सकी. यद्यपि धार्मिक मतों की व्यक्तिगत मान्यता की वह हिमायती है, किन्तु शासक वर्गीय वैचारिक समूह को धर्म के प्रति कम्युनिस्ट नज़रिये के प्रति दुष्प्रचार करने के मौका मिल गया.
सच पर चलना दरअसल सदैव मुश्किल होता है किन्तु, कहा यह जाता है कि सच की जीत होती है. जरुरत है सच पर पड़ी परत को हटाने की. इस परत को हटाने के लिए पुरातत्ववेत्ता की सी नज़र की दरकार है जो, इतिहास की महत्त्वपूर्ण सामग्री बड़े सलीके से खोजता है. इस सलीके से कि उस सामग्री को कोई नुकसान भी न हो और वह सामने भी आ जाए.
निम्न जातियों को उच्च जातीय जुल्म से मुक्ति की दिशा में बढ़ने के लिए दलित जातियों की एकता के साथ-साथ उच्च जाति के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के साथ एकता बनानी जरूरी है. दरसल यह तबका उच्च जातीय अहं से ग्रस्त होता है लेकिन उसे समझाना नामुमकिन नहीं है. जातिवादी मानसिकता से मुक्ति की जरुरत तो स्वयं दलितों को भी है, केवल गैरदलितों पर ऊँगली उठाना काफी नहीं.
सूझ बूझ और विवेक के आधार पर संघर्ष और निर्माण की राह पर चलकर ही मुक्ति की राह निकलेगी, लेकिन यह भी ठीक है कि मुक्ति के रास्ते अकेले नहीं मिलते, यह जुल्म के विभिन्न रूपों के प्रति हमलावर होने से ही निकलेंगे!
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