Friday, 20 December 2019

अपनाएं ये खास तरीके ताकि दुरुस्त रहे दिमाग




हम लोग बहुत टोका-टाकी करने पर अपने शरीर की ओर तो ध्यान देते हैं, लेकिन अपने दिमाग को अकसर नजरअंदाज करते रहते हैं। आज भी देश के कई हिस्सों में अगर कोई डिप्रेशन की शिकायत कर दे, तो उसे पागल कहा जाता है। पर इस सोच में तब्दीली आना बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह जरूरी है कि लोग इस विषय पर खुल कर बातें करें, ताकि इससे जुड़ी धारणाओं को तोड़ा जा सके। कुछ बिंदुओं पर ध्यान देकर आप मानसिक तौर पर स्वस्थ रह सकते हैं।
संकेतों को नजरअंदाज करना सही नहीं : 
हम मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित संकेतों को कभी जान-बूझ कर तो कभी अनजाने में अनदेखा करते हैं। समाज सेवक नीरज दोशी कहते हैं, ‘मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे लोगों को समझा नहीं जाता। यह एक बड़ी समस्या है। हमारे समाज में ऐसी चीजों पर बात करना मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख कहते हैं, ‘मानसिक स्वास्थ्य जीवन की समग्र गुणवत्ता को निर्धारित करने में मदद करता है। हमें उस पर ध्यान देने की जरूरत है। हम जितना अपने शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देते हैं, उतना ही ध्यान हमें अपने मानसिक स्वास्थ्य पर भी देना चाहिए।’
मुद्दे की चर्चा जरूरी : मनोवैज्ञानिक डॉ. आरती सूर्यवंशी बताती हैं, ‘अगर किसी के परिवार में मानसिक रोगी है, तो सबसे पहली कोशिश यह होनी चाहिए कि उसके आसपास का माहौल बेहतर बनाया जाए। उसे किसी भी तनाव से मुक्त रखा जाए। साथ ही उसे
आगे वह कहती हैं, ‘जब आप अपने बच्चों के साथ बैठकर उनकी भावनाओं के बारे में बात करते हैं, तो यह महत्वपूर्ण है कि आप जिस बारे में बात कर रहे हैं, उस पर ध्यान केंद्रित करें। किसी भी बात पर चर्चा करने से पहले आप उन्हें शांत रहना और अपनी भावनाओं को पहचानना सिखाएं। जब वे परेशान हों, तब किसी मुद्दे पर चर्चा करना सही नहीं होगा। हमें तब तक इंतजार करना चाहिए, जब तक वे दिमागी रूप से शांत न हो जाएं और आपका पक्ष सुनने के लिए मानसिक रूप से तैयार न हो जाएं।’
माता-पिता होने के नाते कोई भी अपने बच्चे के लिए सबसे बेहतर ही चाहेगा। हर माता-पिता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अगर उनका बच्चा तनाव में है, तो वे उसके लक्षणों को लेकर सजग रहें। दोशी कहते हैं, ‘उनके व्यवहारों को लेकर आप चिंतित हो सकते हैं, इसलिए आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें सही मदद मिले। मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय पर चर्चा करने के लिए माता-पिता को अपने बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए। इस विषय को भारत में निषेध माना जाता है और लोग आमतौर पर ऐसे मुद्दों पर चर्चा करने के लिए नहीं खुलते हैं।’
सुरक्षित और प्रेम महसूस कराया जाए। उसे सहज महसूस करवाया जाए और अपनी भावनाएं जाहिर करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।’

वर्जित माना जाता है। इस  मुद्दे को लेकर आज भी समाज में कई भ्रांतियां हैं, जिनकी मुख्य वजह इन्हें लेकर जागरूकता का अभाव है। यह समझना जरूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य हमारे जीवन पर एक बड़ा प्रभाव डालता है।’
क्या हैं लक्षण
किसी में अगर मानसिक बीमारी की शुरुआत होती है, तो सबसे पहले उसकी भूख और नींद में तब्दीली आती है। बहुत कम या बहुत अधिक नींद आना, खाने से जुड़ी आदतें बदलना - ये  मानसिक स्वास्थ्य की बिगड़ती स्थिति के शुरुआती लक्षण हैं। हर मानसिक बीमारी की अपनी बारीकियां होती हैं। दोशी कहते हैं, ‘उदाहरण के लिए, अवसाद के दौरान एक व्यक्ति अपनी पसंदीदा हर चीज में रुचि खो देता है- जैसे संगीत, दोस्तों के साथ बातचीत आदि।’ मनोवैज्ञानिक सलाहकार रितिका अग्रवाल मेहता कहती हैं, ‘हर मानसिक बीमारी के अपने अलग तरह के लक्षण होते हैं, पर सामान्य लक्षणों की बात की जाए, तो इनका नाम लिया जा सकता है-
- भूख और नींद में अचानक बहुत बढ़ोत्तरी होना या बहुत कमी आ जाना
- व्यवहार और व्यक्तित्व में अचानक परिवर्तन होना
- बार-बार और जल्दी-जल्दी बदलता मूड
- दैनिक गतिविधियों को निपटाने में कठिनाई
- निराशा, लाचारी और व्यर्थता की व्यापक भावनाएं होना
- आत्महत्या के बारे में बात करना  या सोचना
- दैनिक गतिविधियों से जुड़ी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर अत्यधिक चिंता जताना
- मादक द्रव्यों जैसे शराब, निकोटीन या ड्रग्स की लत लगना
-आक्रामक हो जाना या हिंसक व्यवहार करने लगना
- अजीब से ख्याल आना या अजीब व्यवहार करना
- हलूसिनेशन (भ्रम)  
अपनाएं ये खास तरीके...
मनोवैज्ञानिक सलाहकार रितिका अग्रवाल मेहता बताती हैं  मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण तरीका यह है कि आप पर्याप्त नींद लें और स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं। इसके अलावा आप और भी कुछ तरीकों को अपना सकते हैं, जैसे-
- चिंता और खराब मूड को एक भावना के रूप में पहचानें। इनसे जितना संभव हो, दूरी बनाए रखने की कोशिश करें।
-दोस्तों के साथ समय बिताना भी जरूरी है। किसी ऐसे व्यक्ति से बात करें, जिस पर आप विश्वास करते हैं। समय-समय पर उसे बताते रहें कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं। अगर कोई समस्या हो तो ऐसे लोगों की मदद लें। याद रहे, हर समस्या को अकेले सुलझाना जरूरी नहीं होता।
- सोशल मीडिया के इस्तेमाल की समय-सीमा तय करें। इस पर एक नजर रखने के लिए आप अपने फोन की विशेष ‘डिजिटल वेलनेस सेटिंग’ का इस्तेमाल कर सकते हैं।
- नियमित रूप से व्यायाम करें।
- अपने शौक को पूरा करने के लिए हर दिन थोड़ा-बहुत समय जरूर निकालें। अगर आपका कोई शौक या जुनून है ही नहीं, तो इसे विकसित करें।
- अपनी भावनाओं को लेकर सजग रहें। ऐसा करने से कोई समस्या महसूस होने पर आप तुरंत ही किसी की मदद ले पाएंगे।
- यदि आपने इन सभी तकनीकों पर काम किया है और फिर भी आपको मदद नहीं मिल रही है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।
                                                                                                -अंजलि शेट्टी,नई दिल्ली
                                                                                                              हिंदुस्तान, नई दिल्ली से साभार 

No comments:

Post a Comment