"कदम", फरवरी-अप्रैल 2014 अंक का संपादकीय
एक टीवी चैनल खुद को सबसे तेज होने की घोषणा करता है. दूसरा चैनल कहता है- जिससे कोई खबर छूटती नहीं. इससे भी बढ़कर अन्य चैनल की घोषणा है- हम खबरों की मर्म को समझते हैं. लेकिन दिन-रात मोदी का गुणगान गाने वाले चैनलों को 4 लड़कियों के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की खबर में कोई मर्म नजर नहीं आता, जबकि सामूहिक बलात्कार की शिकार चार लड़कियों में 2 नाबालिग हैं.
बलात्कार जघन्य अपराध है. सामूहिक बलात्कार उससे भी जघन्य अपराध है. नाबालिग लड़की से बलात्कार और भी अधिक जघन्य अपराध है, लेकिन हमारे इलैक्ट्रानिक मीडिया को देखिए कि वह इसे खबर ही नहीं मानता. न ही खबर में मर्म नज़र आता है.
हिसार जिले(हरियाणा) के भगाणा गांव में बलात्कार की शिकार चार लड़कियां अपने परिवार, रिश्तेदारों के साथ जंतर-मंतर, दिल्ली में धरने पर बैठी हैं. दिल्ली देश की राजधानी है. दिल्ली में निर्भया के साथ बलात्कार हुआ था, पूरे देश ने उसकी आवाज सुनी थी. उनके साथ हुए अन्याय पर भी देश, मीडिया ध्यान देगा, और पूरे देश से न सही, दिल्ली के कोने-कोने से लोग जुटेंगे और पीडि़त परिवार की आवाज को बुलंद करेंगे. जिन लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है, उनमें से दो नाबालिग हैं. जो शौच के लिए खेतों में गईं थी- वहीं से गांव के दबंगों ने दबोचकर कार में डाला और अनजान जगह ले जाकर कई दिन तक बलात्कार कर भटिंडा छोड़ दिया, अपने हाल पर. परिवार वाले रोते-बिलखते दबंगों के घर गए, थाने गए, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं. काफी कोशिशों के बाद गांव के सरपंच ने बताया कि लड़कियां भटिंडा के रेलवे स्टेशन पर हैं.
तारीफ पीडि़त लड़कियों के परिजनों की, मुंह छिपाने की बजाय इंसाफ के लिए लड़कियों के साथ खड़े हुए. दलित जाग रहे हैं, इसका यह अच्छा उदाहरण है. वरना एक समय था, लड़की के साथ बलात्कार हुआ और परिवार के लोग चुप्पी साध कर बैठ गए, किसी को पता न चल जाए. लड़की को भी चुप रहने की हिदायत दे दी जाती थी.
प्राप्त जानकारी के अनुसार इन चार लड़कियों को गांव के ही दबंगों ने 23 मार्च 2014 को उठाकर कार में डाला. 12 लड़कों ने दलितों को सजा देने के लिए इन लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया. सोची-समझी रणनीति के तहत गांव के दलित दबंगों से मुंह जोरी करने लगे हैं. दो साल पहले इसी गांव के दलितों की एक विशेष जाति का बहिष्कार किया हुआ है, यह नहीं गए. मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेंगे- उनकी चार लड़कियों के साथ बलात्कार किया, बता भी दिया कि तुम्हारी लड़कियों के साथ बलात्कार करके हमने फलां जगह छोड़ दिया है. अब तुम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे. लड़कियां मां-बाप की इज्जत मानी जाती हैं. बलात्कार लड़की के साथ होता है, इज्जत मां-बाप, रिश्तेदारों की जाती है. इसलिए बहुत बार मां-बाप, भाई का बदला लड़की की इज्जत आबरू लूटकर लिया जाता है, यह पुराना दस्तूर अब तक जारी है.
हमें इस बारे में सोचना ही पड़ेगा कि लड़कियों को बताएं कि बलात्कार होना कोई जिंदगी का अंत नहीं है, उसके बाद भी जिंदगी है. जो बल के बूते किसी स्त्री से संबंध स्थापित करते हैं उनको सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. जल्द से जल्द मिलनी चाहिए. महिलाओं के साथ ज्यादातर बलात्कार बदला लेने के लिए किए जाते हैं. ताकि महिला और उसका परिवार किसी को मुंह दिखाने लायक न रहे. ध्यान रखें कि जब बलात्कार की शिकार लड़की इज्जत से जीयेगी, मुंह छुपाकर न रहकर बलात्कारी को सजा दिलवाएगी, तो बलात्कार कम होंगे.
किसी भी महिला के साथ बलात्कार उसके जीवन भर के लिए मानसिक पीड़ा का शिकार बना जाता है. यही नहीं, उसके सामाजिक, पारिवारिक सम्मान को ठेस भी पहुंचाता है. फिर भी महिला को इस तरह का प्रशिक्षण, मानसिक मजबूती दी जाए कि बलात्कार भी एक तरह की दुर्घटना ही है- आप इसे गंभीर दुर्घटना कह सकते हैं. लेकिन फिर भी इस गंभीर दुर्घटना से बाहर निकलना तो है ही. बलात्कार के बाद भी सामान्य जीवन बिताया जा सकता है, इस तरह का सामाजिक माहौल प्रदान किया जाए तो कितना अच्छा रहे. इससे बलात्कारों में भी कमी आएगी. ऊपर भी कहा चुका है कि ज्यादातर बलात्कार महिला या उसके परिवार के लोगों से बदला लेने के उद्देश्य से किये जाते हैं. खेरलांजी, भगाणा आदि बलात्कार इसके उदाहरण हैं. बलात्कार करने वालों को सख्त सजा, सुनवाई फास्ट ट्रेक के जरिये हो, बलात्कार की शिकार महिलाओं का पुनर्वास किया जाए तो बलात्कार में कमी लाई जा सकती है. बलात्कार की शिकार महिलाओं का पुनर्वास इसलिए जरूरी है कि बलात्कार होते ही महिला को देखने का तरीका, नज़रिया एकदम बदल जाता है. उसके परिवार के लोगों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता, भारत में हालात यह है कि कोई स्त्राी अपनी इच्छा से किसी के साथ सैक्स करती भी है तो उसको ठीक ढंग से नहीं देखा जाता. बलात्कार की शिकार महिला तो सामान्य जिंदगी जी ही नहीं पाती.
एक दिन की बात है. कुछ संगठन बलात्कार के विरोध में जंतरमंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. मैं भी वहीं खड़ा था, कईयों ने सवाल किया, यह लड़कियां कौन सी बिरादरी की हैं. मैंने कहा दलित हैं. पलटकर सवाल किया, नहीं इनकी भी कोई ‘जात’ होगी, वाल्मीकि हैं? खटीक हैं, चमार हैं या कोई और? मैंने कहा, मुझे केवल इतना पता है कि यह दलित हैं. वह व्यक्ति अपने सवाल को दूसरे लोगों से दोहराने लगे.
यानी जाति का समीकरण देखिए कि कुछ लोग उनके आंदोलन से इसलिए दूर हो जाएंगे कि यह लड़कियां दलित तो हैं, लेकिन उनकी जाति की नहीं है.
यदि बलात्कार की शिकार गैरदलित हुई तो हर कोई आंदोलन में कूद पड़ेगा, चाहे किसी भी जाति, धर्म का हो. लेकिन दलित जाति की लड़कियों को इंसाफ दलित जातियों के अपने-अपने खेमे में बटे होने के कारण नहीं मिल पाता.
जंतर मंतर पर अनेक लोग आते हैं, वहां बैठते हैं, लेकिन उनकी निगाहें यही ढूंढ रही होती हैं, आखिर वह लड़कियां हैं कौन सी जो बलात्कार की शिकार हुई हैं. कई लोग सवाल भी कर देते हैं. टैंट में काफी महिलाएं हैं, जो घूंघट में रहती हैं, इनमें से कौन सी वह लड़कियां हैं, जिनके साथ बलात्कार हुआ है? यह सवाल लगातार लोगों के जहन में घूमता रहता हैं. लड़कियां गांव की है, पब्लिक में खुलकर नहीं बोल सकती है- हमारे साथ बलात्कार हुआ है. न उनके मां-बाप, रिश्तेदार चाहते हैं कि वे कहें- हमारी इन लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ है. सामाजिक तानाबाना कुछ इस तरह का, बलात्कार स्त्री के साथ होता है, लेकिन उसकी जिंदगी को बर्बाद करने के साथ उसके परिवार के लोगों की जिंदगी को तबाह कर देता है. मानसम्मान गया, लड़की जूठन भी हो गई, कोई उससे शादी नहीं करेगा. मर्द चाहे कहीं भी मुंह मारता फिरे, लेकिन दूसरे की जोरजबरदस्ती का शिकार हुई लड़की को भी वह नहीं अपनाएंगे. किसी ने अपना भी लिया, जिसकी संभावना कम है- तो जीवनभर बात-बात पर ताने मारेगा, ‘एहसान मान मैंने तुझसे शादी की, वरना तू जीवन भर ऐसी ही रहती’
राजनीति के नशे में बाबा
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बलात्कार और हमारा मीडिया
बलात्कार जघन्य अपराध है. सामूहिक बलात्कार उससे भी जघन्य अपराध है. नाबालिग लड़की से बलात्कार और भी अधिक जघन्य अपराध है, लेकिन हमारे इलैक्ट्रानिक मीडिया को देखिए कि वह इसे खबर ही नहीं मानता. न ही खबर में मर्म नज़र आता है.
हिसार जिले(हरियाणा) के भगाणा गांव में बलात्कार की शिकार चार लड़कियां अपने परिवार, रिश्तेदारों के साथ जंतर-मंतर, दिल्ली में धरने पर बैठी हैं. दिल्ली देश की राजधानी है. दिल्ली में निर्भया के साथ बलात्कार हुआ था, पूरे देश ने उसकी आवाज सुनी थी. उनके साथ हुए अन्याय पर भी देश, मीडिया ध्यान देगा, और पूरे देश से न सही, दिल्ली के कोने-कोने से लोग जुटेंगे और पीडि़त परिवार की आवाज को बुलंद करेंगे. जिन लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है, उनमें से दो नाबालिग हैं. जो शौच के लिए खेतों में गईं थी- वहीं से गांव के दबंगों ने दबोचकर कार में डाला और अनजान जगह ले जाकर कई दिन तक बलात्कार कर भटिंडा छोड़ दिया, अपने हाल पर. परिवार वाले रोते-बिलखते दबंगों के घर गए, थाने गए, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं. काफी कोशिशों के बाद गांव के सरपंच ने बताया कि लड़कियां भटिंडा के रेलवे स्टेशन पर हैं.
तारीफ पीडि़त लड़कियों के परिजनों की, मुंह छिपाने की बजाय इंसाफ के लिए लड़कियों के साथ खड़े हुए. दलित जाग रहे हैं, इसका यह अच्छा उदाहरण है. वरना एक समय था, लड़की के साथ बलात्कार हुआ और परिवार के लोग चुप्पी साध कर बैठ गए, किसी को पता न चल जाए. लड़की को भी चुप रहने की हिदायत दे दी जाती थी.
प्राप्त जानकारी के अनुसार इन चार लड़कियों को गांव के ही दबंगों ने 23 मार्च 2014 को उठाकर कार में डाला. 12 लड़कों ने दलितों को सजा देने के लिए इन लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया. सोची-समझी रणनीति के तहत गांव के दलित दबंगों से मुंह जोरी करने लगे हैं. दो साल पहले इसी गांव के दलितों की एक विशेष जाति का बहिष्कार किया हुआ है, यह नहीं गए. मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेंगे- उनकी चार लड़कियों के साथ बलात्कार किया, बता भी दिया कि तुम्हारी लड़कियों के साथ बलात्कार करके हमने फलां जगह छोड़ दिया है. अब तुम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे. लड़कियां मां-बाप की इज्जत मानी जाती हैं. बलात्कार लड़की के साथ होता है, इज्जत मां-बाप, रिश्तेदारों की जाती है. इसलिए बहुत बार मां-बाप, भाई का बदला लड़की की इज्जत आबरू लूटकर लिया जाता है, यह पुराना दस्तूर अब तक जारी है.
हमें इस बारे में सोचना ही पड़ेगा कि लड़कियों को बताएं कि बलात्कार होना कोई जिंदगी का अंत नहीं है, उसके बाद भी जिंदगी है. जो बल के बूते किसी स्त्री से संबंध स्थापित करते हैं उनको सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. जल्द से जल्द मिलनी चाहिए. महिलाओं के साथ ज्यादातर बलात्कार बदला लेने के लिए किए जाते हैं. ताकि महिला और उसका परिवार किसी को मुंह दिखाने लायक न रहे. ध्यान रखें कि जब बलात्कार की शिकार लड़की इज्जत से जीयेगी, मुंह छुपाकर न रहकर बलात्कारी को सजा दिलवाएगी, तो बलात्कार कम होंगे.
किसी भी महिला के साथ बलात्कार उसके जीवन भर के लिए मानसिक पीड़ा का शिकार बना जाता है. यही नहीं, उसके सामाजिक, पारिवारिक सम्मान को ठेस भी पहुंचाता है. फिर भी महिला को इस तरह का प्रशिक्षण, मानसिक मजबूती दी जाए कि बलात्कार भी एक तरह की दुर्घटना ही है- आप इसे गंभीर दुर्घटना कह सकते हैं. लेकिन फिर भी इस गंभीर दुर्घटना से बाहर निकलना तो है ही. बलात्कार के बाद भी सामान्य जीवन बिताया जा सकता है, इस तरह का सामाजिक माहौल प्रदान किया जाए तो कितना अच्छा रहे. इससे बलात्कारों में भी कमी आएगी. ऊपर भी कहा चुका है कि ज्यादातर बलात्कार महिला या उसके परिवार के लोगों से बदला लेने के उद्देश्य से किये जाते हैं. खेरलांजी, भगाणा आदि बलात्कार इसके उदाहरण हैं. बलात्कार करने वालों को सख्त सजा, सुनवाई फास्ट ट्रेक के जरिये हो, बलात्कार की शिकार महिलाओं का पुनर्वास किया जाए तो बलात्कार में कमी लाई जा सकती है. बलात्कार की शिकार महिलाओं का पुनर्वास इसलिए जरूरी है कि बलात्कार होते ही महिला को देखने का तरीका, नज़रिया एकदम बदल जाता है. उसके परिवार के लोगों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता, भारत में हालात यह है कि कोई स्त्राी अपनी इच्छा से किसी के साथ सैक्स करती भी है तो उसको ठीक ढंग से नहीं देखा जाता. बलात्कार की शिकार महिला तो सामान्य जिंदगी जी ही नहीं पाती.
बलात्कार, आंदोलन और जाति
हिसार जिले के गांव भगाणा की चार नाबालिग लड़कियां दिल्ली के जंतर-मंतर पर बैठी हैं, अपने परिवार, रिश्तेदारों के साथ. जुनून उनका अपहरण कर उनके साथ 12 लड़कों ने सामूहिक बलात्कार किया, पकड़े क्यों गए केवल 5 लड़के. बलात्कार की शिकार लड़कियां व उनका परिवार गांव में नहीं रह सकता, क्योंकि जिन लड़कों ने बलात्कार किया वह तथा उनके परिवार के लोग उन्हें खराब नजरों से ही नहीं देखते, बल्कि खुद को उनके परिवार का दामाद, खसम बोलते हैं. लड़कियों को इंसाफ दिलवाने के लिए उनके साथ कुछ आंदोलनकारी संगठन, जेएनयू के छात्रा आए हैं.एक दिन की बात है. कुछ संगठन बलात्कार के विरोध में जंतरमंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. मैं भी वहीं खड़ा था, कईयों ने सवाल किया, यह लड़कियां कौन सी बिरादरी की हैं. मैंने कहा दलित हैं. पलटकर सवाल किया, नहीं इनकी भी कोई ‘जात’ होगी, वाल्मीकि हैं? खटीक हैं, चमार हैं या कोई और? मैंने कहा, मुझे केवल इतना पता है कि यह दलित हैं. वह व्यक्ति अपने सवाल को दूसरे लोगों से दोहराने लगे.
यानी जाति का समीकरण देखिए कि कुछ लोग उनके आंदोलन से इसलिए दूर हो जाएंगे कि यह लड़कियां दलित तो हैं, लेकिन उनकी जाति की नहीं है.
यदि बलात्कार की शिकार गैरदलित हुई तो हर कोई आंदोलन में कूद पड़ेगा, चाहे किसी भी जाति, धर्म का हो. लेकिन दलित जाति की लड़कियों को इंसाफ दलित जातियों के अपने-अपने खेमे में बटे होने के कारण नहीं मिल पाता.
जंतर मंतर पर अनेक लोग आते हैं, वहां बैठते हैं, लेकिन उनकी निगाहें यही ढूंढ रही होती हैं, आखिर वह लड़कियां हैं कौन सी जो बलात्कार की शिकार हुई हैं. कई लोग सवाल भी कर देते हैं. टैंट में काफी महिलाएं हैं, जो घूंघट में रहती हैं, इनमें से कौन सी वह लड़कियां हैं, जिनके साथ बलात्कार हुआ है? यह सवाल लगातार लोगों के जहन में घूमता रहता हैं. लड़कियां गांव की है, पब्लिक में खुलकर नहीं बोल सकती है- हमारे साथ बलात्कार हुआ है. न उनके मां-बाप, रिश्तेदार चाहते हैं कि वे कहें- हमारी इन लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ है. सामाजिक तानाबाना कुछ इस तरह का, बलात्कार स्त्री के साथ होता है, लेकिन उसकी जिंदगी को बर्बाद करने के साथ उसके परिवार के लोगों की जिंदगी को तबाह कर देता है. मानसम्मान गया, लड़की जूठन भी हो गई, कोई उससे शादी नहीं करेगा. मर्द चाहे कहीं भी मुंह मारता फिरे, लेकिन दूसरे की जोरजबरदस्ती का शिकार हुई लड़की को भी वह नहीं अपनाएंगे. किसी ने अपना भी लिया, जिसकी संभावना कम है- तो जीवनभर बात-बात पर ताने मारेगा, ‘एहसान मान मैंने तुझसे शादी की, वरना तू जीवन भर ऐसी ही रहती’
बलात्कार का समाजशास्त्र
लड़की द्वारा लड़के के प्रेम प्रस्ताव को ठुकरा देने पर, लड़की को सजा देने के लिए लड़का उसके साथ बलात्कार कर दे अथवा करवा दे तो लड़की जिन्दगीभर उससे उबर नहीं पाएगी. किसी भाई, पिता ने किसी का अपमान कर दिया, उनसे किसी दुश्मनी का बदला लेना है अथवा उसका घमंड चूर-चूर करना है तो उसकी बहन, बेटी के साथ बलात्कार कर दो, जिन्दगीभर किसी से मुंह उठाकर बात नहीं कर पाएंगे. किसी पुरुष से बदला उसकी बहन, बेटी, पत्नी से लिया जाता है. और हमारे देश की कानून व्यवस्था देखिए बलात्कार की सजा गुनाहगार से ज्यादा लड़की और उसके मां-बाप भुगत रहे होते हैं. बहुत बार लड़कों को जमानत मिल जाती है. उसे सजा तभी मिलेगी, जब लड़की और परिवार के लोग जीजान लगाकर सजा दिलवाने के लिए भागदौड़ करेंगे वो भी वर्षों. ढेर सारा पैसा लगेगा वो अलग- संभव है घर मकान बेचकर मुकदमा लड़ना पड़े. वरना दोषी जेल की सलाखों से बाहर खुला घूमता नजर आएगा, बिना किसी डर-भय के. लड़की और उसके परिवार को इज्जत-आबरू के साथ रहने का स्थान तो बदलना ही पड़ेगा.
बलात्कारी को बिना सबूतों के सजा नहीं होगी. सबूत तो इकट्ठे करने में पीडि़त मेहनत करेगा. पहली बात तो बलात्कार की शिकार लड़की या उसके परिजन पुलिस पर दबाव नहीं बनाएंगे तो मामला दर्ज हो ही नहीं सकता. हां, पुलिस बलात्कारी, उसके परिवार से मोटी रकम जरूर डकार जाती है. केस दर्ज कर भी दिया तो बलात्कारी पक्ष से मोटी रकम खाकर केस को इतना कमजोर कर देती है कि सजा होना मुश्किल हो जाता है. बलात्कार तभी माना जाएगा, जब मेडिकल में माना जाएगा. यदि पुलिस या डाक्टर की मेहरबानी से मेडिकल जांच में बलात्कार साबित नहीं हुआ तो केस तो बंद होना ही है. इस तरह न जाने कितने केस आए गए हो जाते हैं. कुछ इज्जत, बदनामी के डर से पुलिस तक जाते ही नहीं. चले भी गए तो पुलिस तो पहले यही समझाती है कि इस पचड़े में मत पड़ो. अपनी इज्जत आबरू की सोचो. हां, दोषी से पैसा जरूर खा लेगी. यदि पीडि़ता व उसका परिवार नहीं माना तो उसे भी कुछ पैसे का लालच दिया जाएगा.
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बाबारामदेव योगा सिखाते-सिखाते दवाई बेचने लगे, अब राजनीति में उतर आए हैं. बहुत बार वह अपनी जुबान पर काबू नहीं रख पाते, जो मन में आता हैं, बाहर निकाल देते हैं. उसी तरह जैसे शराबी नशे में कुछ भी बक देता है, मन की भड़ास भी निकाल देता है. राजनीति के नशे में रामदेव के मुंह से दलितों के लिए अभद्र टिप्पणी निकली कि राहुल गांधी दलितों के घरों में हनीमून मनाने जाते हैं. दलितों ने भी पूरे देश में उनकी टिप्पणी का विरोध किया. उन्हें इस टिप्पणी के लिए कुछ मुकदमों का भी सामना करना पड़ेगा. हालांकि बाबा रामदेव ओबीसी हैं, लेकिन राजनीति के नशे में भूल गये, वे क्या हैं. अब उन्होंने धन भी इकट्ठा कर लिया. अब उसे बचाए रखने और बढ़ाने की जुगत में लगे हुए है. पूरे देश में दलितों ने जिस तरह से बाबा रामदेव द्वारा दलितों के लिए की गई अभद्र टिप्पणी का विरोध किया, यदि वह आगे भी जारी रहे तो कोई नेता दलितों के लिए कुछ बोलते समय एक बार सोचेगा जरूर. बाबारामदेव की अभद्र टिप्पणी का जितना विरोध किया जाए, कम है.
-कैलाश चंद चौहान
"कदम", फरवरी-अप्रैल 2014 अंक का संपादकीय
kadamhindi@gmail.com
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