"हमारे मौहल्ले में कोई मोरया-मोरया नेता आया करते थे. वे हमेशा बाबा साहब की ही बातें करते थे. और बताते थे कि वे हमारे लोगों के लिए बहुत अच्छा काम कर गये हैं. देश के चलाने वाली किताब लिख गये हैं. उनने ही संत रैदास के बारे में जानकारी दई."
उस दिन मैं अपने जूते रिपेयर कराने मोतीराम जी के पास गया. मोतीराम जी पैंतालीस-पचास की उम्र के हैं. वर्षो से अपने ‘ठीये’ पर बैठकर जूतों की मरम्मत का काम करते हैं. उन्होंने अपने ‘ठीये‘ पर बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर एवं रैदास जी की तस्वीरें लगा रखी हैं. उन तस्वीरों को देखकर मैं उनसे प्रभावित हुआ. उनका नाम मोतीराम है पर लोग उन्हें सागर के नाम से जानते हैं. मैंने उनसे बातचीत शुरु की, "सागर साहब, आपने बाबा साहब और रैदास जी की तस्वीरें क्यों लगा रखी हैं?"
"देखिए साब, ये दोनों हमारे समाज के महापुरुष हैं. इन्होंने हमारी जाति का नाम रौशन किया है, और आजकल बाबा साहब को तो सभी जानते और मानते हैं. ये हमारे समाज की शान हैं इसलिए इनकी तस्वीरें लगा रखी हैं."
"आपने बाबा साहब और रैदास जी की तस्वीरें तो लगा रखी हैं, लेकिन क्या इनसे कोई सीख ली है?"
"हां, इनसे ये तो सीख मिलती है कि इन्सान को अगर बड़ा बनना है तो ज्यादा से ज्यादा पढ़ना चाहिए."
"आपने कितनी पढ़ाई की है?"
"साब मैं तो नहीं पढ़ पाया. बचपन से ही मैं अपने पिता के साथ जूते मरम्मत करवाने में उनकी मदद करता था."
"आपके कितने बच्चे हैं?"
"दो बच्चे हैं साब, एक लड़का और एक लड़की."
"बच्चे क्या करते हैं?"
"बड़ी लड़की की तो शादी कर दी, लड़का अभी पढ़ रहा है."
"आपके दोनों बच्चे कितने पढ़े हैं?"
"लड़की दसवीं फेल है और लड़का अभी बारहवीं में पढ़ रहा है."
"लड़की को आगे क्यों नहीं पढ़ाया?"
"लड़की का पढ़ने में मन नहीं लगता था. पर साब, लड़का पढ़ने में तेज है, उसे मैं खूब पढ़ाऊंगा." सागर साहब की ये बात थोड़ी अजीब लगी थी. क्योंकि दिल्ली में दसवीं की परीक्षाएं हों या बारहवीं की परीक्षाएं, हर बार लड़कियां ही अव्वल आती हैं. पर उनकी लड़की पढ़ने में तेज नहीं थी. दसवीं में फेल हो गई थी. दिल्ली में जहां लड़के पढ़ने में फिसड्डी माने जाते हैं, वहीं उनका लड़का पढ़ने में तेज था. मन में विचार आया कि मैं उनसे उनका बैकग्राउण्ड भी पूछ लूं. मैंने कहा, ”सागर साहब, आप का जन्म स्थान कहां का है़?"
"सा‘ब, रहने वाला तो मैं आगरा का हूं. राजा मंडी के पास हमारी बस्ती है. मेरे पिताजी भी यहीं मोचीगिरी का काम करते थे. मुझे यह अच्छा नहीं लगता था. वहां बड़ी जात के लोग हमारी बेइज्जती करते थे. मुझे यह पसन्द नहीं था. पर पिताजी ने शादी पन्द्रह-सोलह साल की उम्र में ही कर दी थी. जल्दी शादी होने की बजह से बच्चे भी जल्दी हो गये थे. उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी मुझ पर आ पड़ी थी. एक दिन सिर्फ पत्नी को बताकर चुपचाप एक ट्रकवाले के ट्रक में बैठकर दिल्ली आ गया था. ट्रक वाले से मेरी दोस्ती हो गई थी. यहां आकर शुरु में तो दिहाड़ी-मजदूरी करी. पर यहां भी ठेकेदार बात-बात में बेइज्जती करता. इसलिए दिहाड़ी मजदूरी से पैसे बचाकर जूता पोलिस करने का सामान खरीदा. और फिर अपना पुश्तैनी काम करने लगा. पर यहां जान-पहचान के लोग नहीं थे. दूसरी बात यहां लोग अपने यहां जैसी जलालत वाली भाषा में बात नहीं करते थे....."
"अच्छा, ये बताइए कि बाबा साहब के बारे में आपको कैसे जानकारी मिली?"
"हमारे मौहल्ले में कोई मोरया-मोरया नेता आया करते थे. वे हमेशा बाबा साहब की ही बातें करते थे. और बताते थे कि वे हमारे लोगों के लिए बहुत अच्छा काम कर गये हैं. देश के चलाने वाली किताब लिख गये हैं. उनने ही संत रैदास के बारे में जानकारी दई."
"अच्छा ये बताइए कि कांशीराम और मायावती के बारे में आपकी क्या राय है?"
"कांसीराम बड़े बढि़या आदमी थे. हमने तो कई दफे उनके भाषण सुने. उनकी बातें सुनकर ही हमारे मन में अपने बच्चों को आगे खूब आगे तक पढ़ावे की बात आई. पर लड़की ने पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं ली. अब लड़के को खूब पढ़ाने की इच्छा है."
"आपने मायावती के बारे में कुछ नहीं बताया?"
"बैसे तो भैन जी, ठीक हैं. यू.पी. की गद्दी पै कई दफे बैठ चुकी हैं. हमारी जाति के लिए भी बढि़या काम करो है. पर कांसीराम वाली बात नहीं है. उनकी कछु और ही बात थी...."
"सागर साब, दिन भर आपके पास कई तरह के लोग आते होंगे. लोगों के बारे में आपकी क्या राय है?"
"देखिए साब ये दुनिया है. यहां पर हर तरह के लोग होते हैं. पर हां, आदमी को आदमी की इज्जत करनी चाहिए. अब हम जूता मरम्मत का काम करते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि आप हमें नीचा समझें. सब इन्सान बराबर हैं और मेरी पूछिए तो मेरी नजर में एक जोड़ी जूते की तरह सब इन्सान बराबर हैं."
मेरे जूते उन्होंने रिपेयर कर दिए थे. पैसे चुका कर मैं चल दिया पर मुझे सागर साब की एक बात याद आती रही और यह एहसास कराती रही कि हाशिए पर जीवन-यापन करने वाले लोग भी हमारी आपकी तरह विचार और भावनाएं रखते हैं. ‘एक जोड़ी जूते की तरह बराबर इन्सान’ कह कर सागर जी ने कितनी बड़ी बात कह दी थी. मुझे सुदामा प्रसाद पाण्डेय ‘धूमिल’ की कविता ‘मोचीराम‘ याद आ गई
"देखिए साब, ये दोनों हमारे समाज के महापुरुष हैं. इन्होंने हमारी जाति का नाम रौशन किया है, और आजकल बाबा साहब को तो सभी जानते और मानते हैं. ये हमारे समाज की शान हैं इसलिए इनकी तस्वीरें लगा रखी हैं."
"आपने बाबा साहब और रैदास जी की तस्वीरें तो लगा रखी हैं, लेकिन क्या इनसे कोई सीख ली है?"
"हां, इनसे ये तो सीख मिलती है कि इन्सान को अगर बड़ा बनना है तो ज्यादा से ज्यादा पढ़ना चाहिए."
"आपने कितनी पढ़ाई की है?"
"साब मैं तो नहीं पढ़ पाया. बचपन से ही मैं अपने पिता के साथ जूते मरम्मत करवाने में उनकी मदद करता था."
"आपके कितने बच्चे हैं?"
"दो बच्चे हैं साब, एक लड़का और एक लड़की."
"बच्चे क्या करते हैं?"
"बड़ी लड़की की तो शादी कर दी, लड़का अभी पढ़ रहा है."
"आपके दोनों बच्चे कितने पढ़े हैं?"
"लड़की दसवीं फेल है और लड़का अभी बारहवीं में पढ़ रहा है."
"लड़की को आगे क्यों नहीं पढ़ाया?"
"लड़की का पढ़ने में मन नहीं लगता था. पर साब, लड़का पढ़ने में तेज है, उसे मैं खूब पढ़ाऊंगा." सागर साहब की ये बात थोड़ी अजीब लगी थी. क्योंकि दिल्ली में दसवीं की परीक्षाएं हों या बारहवीं की परीक्षाएं, हर बार लड़कियां ही अव्वल आती हैं. पर उनकी लड़की पढ़ने में तेज नहीं थी. दसवीं में फेल हो गई थी. दिल्ली में जहां लड़के पढ़ने में फिसड्डी माने जाते हैं, वहीं उनका लड़का पढ़ने में तेज था. मन में विचार आया कि मैं उनसे उनका बैकग्राउण्ड भी पूछ लूं. मैंने कहा, ”सागर साहब, आप का जन्म स्थान कहां का है़?"
"सा‘ब, रहने वाला तो मैं आगरा का हूं. राजा मंडी के पास हमारी बस्ती है. मेरे पिताजी भी यहीं मोचीगिरी का काम करते थे. मुझे यह अच्छा नहीं लगता था. वहां बड़ी जात के लोग हमारी बेइज्जती करते थे. मुझे यह पसन्द नहीं था. पर पिताजी ने शादी पन्द्रह-सोलह साल की उम्र में ही कर दी थी. जल्दी शादी होने की बजह से बच्चे भी जल्दी हो गये थे. उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी मुझ पर आ पड़ी थी. एक दिन सिर्फ पत्नी को बताकर चुपचाप एक ट्रकवाले के ट्रक में बैठकर दिल्ली आ गया था. ट्रक वाले से मेरी दोस्ती हो गई थी. यहां आकर शुरु में तो दिहाड़ी-मजदूरी करी. पर यहां भी ठेकेदार बात-बात में बेइज्जती करता. इसलिए दिहाड़ी मजदूरी से पैसे बचाकर जूता पोलिस करने का सामान खरीदा. और फिर अपना पुश्तैनी काम करने लगा. पर यहां जान-पहचान के लोग नहीं थे. दूसरी बात यहां लोग अपने यहां जैसी जलालत वाली भाषा में बात नहीं करते थे....."
"अच्छा, ये बताइए कि बाबा साहब के बारे में आपको कैसे जानकारी मिली?"
"हमारे मौहल्ले में कोई मोरया-मोरया नेता आया करते थे. वे हमेशा बाबा साहब की ही बातें करते थे. और बताते थे कि वे हमारे लोगों के लिए बहुत अच्छा काम कर गये हैं. देश के चलाने वाली किताब लिख गये हैं. उनने ही संत रैदास के बारे में जानकारी दई."
"अच्छा ये बताइए कि कांशीराम और मायावती के बारे में आपकी क्या राय है?"
"कांसीराम बड़े बढि़या आदमी थे. हमने तो कई दफे उनके भाषण सुने. उनकी बातें सुनकर ही हमारे मन में अपने बच्चों को आगे खूब आगे तक पढ़ावे की बात आई. पर लड़की ने पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं ली. अब लड़के को खूब पढ़ाने की इच्छा है."
"आपने मायावती के बारे में कुछ नहीं बताया?"
"बैसे तो भैन जी, ठीक हैं. यू.पी. की गद्दी पै कई दफे बैठ चुकी हैं. हमारी जाति के लिए भी बढि़या काम करो है. पर कांसीराम वाली बात नहीं है. उनकी कछु और ही बात थी...."
"सागर साब, दिन भर आपके पास कई तरह के लोग आते होंगे. लोगों के बारे में आपकी क्या राय है?"
"देखिए साब ये दुनिया है. यहां पर हर तरह के लोग होते हैं. पर हां, आदमी को आदमी की इज्जत करनी चाहिए. अब हम जूता मरम्मत का काम करते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि आप हमें नीचा समझें. सब इन्सान बराबर हैं और मेरी पूछिए तो मेरी नजर में एक जोड़ी जूते की तरह सब इन्सान बराबर हैं."
मेरे जूते उन्होंने रिपेयर कर दिए थे. पैसे चुका कर मैं चल दिया पर मुझे सागर साब की एक बात याद आती रही और यह एहसास कराती रही कि हाशिए पर जीवन-यापन करने वाले लोग भी हमारी आपकी तरह विचार और भावनाएं रखते हैं. ‘एक जोड़ी जूते की तरह बराबर इन्सान’ कह कर सागर जी ने कितनी बड़ी बात कह दी थी. मुझे सुदामा प्रसाद पाण्डेय ‘धूमिल’ की कविता ‘मोचीराम‘ याद आ गई
राज वाल्मीकि
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